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ई-अटेंडेंस 3.0 के विरोध में 3.75 लाख शिक्षक, निजी डेटा और थर्ड-पार्टी सर्वर पर उठाए गंभीर सवाल

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Published On: 7 September 2026
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ई-अटेंडेंस 3.0 के विरोध में 3.75 लाख शिक्षक, निजी डेटा और थर्ड-पार्टी सर्वर पर उठाए गंभीर सवाल

शिक्षक संगठनों ने मांगी डेटा संग्रह, स्टोरेज और सुरक्षा व्यवस्था की पूरी जानकारी; 17,817 लंबित शिकायतों के निराकरण की भी उठी मांग

भोपाल। मध्य प्रदेश के स्कूल शिक्षा विभाग द्वारा लागू की जा रही ई-अटेंडेंस 3.0 व्यवस्था को लेकर शिक्षकों का विरोध बढ़ता जा रहा है। प्रदेश के विभिन्न शिक्षक संगठनों का दावा है कि करीब 3.75 लाख शिक्षक इस प्रणाली और इसके अंतर्गत भरवाए जा रहे ऑनलाइन सहमति पत्र को लेकर असंतुष्ट हैं। संगठनों ने ई-अटेंडेंस का विरोध केवल तकनीकी परेशानी तक सीमित न रखते हुए व्यक्तिगत डेटा की सुरक्षा, थर्ड-पार्टी डोमेन, सर्वर की लोकेशन और शिकायतों के निराकरण जैसे कई महत्वपूर्ण विषयों पर विभाग से जवाब मांगा है।

शिक्षक संगठनों का कहना है कि वे आधुनिक तकनीक या पारदर्शी उपस्थिति व्यवस्था के विरोधी नहीं हैं, लेकिन किसी भी डिजिटल प्रणाली को लागू करने से पहले उससे जुड़े कर्मचारियों को यह बताया जाना चाहिए कि उनका कौन-सा डेटा एकत्र किया जा रहा है, उसे कहां सुरक्षित रखा जाएगा और उस तक पहुंचने का अधिकार किन लोगों या संस्थाओं के पास होगा।

ऑनलाइन सहमति पत्र बना विवाद की बड़ी वजह

ई-अटेंडेंस के लिए शिक्षकों से एक ऑनलाइन सहमति पत्र भरवाया जा रहा है। इसमें डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 का उल्लेख किए जाने के बाद शिक्षक संगठनों ने कई सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि सहमति लेने से पहले डेटा के इस्तेमाल, संग्रह, सुरक्षा और उसे हटाने की प्रक्रिया की पूरी जानकारी दी जानी चाहिए।

शिक्षकों का आरोप है कि सहमति पत्र की भाषा स्पष्ट नहीं है। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा कि ई-अटेंडेंस के दौरान मोबाइल नंबर, लोकेशन, डिवाइस से जुड़ी जानकारी, फोटो या अन्य व्यक्तिगत विवरणों में से कौन-कौन सा डेटा संग्रहित किया जाएगा।

संगठनों ने मांग की है कि शिक्षा विभाग सरल भाषा में एक विस्तृत डेटा सुरक्षा नीति सार्वजनिक करे। इसमें बताया जाए कि शिक्षकों की निजी जानकारी कितने समय तक सुरक्षित रखी जाएगी और सेवा प्रदाता कंपनी या किसी अन्य संस्था के साथ इसे साझा किया जाएगा या नहीं।

थर्ड-पार्टी डोमेन और सर्वर पर सवाल

शिक्षक संगठनों ने ई-अटेंडेंस प्रणाली में कथित थर्ड-पार्टी डोमेन के इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई है। संगठनों का कहना है कि विभाग को उस कंपनी या संस्था का नाम सार्वजनिक करना चाहिए जिसे सिस्टम के संचालन, तकनीकी सहायता या डेटा प्रबंधन की जिम्मेदारी सौंपी गई है।

इसके साथ ही सर्वर की लोकेशन, साइबर सुरक्षा ऑडिट और डेटा एन्क्रिप्शन व्यवस्था की जानकारी भी मांगी गई है। शिक्षकों का सवाल है कि यदि भविष्य में व्यक्तिगत डेटा लीक होता है या उसका अनधिकृत इस्तेमाल किया जाता है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी।

शिक्षक यह भी जानना चाहते हैं कि क्या इस डिजिटल प्लेटफॉर्म का स्वतंत्र साइबर सुरक्षा परीक्षण कराया गया है। यदि परीक्षण हुआ है तो उसकी रिपोर्ट कर्मचारियों या उनके प्रतिनिधि संगठनों को उपलब्ध क्यों नहीं कराई गई।

सरकारी डिजिटल अटेंडेंस पोर्टल पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित संगठन का नोडल अधिकारी उपस्थिति डेटा के लिए जिम्मेदार होता है और उसे नियमित रूप से डेटा डाउनलोड करना होता है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि ऐसी जिम्मेदारियों के साथ जवाबदेही की स्पष्ट व्यवस्था भी सामने आनी चाहिए।

17,817 शिकायतें लंबित होने का दावा

शिक्षक संगठनों ने दावा किया है कि ई-अटेंडेंस सहित विभागीय डिजिटल व्यवस्थाओं से जुड़ी 17,817 शिकायतें लंबित हैं। इतनी बड़ी संख्या में शिकायतें लंबित होने के बावजूद नई व्यवस्था को अनिवार्य बनाए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं।

संगठनों का कहना है कि पहले से दर्ज शिकायतों का समयबद्ध निराकरण किया जाना चाहिए। यदि शिक्षक को गलत अनुपस्थिति, लोकेशन में गड़बड़ी, नेटवर्क की समस्या या तकनीकी त्रुटि के कारण नुकसान होता है तो उसे तत्काल सुधार की सुविधा मिलनी चाहिए।

शिक्षकों ने शिकायत दर्ज करने के बाद उसकी स्थिति देखने, अपील करने और निश्चित समयसीमा में समाधान प्राप्त करने की पारदर्शी व्यवस्था बनाने की मांग की है।

ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क बड़ी चुनौती

प्रदेश के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों में कार्यरत शिक्षकों ने इंटरनेट कनेक्टिविटी को लेकर भी चिंता जताई है। कई स्कूल ऐसे क्षेत्रों में स्थित हैं, जहां मोबाइल नेटवर्क कमजोर रहता है या इंटरनेट नियमित रूप से उपलब्ध नहीं होता। ऐसी स्थिति में समय पर डिजिटल उपस्थिति दर्ज करना मुश्किल हो सकता है।

शिक्षकों का कहना है कि नेटवर्क या एप की तकनीकी समस्या के कारण उपस्थिति दर्ज नहीं होने पर उन्हें अनुपस्थित मानना उचित नहीं होगा। इसके लिए ऑफलाइन अटेंडेंस, विलंबित सिंक और संस्था प्रमुख द्वारा सत्यापन जैसे वैकल्पिक विकल्प उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

मोबाइल खराब होने, बैटरी समाप्त होने, एप अपडेट नहीं होने और सर्वर बंद रहने जैसी परिस्थितियों के लिए भी स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की मांग की गई है।

लोकेशन आधारित उपस्थिति पर आपत्ति

ई-अटेंडेंस में जियो-लोकेशन के उपयोग को लेकर भी शिक्षक सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि यदि एप मोबाइल की लोकेशन का इस्तेमाल करता है तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि लोकेशन केवल उपस्थिति दर्ज करते समय ली जाएगी या एप दिनभर कर्मचारी की गतिविधियों को ट्रैक करेगा।

संगठनों ने मांग की है कि आवश्यकता से अधिक व्यक्तिगत जानकारी एकत्र न की जाए। डेटा संग्रह केवल उपस्थिति दर्ज करने के उद्देश्य तक सीमित होना चाहिए। शिक्षक की सहमति के बिना जानकारी का इस्तेमाल किसी दूसरे उद्देश्य के लिए नहीं किया जाना चाहिए।

शिक्षक संगठनों ने रखीं प्रमुख मांगें

शिक्षक संगठनों ने ई-अटेंडेंस व्यवस्था को लेकर विभाग से डेटा सुरक्षा नीति और थर्ड-पार्टी एजेंसी की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है। इसके अलावा सर्वर की लोकेशन, साइबर सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट, डेटा एक्सेस का अधिकार और जानकारी हटाने की प्रक्रिया स्पष्ट करने को कहा गया है।

संगठन चाहते हैं कि 17,817 लंबित शिकायतों का समयबद्ध निराकरण किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट उपलब्ध न होने की स्थिति में वैकल्पिक उपस्थिति व्यवस्था बनाई जाए और तकनीकी खराबी के कारण किसी शिक्षक का वेतन नहीं रोका जाए।

पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर

शिक्षक संगठनों का कहना है कि डिजिटल उपस्थिति व्यवस्था का उद्देश्य कर्मचारियों की जवाबदेही और स्कूलों में समयपालन सुनिश्चित करना है तो डेटा संभालने वाले विभाग और तकनीकी एजेंसी की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

शिक्षकों ने सरकार से मांग की है कि उनके प्रतिनिधियों और तकनीकी विशेषज्ञों के साथ बैठक आयोजित कर सभी शंकाओं का समाधान किया जाए। उनका कहना है कि पारदर्शी संवाद और मजबूत डेटा सुरक्षा व्यवस्था के बाद ही ई-अटेंडेंस जैसी प्रणाली पर कर्मचारियों का विश्वास बन सकेगा।

फिलहाल, ई-अटेंडेंस 3.0 को लेकर विरोध लगातार बढ़ रहा है। अब शिक्षा विभाग की विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार है। विभाग की ओर से डेटा सुरक्षा, थर्ड-पार्टी सर्वर और लंबित शिकायतों पर स्पष्ट जानकारी सामने आने के बाद ही यह तय होगा कि शिक्षकों की आशंकाएं कितनी दूर होती हैं।

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