ध्वनि की शक्ति से प्रभावित होते हैं मन, विचार और वातावरण : आचार्यश्री उदारसागर
वाणी का प्रभाव मन और शरीर पर भी पड़ता है
मुरैना। (मनोज जैन नायक) शहर के बड़े जैन मंदिर में परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने प्रवचन के दौरान ध्वनि की शक्ति और उसके जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव को विस्तार से समझाया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जो बोलता है, जिस भाव से बोलता है और जिस प्रकार बोलता है, उसका प्रभाव केवल सामने वाले व्यक्ति पर ही नहीं, बल्कि उसके अपने मन और शरीर पर भी पड़ता है।
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से वाणी का प्रयोग सोच-समझकर और मधुरता के साथ करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि मधुर वाणी व्यक्ति के जीवन में शांति लाने के साथ-साथ आसपास के वातावरण को भी सकारात्मक बनाती है।
मंत्र जाप और जिनवाणी का विशेष महत्व
आचार्यश्री ने कहा कि जैन धर्म में ध्वनि का विशेष महत्व है। णमोकार महामंत्र का जाप, मंत्रों का उच्चारण, स्तुति, स्वाध्याय और जिनवाणी का श्रवण मन को शांत करने तथा धार्मिक भावों को जागृत करने में सहायक होते हैं।
उन्होंने कहा कि मंत्र का उच्चारण केवल शब्दों के रूप में करने के बजाय श्रद्धा, एकाग्रता और शुद्ध भाव के साथ किया जाए तो उसका आध्यात्मिक प्रभाव और अधिक गहरा हो जाता है।
घंटाध्वनि मन को भगवान की ओर करती है केंद्रित
आचार्यश्री ने मंदिर की घंटाध्वनि का उदाहरण देते हुए कहा कि जिनालय में प्रवेश करते समय घंटा बजाने की परंपरा के पीछे गहरा भाव निहित है। घंटी की आवाज आसपास के वातावरण में फैलती है और चंचल मन को कुछ क्षण के लिए बाहरी गतिविधियों से हटाकर जिनेन्द्र भगवान की ओर केंद्रित करने में सहायक होती है।
उन्होंने कहा कि घंटाध्वनि मानो संसार की भागदौड़ में उलझे मनुष्य को यह संदेश देती है कि अब कुछ क्षण रुककर अपने भीतर झांकने का समय है।
केवल घंटा बजाना नहीं, भीतर चेतना जगाना उद्देश्य
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि यदि मंदिर में घंटा बजाने के बाद व्यक्ति उसी क्रोध, अहंकार, लोभ और मोह को लेकर बाहर निकल आए तो घंटाध्वनि का वास्तविक उद्देश्य पूरा नहीं होता।
उन्होंने कहा कि घंटा केवल आवाज सुनाने का माध्यम नहीं है, बल्कि यह व्यक्ति को अपने भीतर चेतना की घंटी बजाने के लिए प्रेरित करता है। जब मंदिर की घंटाध्वनि के साथ व्यक्ति के भीतर भी आत्मजागरण की ध्वनि पैदा होगी, तभी धर्म उसके जीवन में सार्थक होगा।

वाणी को भी बनाएं मंदिर की घंटाध्वनि जैसा
आचार्यश्री ने श्रद्धालुओं से अपनी वाणी को भी मंदिर की घंटाध्वनि की तरह बनाने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि ऐसी वाणी होनी चाहिए जो किसी को दुखी न करे, किसी के मन में अशांति पैदा न करे और सुनने वाले के भीतर सद्भावना एवं सकारात्मकता को जागृत करे।
उन्होंने कहा कि मधुर वाणी स्वयं के लिए शांति का कारण बनती है और समाज में प्रेम, सद्भाव तथा सौहार्द का वातावरण तैयार करती है।
वाणी, विचार और व्यवहार में हो पवित्रता
आचार्यश्री ने कहा कि मनुष्य को अपनी वाणी, विचार और व्यवहार, तीनों को पवित्र बनाने का प्रयास करना चाहिए। वाणी में मिठास, विचारों में शुद्धता और व्यवहार में विनय होने पर व्यक्ति स्वयं भी शांत रहता है और उसके संपर्क में आने वाले लोगों को भी शांति का अनुभव होता है।
उन्होंने कहा कि ध्वनि की शक्ति को समझकर उसे सही दिशा में इस्तेमाल करना ही इसका वास्तविक उद्देश्य है।
मुनिश्री उपशांत सागर ने बताई धार्मिक स्थलों की मर्यादा
इस अवसर पर मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार मनुष्य भगवान के दर्शन और भक्ति के लिए मंदिर जाता है, उसी प्रकार देवगण भी जिनेन्द्र भगवान की भक्ति और दर्शन के लिए आते हैं।
उन्होंने कहा कि मंदिर, पर्वत, पहाड़, गुफा, कुआं अथवा तालाब जैसे धार्मिक एवं पवित्र स्थानों में प्रवेश करते समय मर्यादा और विनय का विशेष ध्यान रखना चाहिए।
मुनिश्री ने बताया कि ऐसे पवित्र स्थानों में प्रवेश करते समय ‘णिस्सहि-णिस्सहि’ का उच्चारण करना जैन परंपरा में विनय और मर्यादा का प्रतीक माना जाता है।
घंटाध्वनि से सकारात्मकता का संचार
मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने मंदिर में घंटा होने की महत्ता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि घंटाध्वनि वातावरण में सकारात्मकता का संचार करती है और श्रद्धालु के चंचल मन को एकाग्र करने में सहायक होती है।
उन्होंने कहा कि जब घंटाध्वनि के साथ भगवान के प्रति भक्ति और आत्मशुद्धि का भाव जुड़ता है, तब यही ध्वनि साधक के लिए आध्यात्मिक जागरण का माध्यम बन जाती है।

तीन श्रद्धालुओं ने बड़े पीतल के घंटे देने की घोषणा की
आचार्यश्री उदारसागर महाराज और मुनिश्री उपशांत सागर महाराज के प्रवचनों से प्रेरित होकर प्रेमचंद जैन, राजेंद्र जैन रज्जु और पंकज जैन मेडिकल ने तत्काल एक-एक बड़ा पीतल का घंटा देने की घोषणा की।
श्रद्धालुओं की इस पहल को धार्मिक आस्था और मंदिर की परंपराओं के प्रति समर्पण के रूप में देखा गया। प्रवचन के दौरान ध्वनि, वाणी, आत्मजागरण और धार्मिक मर्यादा के संदेश ने श्रद्धालुओं को अपने व्यवहार और विचारों में सकारात्मक बदलाव लाने की प्रेरणा दी।
