मनुष्य-भव दुर्लभ, जीवन अमूल्य : आचार्य विशुद्धसागर जी का प्रवचन
राजेश जैन दद्दू
नई दिल्ली, 03 सितंबर 2026
नई दिल्ली | दिगम्बर जैनाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी गुरुदेव ने दिल्ली स्थित ऋषभोदय में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि जीवन अमूल्य है और मनुष्य-भव पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। गुरुदेव ने अपने प्रवचन में जीवन की अनमोलता, आत्म-ज्ञान, हीन-भावना, विनय और सफलता के मूलमंत्र पर गहन चर्चा की।
मनुष्य-भव दुर्लभ, धन-धरती प्राप्त करना सरल
आचार्यश्री ने कहा कि धन-धरती प्राप्त करना सरल है, स्वर्ग आदि को एकत्रित किया जा सकता है, पद-प्रतिष्ठा पाना भी पुरुषार्थ-साध्य है, परन्तु मनुष्य-भव पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन है।
गुरुदेव ने कहा कि व्यक्ति अपने शरीर की सजावट में तो बहुत समय लगाता है, पर चेतना को निर्मल बनाने की ओर ध्यान नहीं देता। उन्होंने कहा कि तन का श्रृंगार न करो, चेतन को निर्मल करो। चित्त की निर्मलता ही भविष्य में पवित्र भव प्रदान करती है। कर्म सिद्धांत अत्यंत विचित्र और बलवान है – कर्म किसी को नहीं छोड़ता। कर्म के वेग में बड़े-बड़े सम्राट भी परास्त हो जाते हैं।
ज्ञानम सुखस्य कारणं – आत्म-ज्ञान सर्वश्रेष्ठ
गुरुदेव ने कहा कि संसार में सुख का एकमात्र कारण ज्ञान ही है। परंतु आत्म-ज्ञान सर्वश्रेष्ठ है। शास्त्र-पुराण का ज्ञान भिन्न है और आत्मानुभव रूप निराकुल परिणाम भिन्न हैं।उन्होंने एक सुन्दर उदाहरण देते हुए कहा – “जैसे कोई वैद्य है, पर वह कुपथ्य करना नहीं जानता तो वह रोग से अनजान है। वैसे ही शब्द-ज्ञान के साथ आत्म-ज्ञान भी होना चाहिए।”गुरुदेव ने कहा कि जीवन अमूल्य है, इसलिए इसका उपयोग केवल भौतिक संग्रह में न करके आत्म-कल्याण में करना चाहिए। जो सर्व-सत्य को जानता है और उसका आचरण करता है, वही सच्चा ज्ञानी है।
हीन-भावना महा-रोग, करती है शक्तिहीन
आचार्यश्री ने कहा कि हीन-भावना एक महा-रोग है, जो मानव को शक्तिहीन, निरुत्साह और निराश कर देती है। गुरुदेव ने कहा कि दुनिया में अनेक प्रकार के लोग हैं – कोई किसी के गुणों को नहीं देखना चाहता। हर कोई दूसरे के गुणों की वृद्धि सहन नहीं कर पाता।उन्होंने कहा कि जिनके साथ निवास करते हैं, उनके समक्ष भी अपने गुणों का प्रचार नहीं करना चाहिए। हीन-भावना अंधविचारों का जंजाल है जो काल्पनिक पागलपन की खाई में गिरा देता है। हीन-भावना में जीना और दूसरों को हीन-भावना में डालना, दोनों ही खतरनाक हैं। सज्जन पुरुष न स्वयं हीन-भावना में जीते हैं और न ही किसी अन्य को हीन-भावना में डालते हैं।
गगन में उड़ना है तो नमना सीखो – विनय का मंत्र
गुरुदेव ने कहा कि यदि आपको गगन जैसी ऊँचाइयाँ पानी हैं, तो विनम्र और विनयशील बनो। विनय व्यक्ति को महान बना देती है – लघुता ही प्रभुता प्रदान करती है। उठना है तो झुकना सीखो।आचार्यश्री ने कहा कि आपको प्रसिद्धि पाना है तो पहले सिद्धि प्राप्त करो और सिद्धि का मूल है विनय। विनय से गुणों में वृद्धि होती है और विनयवान को सब चाहते हैं।
सफलता का सूत्र – गम खाओ, कम खाओ, नम जाओ
आचार्यश्री ने सफलता का अनुपम सूत्र देते हुए कहा – “ऊँचाइयाँ पाना है तो गम खाओ, कम खाओ, नम जाओ।”इस सूत्र का अर्थ समझाते हुए गुरुदेव ने कहा:
- गम खाओ – स्वयं आगे बढ़ो और सबको आगे बढ़ाओ। विषमवाद की स्थिति में शांत रहो।
- कम खाओ – भूख से अधिक भोजन मत करो; कम खाओगे तो स्वस्थ रहोगे।
- नम जाओ – बड़ों के प्रति नम्र बनो; नम जाओगे तो संघर्ष नहीं होगा।
गुरुदेव ने कहा कि जीवन अमूल्य है – इसे स्वस्थ, सफल और नम्रता से युक्त बनाकर सार्थक करें।
चाह और चिंता से बचो, प्रसन्न रहना सीखो
गुरुदेव ने कहा कि जीवन में हमेशा प्रसन्न रहना सीखो। कष्ट में झुलो मत, सुखों में फूलो मत। चाह मत करो और चिंता से अपनी रक्षा करो। चाह और चिंता मनुष्य के लिए बहुत घातक हैं।आचार्यश्री ने कहा – “कभी धूप, कभी छाँव, कभी सुख, कभी दुःख – जीवन का यह चक्र निरंतर प्रवाहमान है।” जो कुछ हो रहा है, उसे तटस्थ भाव से स्वीकारो और राग-द्वेष-मोह की मदिरा का त्याग करो।
जीवन अमूल्य, आत्म-कल्याण में करें उपयोग
आचार्य विशुद्धसागर जी के प्रवचनों का सार यह है कि जीवन अमूल्य है और मनुष्य-भव पुनः प्राप्त करना अत्यंत कठिन है। इस अनमोल जीवन का उपयोग आत्म-ज्ञान, विनय, सदाचार और सत्याचरण में करना चाहिए।गुरुदेव ने कहा कि हीन-भावना से बचते हुए, गम खाओ, कम खाओ, नम जाओ के सूत्र को अपनाकर सफलता प्राप्त की जा सकती है। सत्य को जानो, सत्य मानो और सत्य का आचरण करो – यही जीवन अमूल्य है का सार्थक उपयोग है।

