भोपाल में 40 साल पुराना रास्ता बंद करने पर बवाल, अर्थी लेकर सड़क पर बैठे ग्रामीण
बरेला गांव के वार्ड-7 का मामला; रास्ते पर पत्थर-मिट्टी डालने और गड्ढे खोदने का आरोप, विरोध में 100 से ज्यादा महिलाएं पहुंचीं कलेक्ट्रेट, कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद खुला रास्ता
भोपाल। राजधानी भोपाल के बरेला गांव के वार्ड क्रमांक-7 में करीब 40 साल से इस्तेमाल किए जा रहे रास्ते को बंद किए जाने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों पुराने रास्ते को खोदकर उसमें बड़े-बड़े गड्ढे कर दिए गए और पत्थर व मिट्टी डालकर आवागमन बाधित कर दिया गया। रास्ता बंद होने से ग्रामीणों को रोजमर्रा की आवाजाही में परेशानी का सामना करना पड़ा। मामला उस समय और गंभीर हो गया, जब गांव में एक शवयात्रा को निकलने के लिए रास्ता नहीं मिला और ग्रामीण अर्थी लेकर सड़क पर बैठ गए।
रास्ता बंद किए जाने के विरोध में गांव की महिलाओं ने भी मोर्चा खोल दिया। 100 से अधिक महिलाएं भोपाल कलेक्ट्रेट पहुंचीं और प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप कर रास्ता खुलवाने की मांग की। ग्रामीणों के विरोध और मामला प्रशासन तक पहुंचने के बाद दोनों पक्षों के बीच बातचीत कराई गई। बताया गया है कि कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद समझौता हुआ और रास्ता खोल दिया गया, हालांकि रास्ते को लेकर विवाद और ग्रामीणों का असंतोष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।
40 साल से इस्तेमाल हो रहे रास्ते को बंद करने का आरोप
बरेला गांव के वार्ड क्रमांक-7 के ग्रामीणों का कहना है कि जिस रास्ते को लेकर विवाद हुआ, उसका उपयोग करीब चार दशक से किया जा रहा है। ग्रामीण इसी मार्ग से अपने घरों तक आने-जाने के साथ रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए आवाजाही करते रहे हैं।
ग्रामीणों के मुताबिक रास्ता अचानक बंद किए जाने से कई परिवारों के सामने आवागमन की समस्या खड़ी हो गई। लोगों का कहना है कि लंबे समय से सार्वजनिक रूप से इस्तेमाल किए जा रहे मार्ग को बंद किए जाने से पहले ग्रामीणों की सुविधा और वैकल्पिक रास्ते की व्यवस्था पर ध्यान दिया जाना चाहिए था।
रास्ते के बंद होने के बाद ग्रामीणों ने इसका विरोध शुरू कर दिया और प्रशासन से इसे पहले की तरह आवागमन के लिए खोलने की मांग की।
रास्ते पर पत्थर और मिट्टी डालने का आरोप
ग्रामीणों का आरोप है कि रास्ते को केवल अवरुद्ध ही नहीं किया गया, बल्कि कई स्थानों पर खुदाई भी कराई गई। रास्ते और उसके आसपास बड़े-बड़े गड्ढे खोद दिए गए, जबकि मार्ग पर भारी पत्थर और मिट्टी के ढेर डाल दिए गए।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि गुफा मंदिर के महंत रामप्रवेश दास की ओर से रास्ता बंद करवाया गया। हालांकि यह ग्रामीणों का आरोप है और रास्ते के स्वामित्व तथा इसे बंद करने के अधिकार को लेकर संबंधित पक्षों की स्थिति प्रशासनिक जांच और दस्तावेजों के आधार पर स्पष्ट होना बाकी है।
रास्ते की स्थिति के कारण पैदल चलने वाले लोगों के साथ वाहनों की आवाजाही भी प्रभावित होने की बात ग्रामीणों ने कही है।
शवयात्रा के लिए नहीं मिला रास्ता तो बढ़ा विवाद
रास्ते का विवाद उस समय गंभीर हो गया, जब गांव में एक व्यक्ति की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार के लिए शवयात्रा निकाली जा रही थी। ग्रामीणों के अनुसार रास्ता बंद होने के कारण अर्थी को आगे ले जाने में परेशानी हुई।
इससे नाराज ग्रामीण अर्थी लेकर सड़क पर ही बैठ गए और रास्ता खुलवाने की मांग करने लगे। अंतिम संस्कार जैसे संवेदनशील और जरूरी कार्य के दौरान रास्ता न मिलने से ग्रामीणों में आक्रोश और बढ़ गया।
अर्थी के साथ ग्रामीणों के सड़क पर बैठने के बाद मामला तेजी से चर्चा में आया। मौके पर कुछ समय के लिए तनाव जैसी स्थिति भी बनी। ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की कि वर्षों से इस्तेमाल किए जा रहे मार्ग को तत्काल खोला जाए, ताकि गांव के लोगों को आवागमन में परेशानी न हो।
100 से ज्यादा महिलाओं ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर जताया विरोध
रास्ते को लेकर चल रहा विवाद केवल गांव तक सीमित नहीं रहा। गांव की बड़ी संख्या में महिलाओं ने भोपाल कलेक्ट्रेट पहुंचकर प्रशासन के सामने अपनी समस्या रखी। 100 से अधिक महिलाओं ने कलेक्ट्रेट पहुंचकर विरोध जताया और रास्ता खुलवाने की मांग की।
महिलाओं का कहना था कि रास्ता बंद होने का सीधा असर गांव में रहने वाले परिवारों पर पड़ रहा है। बच्चों, बुजुर्गों और महिलाओं सहित आम ग्रामीणों को आने-जाने में परेशानी हो रही है।
महिलाओं ने प्रशासन से मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और ऐसी व्यवस्था सुनिश्चित करने की मांग की, जिससे भविष्य में मार्ग को लेकर ग्रामीणों को दोबारा ऐसी स्थिति का सामना न करना पड़े।
रोजमर्रा की आवाजाही से अंतिम संस्कार तक परेशानी
ग्रामीणों के मुताबिक विवादित रास्ता उनके लिए महज एक सामान्य मार्ग नहीं है, बल्कि दैनिक जीवन की आवाजाही का महत्वपूर्ण माध्यम है। वर्षों से इसका इस्तेमाल होने के कारण गांव के लोग इसी रास्ते से आने-जाने के अभ्यस्त हैं।
ग्रामीणों का कहना है कि रास्ता बंद होने के बाद उन्हें वैकल्पिक मार्ग तलाशना पड़ रहा था। सबसे गंभीर स्थिति शवयात्रा के दौरान बनी, जिससे यह सवाल भी उठा कि आपातकालीन परिस्थितियों या अंतिम संस्कार जैसे आवश्यक कार्यों में यदि मार्ग उपलब्ध न हो तो ग्रामीणों के पास क्या विकल्प होगा।
इसी कारण ग्रामीण अब केवल अस्थायी रूप से रास्ता खुलवाने के बजाय मामले का स्थायी समाधान चाहते हैं।
कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद दोनों पक्षों में बातचीत
मामला भोपाल जिला प्रशासन तक पहुंचने के बाद अधिकारियों ने हस्तक्षेप किया। जानकारी के मुताबिक कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद विवाद से जुड़े दोनों पक्षों के बीच बातचीत हुई।
बातचीत और समझौते के बाद फिलहाल रास्ता खोल दिया गया है। इससे ग्रामीणों को तत्काल राहत मिली है। हालांकि रास्ते के उपयोग, स्वामित्व और भविष्य में इसे लेकर किसी प्रकार का विवाद दोबारा न हो, इसे लेकर ग्रामीण स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं।
रास्ता खुला, लेकिन विवाद का स्थायी समाधान जरूरी
प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद रास्ता खुलने से गांव के लोगों की तत्काल समस्या कम हुई है, लेकिन पूरा मामला ग्रामीण क्षेत्रों में पुराने और परंपरागत रास्तों को लेकर होने वाले विवादों की ओर भी ध्यान खींचता है।
यदि कोई रास्ता दशकों से बड़ी आबादी के आवागमन के लिए उपयोग किया जा रहा हो तो उससे जुड़े राजस्व रिकॉर्ड, जमीन के स्वामित्व और सार्वजनिक उपयोग की स्थिति को स्पष्ट करना महत्वपूर्ण हो जाता है। इससे भविष्य में दोनों पक्षों के बीच विवाद की संभावना कम की जा सकती है।
फिलहाल बरेला गांव के ग्रामीणों की नजर प्रशासन की आगे की कार्रवाई पर है। ग्रामीण चाहते हैं कि जिस रास्ते का वे करीब 40 वर्षों से इस्तेमाल करने का दावा कर रहे हैं, उसे लेकर स्थिति स्पष्ट की जाए और ऐसा स्थायी समाधान निकाला जाए जिससे भविष्य में रोजमर्रा की आवाजाही या शवयात्रा जैसे जरूरी कार्यों में बाधा उत्पन्न न हो।
कलेक्टर के हस्तक्षेप के बाद रास्ता खुलने से राहत जरूर मिली है, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने स्थानीय स्तर पर आवागमन के अधिकार, पुराने रास्तों की स्थिति और प्रशासनिक समाधान को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
