उन्मार्ग से सन्मार्ग पर ले जाना ही स्थितिकरण अंग : आचार्यश्री उदारसागर
बड़ा जैन मंदिर में धर्मसभा को किया संबोधित, कहा—दूसरों को धर्म में स्थिर करने से पहले स्वयं धर्ममार्ग पर दृढ़ होना जरूरी
Morena (मनोज जैन नायक)। । बड़ा जैन मंदिर में चातुर्मासरत परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए स्थितिकरण अंग की महत्ता पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उन्मार्ग की ओर जा रही आत्मा को पुनः सन्मार्ग पर स्थापित करना ही स्थितिकरण है। यह केवल किसी दूसरे व्यक्ति को धर्म में स्थिर करने का प्रयास नहीं, बल्कि सबसे पहले स्वयं को धर्ममार्ग पर दृढ़ता से स्थापित करने की साधना है।
आचार्यश्री ने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं धर्म के मार्ग पर स्थिर नहीं है, वह दूसरों को धर्म में स्थिर करने का प्रभावी प्रयास कैसे कर सकता है। इसलिए प्रत्येक साधक को सबसे पहले अपने जीवन में धर्म को उतारना चाहिए। उसके बाद अपने आचरण और व्यवहार के माध्यम से दूसरों के सामने उदाहरण प्रस्तुत करते हुए साधर्मी को धर्ममार्ग पर बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
स्वयं धर्म में स्थिर होना जरूरी
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि धर्म का प्रभाव केवल शब्दों से नहीं, बल्कि आचरण से दिखाई देता है। यदि व्यक्ति स्वयं अपने जीवन में धर्म के सिद्धांतों का पालन करता है, तो उसका व्यवहार दूसरों के लिए प्रेरणा बनता है।
उन्होंने कहा कि दूसरों की कमियां बताने या उन्हें सुधारने से पहले व्यक्ति को आत्मनिरीक्षण करना चाहिए। अपने जीवन में सुधार किए बिना दूसरों को उपदेश देना अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकता।
उन्होंने समझाया कि स्थितिकरण का वास्तविक भाव किसी व्यक्ति को दबाव डालकर धर्म में बनाए रखना नहीं है, बल्कि उसके जीवन की परिस्थितियों को समझकर उसे उचित सहयोग और मार्गदर्शन देना है।
आर्थिक सहायता भी स्थितिकरण का एक रूप
आचार्यश्री ने कहा कि यदि कोई व्यक्ति आर्थिक परेशानी के कारण धर्म से विमुख होने की स्थिति में पहुंच रहा है और उसकी उचित सहायता करके उसे धर्ममार्ग पर बनाए रखा जाता है, तो यह भी स्थितिकरण का ही एक रूप है।
इसी प्रकार किसी को प्रेमपूर्वक समझाना, अनुकूल उपदेश देना, आवश्यकता के समय सहयोग करना, वात्सल्य रखना और सही समय पर उचित मार्गदर्शन देना भी स्थितिकरण की भावना में शामिल है।
उन्होंने कहा कि समाज में एक-दूसरे के सुख-दुःख में सहभागी बनने की भावना धार्मिक जीवन को मजबूत करती है। साधर्मी के प्रति संवेदना और सहयोग की भावना समाज में आपसी विश्वास तथा धार्मिक संस्कारों को मजबूत करती है।

पहले स्वयं का सुधार जरूरी
आचार्यश्री ने आत्मसुधार के महत्व को समझाने के लिए एक रोचक प्रसंग भी सुनाया। उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति डॉक्टर के पास पहुंचा। डॉक्टर ने उससे कहा कि वह उसे ठीक कर देगा। मरीज ने डॉक्टर से पूछा कि क्या उसे बीमारी का पर्याप्त ज्ञान है। डॉक्टर ने कहा कि उसे बीमारी का ज्ञान तो बहुत है, लेकिन वही बीमारी उसे स्वयं कई वर्षों से है।
आचार्यश्री ने इस प्रसंग के माध्यम से कहा कि जब डॉक्टर स्वयं अपनी बीमारी से मुक्त नहीं हो पाया, तो वह दूसरे व्यक्ति को कैसे ठीक कर पाएगा। इसी प्रकार जो व्यक्ति स्वयं धर्माचरण में स्थिर नहीं है, उसका दूसरों को धर्म का उपदेश देना प्रभावकारी नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि दूसरों को सुधारने और धर्म में स्थिर करने से पहले अपने जीवन को धर्ममय बनाना आवश्यक है। आत्मसुधार के बाद किया गया मार्गदर्शन ही अधिक प्रभावी और प्रेरणादायी होता है।
मुनिराज की चर्या समझे बिना निर्णय न लें
धर्मसभा में आचार्यश्री ने खजुराहो से जुड़ा एक प्रसंग सुनाकर किसी भी व्यक्ति की स्थिति को समझे बिना निष्कर्ष पर पहुंचने से बचने की सीख दी।
उन्होंने बताया कि एक बार एक मुनिराज खजुराहो पहुंचे। स्थानीय लोगों को उनकी चर्या पूरी तरह समझ में नहीं आई। लोगों ने देखा कि मुनिराज शरीर पर पानी लगाते हैं और रात्रि में हरी घास पर लेटते हैं। लोगों को लगा कि संभवतः मुनिराज किसी शारीरिक समस्या से परेशान हैं। इसी कारण वे उन्हें वस्त्र पहनाने का प्रयास करने लगे।
उस समय पंडित जगन्मोहन लाल शास्त्री जी ने लोगों को समझाया कि किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले मुनिराज की वास्तविक आवश्यकता और स्थिति को समझना चाहिए। बिना पूरी जानकारी के किसी व्यक्ति के बारे में निर्णय लेना उचित नहीं है। पहले उसकी चर्या और आवश्यकता को समझना चाहिए और यदि कोई समस्या हो तो उसके अनुरूप समाधान का प्रयास करना चाहिए।
आचार्यश्री ने इस प्रसंग के माध्यम से समझाया कि स्थितिकरण का अर्थ केवल किसी व्यक्ति को रोकना या उसे उपदेश देना नहीं है। किसी व्यक्ति की स्थिति, परिस्थिति और वास्तविक समस्या को समझकर उसके अनुरूप उचित समाधान करना ही सच्चे स्थितिकरण की भावना है।
तिरस्कार नहीं, सहारे की जरूरत
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि धर्म से डिगते हुए व्यक्ति को तिरस्कार की नहीं, बल्कि सहारे की आवश्यकता होती है। उसे आलोचना करने के बजाय प्रेम, वात्सल्य और अनुकूल मार्गदर्शन देना चाहिए।
उन्होंने कहा कि कई बार व्यक्ति परिस्थितियों के कारण अपने धर्माचरण में कमजोर पड़ सकता है। ऐसे समय में समाज के लोगों का दायित्व है कि वे उसे अलग-थलग न करें, बल्कि उसकी परिस्थिति को समझते हुए उसके साथ खड़े हों।
साधर्मी के प्रति सहयोग, संवेदना, प्रेम और सही समय पर सही मार्गदर्शन देकर उसे धर्म में स्थिर रखना प्रत्येक श्रावक का दायित्व है। यही स्थितिकरण अंग की वास्तविक भावना है।
धर्मसभा में आचार्यश्री के प्रवचन से उपस्थित श्रद्धालुओं ने स्थितिकरण अंग के आध्यात्मिक और सामाजिक महत्व को समझा। उन्होंने अपने जीवन में आत्मसुधार, वात्सल्य, सहयोग और धर्म के प्रति दृढ़ता को अपनाने का संदेश दिया।

