उत्तर प्रदेश में गौशालाओं की दयनीय स्थिति
कुछ महीने पहले मेरठ की एक सरकारी गौशाला में गोवंश की मौतों के बाद हंगामा हुआ। मंत्री से लेकर अधिकारी तक गौशाला के निरीक्षण के लिए दौड़ पड़े। लगा कि अब व्यवस्था सुधर जाएगी और गोवंश की देखभाल बेहतर होगी।
इसी तरह बरेली की सरकारी गौशाला ‘कान्हा उपवन’ में 11 गोवंश की मौत के बाद भी प्रशासन और जनप्रतिनिधियों ने निरीक्षण किया। निरीक्षण के बाद फिर ऐसा लगा मानो सब कुछ ठीक हो गया हो। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल निरीक्षण से प्रदेश की सभी गौशालाओं की स्थिति सुधर गई?
क्या सभी गौशालाओं में गोवंश को पर्याप्त और पौष्टिक आहार मिल रहा है? क्या सभी बीमार गोवंश का समय पर और उचित उपचार हो रहा है? सरकारी पशु चिकित्सक महीने में कितनी बार गौशालाओं का निरीक्षण करते हैं और वहां उपलब्ध दवाओं तथा उपचार की वास्तविक स्थिति क्या है?
सड़कों पर क्यों घूम रहा है गोवंश?
जब सरकार की गौशालाएं संचालित हो रही हैं, तो मेरठ की माल रोड और बरेली की पीलीभीत रोड जैसे प्रमुख मार्गों पर गोवंश खुले में क्यों घूम रहा है? बरेली में ट्यूलिप ग्रैंड के सामने भी अक्सर 10-15 गायों के बैठे रहने की स्थिति दिखाई देती है।
यदि प्रशासन के पास गोवंश को सुरक्षित रखने के लिए गौशालाएं हैं, तो खुले में घूम रहे गोवंश को पकड़कर गौशालाओं तक पहुंचाने की व्यवस्था प्रभावी क्यों नहीं है? सड़कों पर घूमने वाला गोवंश न केवल स्वयं दुर्घटनाओं का शिकार हो सकता है, बल्कि वाहन चालकों और आम नागरिकों के लिए भी गंभीर खतरा बनता है।
मौत के बाद ही क्यों जागता है प्रशासन?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि शासन-प्रशासन किसी गौशाला में गोवंश की मौत की खबर सामने आने के बाद ही सक्रिय क्यों होता है? निरीक्षण और कार्रवाई के बाद कुछ समय तक व्यवस्था पर निगरानी रहती है और फिर स्थिति पहले जैसी होने की आशंका बनी रहती है।
जरूरत है कि गौशालाओं की निगरानी किसी घटना के बाद नहीं, बल्कि नियमित और पारदर्शी व्यवस्था के तहत हो।
हर महीने आए गौशालाओं की रिपोर्ट
प्रदेश के पशुधन विभाग को सभी जिलों की गौशालाओं की नियमित निगरानी करनी चाहिए। प्रत्येक जिले के जिलाधिकारी से हर महीने एक विस्तृत रिपोर्ट शासन को भेजी जानी चाहिए। इसमें स्पष्ट रूप से दर्ज हो—
- जिले में कुल कितनी गौशालाएं संचालित हैं।
- प्रत्येक गौशाला में कितने गोवंश हैं।
- पिछले महीने की तुलना में गोवंश की संख्या कितनी बढ़ी या घटी।
- कितने गोवंश बीमार हुए और कितनों का उपचार किया गया।
- कितने गोवंश की मृत्यु हुई और उसके कारण क्या रहे।
- कितने आवारा गोवंश पकड़े गए और उन्हें किस गौशाला में भेजा गया।
- पशु चिकित्सक ने प्रत्येक गौशाला का कितनी बार निरीक्षण किया।
ऐसी रिपोर्ट से कागजी दावों के बजाय वास्तविक स्थिति सामने आ सकेगी।
समाज का भी लिया जा सकता है सहयोग
यदि सरकार के पास गौशालाओं के लिए जगह या संसाधन कम पड़ रहे हैं और गोवंश की संख्या अधिक है, तो आवश्यकता के अनुसार नई गौशालाएं स्थापित की जानी चाहिए। इसके लिए सरकार समाज और सामाजिक संस्थाओं का सहयोग भी ले सकती है।
सनातन समाज में गोसेवा के प्रति गहरी आस्था है और लोग गोवंश के संरक्षण के लिए सहयोग देने को तैयार रहते हैं। इस सामाजिक भावना को व्यवस्थित रूप से गौशाला प्रबंधन से जोड़ा जा सकता है।
आवारा गोवंश को पकड़ने और गौशालाओं तक पहुंचाने के अभियान में प्रशासन स्वयंसेवी संगठनों और अधिकृत गौ-सेवा संगठनों का सहयोग भी ले सकता है, ताकि सरकारी तंत्र पर अकेले निर्भरता कम हो और अभियान प्रभावी बने।
निरीक्षण नहीं, स्थायी व्यवस्था चाहिए
गौशालाओं की समस्या का समाधान केवल मंत्री या अधिकारियों के अचानक निरीक्षण से नहीं होगा। इसके लिए नियमित निगरानी, पर्याप्त चारा, स्वच्छ पानी, चिकित्सकीय सुविधा, दवाओं की उपलब्धता, पर्याप्त स्थान और जवाबदेही सुनिश्चित करनी होगी।
गोवंश की मृत्यु के बाद सक्रिय होने के बजाय सरकार को ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि किसी गौशाला में स्थिति बिगड़ने की नौबत ही न आए।
गोवंश संरक्षण केवल धार्मिक भावना का विषय नहीं, बल्कि प्रशासनिक जिम्मेदारी और मानवीय संवेदना का भी प्रश्न है। उत्तर प्रदेश की गौशालाओं की वास्तविक स्थिति जानने और सुधारने के लिए अब नियमित निगरानी और पारदर्शी व्यवस्था आवश्यक है।
इंजी. कवि अतिवीर जैन ‘पराग’
पूर्व उपनिदेशक, रक्षा मंत्रालय
लेखक, कवि, स्तंभकार एवं साहित्यकार
मेरठ
