पूजा-पाठ में परिक्रमा करने से क्या बन सकते हैं धनवान? जानिए सही नियम, दिशा और गिनती
परिक्रमा केवल मंदिर की परंपरा नहीं, समर्पण और श्रद्धा का प्रतीक; देवी-देवताओं के अनुसार अलग मानी गई है संख्या
धर्म डेस्क। हिंदू धर्म में पूजा-पाठ के बाद देवी-देवताओं की परिक्रमा करने की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। मंदिर में दर्शन करने वाले श्रद्धालु भगवान की प्रतिमा या गर्भगृह के चारों ओर घूमकर अपनी पूजा पूर्ण करते हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विधिपूर्वक की गई परिक्रमा से मन को शांति मिलती है, नकारात्मक विचार कम होते हैं और व्यक्ति को शुभ फल की प्राप्ति होती है।
प्रश्न कुंडली विशेषज्ञ पंडित सुरेश पांडेय के अनुसार, परिक्रमा करते समय केवल उसकी संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं होती, बल्कि श्रद्धा, दिशा, आचरण और मन की भावना का भी विशेष महत्व है। अलग-अलग देवी-देवताओं की परिक्रमा की संख्या भी अलग बताई गई है। हालांकि, किसी मंदिर या संप्रदाय की अपनी अलग परंपरा हो सकती है, इसलिए स्थानीय पुजारी के निर्देश को प्राथमिकता देना उचित माना जाता है।
7 सितंबर को अजा एकादशी और शुभ योग
पंचांग के अनुसार, 7 सितंबर 2026 को भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि है। इसे अजा एकादशी के रूप में मनाया जा रहा है। एकादशी तिथि का समापन शाम 5 बजकर 03 मिनट पर बताया गया है।
इस दिन सर्वार्थ सिद्धि योग का भी निर्माण हो रहा है। पुनर्वसु नक्षत्र शाम 6 बजकर 14 मिनट तक रहेगा, जिसके बाद पुष्य नक्षत्र प्रारंभ होगा। व्यतीपात योग सुबह 6 बजकर 41 मिनट पर समाप्त होने के बाद वरीयान् योग रहेगा। दिन में बव, बालव, कौलव और तैतिल करण का प्रभाव भी बताया गया है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी के दिन भगवान विष्णु की पूजा, व्रत, मंत्र जाप और परिक्रमा करना विशेष फलदायी माना जाता है।
परिक्रमा का धार्मिक अर्थ क्या है?
परिक्रमा का अर्थ है किसी आराध्य को केंद्र में रखते हुए श्रद्धापूर्वक उसके चारों ओर घूमना। भक्त परिक्रमा के माध्यम से यह भाव प्रकट करता है कि ईश्वर उसके जीवन का केंद्र हैं और उसका पूरा जीवन भगवान के चारों ओर समर्पित है।
धार्मिक दृष्टि से परिक्रमा को अहंकार त्यागने, मन को एकाग्र करने और ईश्वर के प्रति विश्वास व्यक्त करने की प्रक्रिया माना गया है। इसे केवल धन प्राप्त करने का उपाय समझना उचित नहीं है। मान्यता है कि नियमित पूजा, अनुशासन, सदाचार, मेहनत और सकारात्मक विचारों के साथ परिक्रमा करने से मानसिक शक्ति बढ़ती है, जो व्यक्ति को जीवन में उचित निर्णय लेने के लिए प्रेरित कर सकती है।
किस देवी-देवता की कितनी परिक्रमा करें?
विभिन्न धार्मिक परंपराओं में परिक्रमा की संख्या अलग-अलग बताई गई है। सामान्य मान्यता के अनुसार भगवान गणेश की तीन परिक्रमा करने का विधान बताया जाता है। भगवान विष्णु और उनके अवतारों की चार परिक्रमा करना शुभ माना गया है।
सूर्यदेव की सात परिक्रमा करने की परंपरा प्रचलित है। देवी दुर्गा और अन्य देवी स्वरूपों की एक परिक्रमा करने का विधान कई परंपराओं में मिलता है। भगवान शिव की पूरी परिक्रमा के बजाय अर्ध परिक्रमा की जाती है, क्योंकि शिवलिंग पर चढ़ाया गया जल जिस स्थान से बाहर निकलता है, उसे सोमसूत्र या जलाधारी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसे लांघना नहीं चाहिए।
हनुमानजी की परिक्रमा की संख्या को लेकर अलग-अलग मंदिरों में अलग मान्यताएं प्रचलित हैं। कहीं तीन, कहीं पांच और कहीं सात परिक्रमा की जाती हैं। इसलिए संबंधित मंदिर के पुजारी से जानकारी लेना बेहतर माना जाता है।
भगवान शिव की परिक्रमा में रखें विशेष ध्यान
भगवान शिव की परिक्रमा अन्य देवी-देवताओं की परिक्रमा से अलग मानी जाती है। शिवलिंग के चारों ओर पूरी तरह घूमने के बजाय जलाधारी तक जाकर वापस उसी दिशा में लौटने की परंपरा है। इसे भगवान शिव की अर्ध परिक्रमा कहा जाता है।
मान्यता है कि शिवलिंग पर अर्पित जल जलाधारी से होकर बाहर निकलता है। यह जल पवित्र माना जाता है, इसलिए जल निकासी वाले स्थान को पैर से पार नहीं करना चाहिए। हालांकि, जिन मंदिरों में जल निकासी की संरचना अलग हो, वहां स्थानीय परंपरा का पालन किया जा सकता है।
परिक्रमा किस दिशा में करनी चाहिए?
सामान्य रूप से परिक्रमा हमेशा घड़ी की सुई की दिशा यानी दाईं ओर से शुरू की जाती है। इसका अर्थ है कि परिक्रमा करते समय देवी-देवता या मंदिर का गर्भगृह श्रद्धालु के दाईं ओर रहना चाहिए।
परिक्रमा शुरू करने से पहले भगवान के सामने हाथ जोड़कर प्रणाम करना चाहिए। इसके बाद शांत मन से मंत्र, भगवान का नाम या अपनी प्रार्थना बोलते हुए परिक्रमा करनी चाहिए। बहुत तेज चलना, हंसी-मजाक करना, मोबाइल फोन पर बात करना या दूसरे श्रद्धालुओं को धक्का देना उचित नहीं माना जाता।
परिक्रमा पूरी होने के बाद उसी स्थान पर वापस आकर भगवान को प्रणाम करना चाहिए। इसके बाद मन में अपनी प्रार्थना या संकल्प व्यक्त किया जा सकता है।
क्या परिक्रमा करने से धन की प्राप्ति होती है?
धार्मिक मान्यताओं में देवी-देवताओं की विधिपूर्वक पूजा और परिक्रमा को सुख, समृद्धि एवं शुभ फल से जोड़ा गया है। लेकिन परिक्रमा को अचानक धनवान बनने की गारंटी के रूप में नहीं देखना चाहिए।
पूजा-पाठ व्यक्ति को मानसिक शांति, आत्मविश्वास, अनुशासन और सकारात्मक ऊर्जा प्रदान कर सकता है। धन संबंधी सफलता के लिए श्रद्धा के साथ सही निर्णय, मेहनत, बचत और जिम्मेदार आर्थिक व्यवहार भी आवश्यक है।
परिक्रमा करते समय धन की कामना के साथ भगवान से सद्बुद्धि, मेहनत की शक्ति और उचित अवसर प्रदान करने की प्रार्थना करना अधिक सार्थक माना गया है।
इन नियमों का रखें ध्यान
परिक्रमा स्वच्छ वस्त्र पहनकर और शांत मन से करनी चाहिए। मंदिर में निर्धारित मार्ग का ही उपयोग करें और गर्भगृह के अत्यधिक पास जाने से बचें। यदि भीड़ अधिक हो तो व्यवस्था बनाए रखें और बुजुर्गों तथा बच्चों का विशेष ध्यान रखें।
परिक्रमा की संख्या पूरी करने की जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। श्रद्धा और एकाग्रता को संख्या से अधिक महत्वपूर्ण माना गया है। स्वास्थ्य संबंधी परेशानी, चक्कर, घुटनों में दर्द या चलने में कठिनाई हो तो अपने शरीर की क्षमता के अनुसार ही परिक्रमा करें।
