अडिग श्रद्धा और मंदिर की मर्यादा ही सच्ची धर्माराधना का आधार: आचार्यश्री उदारसागर महाराज
मुरैना के बड़े जैन मंदिर में धर्मसभा आयोजित; आचार्यश्री ने श्रद्धान और सम्यग्दर्शन का बताया महत्व, मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने मंदिर की मर्यादा और आत्मशुद्धि पर दिया संदेश
मुरैना (मनोज जैन नायक)। बड़े जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने श्रद्धान, सम्यग्दर्शन और धर्म को जीवन के आचरण में उतारने के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जैन दर्शन में श्रद्धा को सम्यग्दर्शन का महत्वपूर्ण अंग माना गया है। सच्ची श्रद्धा केवल भावनात्मक लगाव तक सीमित नहीं होती, बल्कि तत्त्वों के वास्तविक स्वरूप पर दृढ़ विश्वास और उस विश्वास के अनुरूप जीवन जीना ही वास्तविक श्रद्धान है।
धर्मसभा में मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने मंदिर और तीर्थक्षेत्र की मर्यादाओं के महत्व को समझाया। उन्होंने कहा कि मंदिर में प्रवेश करने से लेकर पूजा-अर्चना और बाहर निकलने तक श्रद्धालु के प्रत्येक व्यवहार में विनय, सावधानी और शुद्ध भाव होना आवश्यक है।
परिस्थितियां बदलें, लेकिन श्रद्धा नहीं डगमगानी चाहिए
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि व्यक्ति की श्रद्धा इतनी दृढ़ होनी चाहिए कि जीवन की बदलती परिस्थितियां उसे प्रभावित न कर सकें। जीवन में सुख-दुःख, लाभ-हानि, मान-अपमान और अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियां आती-जाती रहती हैं।
जिस व्यक्ति ने जिनेन्द्र भगवान के वीतराग स्वरूप और उनके बताए सत्य मार्ग को समझ लिया है, उसकी श्रद्धा बाहरी परिस्थितियों के कारण कमजोर नहीं होनी चाहिए। जिस भगवान को अपना आराध्य स्वीकार किया है, उनके प्रति विश्वास भी अटूट होना चाहिए।
जिनेन्द्र भगवान की वाणी आत्मकल्याण का मार्ग

आचार्यश्री ने कहा कि जिनेन्द्र भगवान की वाणी सत्य, अहिंसा, अनेकांत और आत्मकल्याण का मार्ग दिखाती है। उनका उपदेश किसी व्यक्ति को अपना अनुयायी बनाने के उद्देश्य से नहीं, बल्कि प्रत्येक जीव को उसके वास्तविक स्वरूप का बोध कराने के लिए है।
उन्होंने कहा कि यदि हमने जिनेन्द्र भगवान को अपना आराध्य माना है तो उनके सिद्धांतों, वाणी और बताए गए मोक्षमार्ग के प्रति भी उतनी ही दृढ़ श्रद्धा होनी चाहिए।
धर्म केवल बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसका प्रभाव मनुष्य के विचारों, व्यवहार और जीवनशैली में भी दिखाई देना चाहिए।
केवल भगवान के सामने सिर झुकाना श्रद्धा नहीं
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को समझाते हुए कहा कि भगवान के सामने सिर झुका देना मात्र सच्ची श्रद्धा का प्रमाण नहीं है। मंदिर जाकर दर्शन करना, पूजा-अभिषेक करना और उसके बाद जीवन में कोई परिवर्तन न लाना धर्म की पूर्णता नहीं कही जा सकती।
उन्होंने कहा कि धर्म का वास्तविक प्रभाव व्यक्ति के आचरण में दिखाई देना चाहिए। भगवान के दर्शन और आराधना के बाद यदि हमारे भीतर क्रोध कम होता है, क्षमा का भाव बढ़ता है, लोभ कम होता है, अहंकार घटता है और प्रत्येक जीव के प्रति करुणा उत्पन्न होती है, तभी आराधना को आत्मा तक पहुंचने वाली माना जा सकता है।
अपने भीतर के भगवान को प्रकट करने के लिए है धर्म
आचार्यश्री ने जैन दर्शन की व्याख्या करते हुए कहा कि यहां धर्म भगवान को प्रसन्न करने के लिए नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपे परमात्म स्वरूप को प्रकट करने के लिए किया जाता है।
जिनेन्द्र भगवान स्वयं सिद्ध अवस्था को प्राप्त कर चुके हैं। उनका उपदेश प्रत्येक जीव को उसी दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। इसलिए केवल श्रद्धा पर्याप्त नहीं, बल्कि उसके साथ सम्यक् ज्ञान और सम्यक् आचरण भी जीवन में आवश्यक हैं।
मनुष्य जब इन सिद्धांतों को व्यवहार में उतारता है, तभी उसकी आध्यात्मिक यात्रा वास्तविक रूप से आगे बढ़ती है।
मंदिर केवल भवन नहीं, आत्मचिंतन का पवित्र स्थान
आचार्यश्री ने मंदिर की महत्ता बताते हुए कहा कि मंदिर को केवल एक भवन के रूप में नहीं देखना चाहिए। मंदिर आत्मचिंतन, साधना और स्वयं को समझने का पवित्र स्थान है।
मंदिर में प्रवेश करते समय व्यक्ति के मन में यह भावना होनी चाहिए कि वह कुछ समय के लिए सांसारिक चिंताओं को बाहर छोड़कर अपने भीतर की यात्रा करने आया है।
उन्होंने कहा कि मंदिर में मर्यादा, मन में शांति और जिनेन्द्र भगवान के प्रति अडिग श्रद्धा का भाव हो, तभी धर्माराधना अधिक सार्थक बनती है।
मंदिर की मर्यादा भी धर्म का अंग: मुनिश्री उपशांतसागर
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने मंदिर एवं तीर्थक्षेत्र की मर्यादाओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि व्यक्ति शुभ भावनाओं को लेकर मंदिर में प्रवेश करता है, इसलिए उसके प्रत्येक व्यवहार में सावधानी और विनय दिखाई देना चाहिए।
मंदिर में प्रवेश करने, बैठने, भगवान की प्रतिमा के सामने रहने, पूजा-अर्चना करने और बाहर निकलने तक प्रत्येक क्रिया में मर्यादा का पालन आवश्यक है।
मुनिश्री ने कहा कि धार्मिक स्थान की पवित्रता को बनाए रखना प्रत्येक श्रद्धालु की जिम्मेदारी है।
मंदिर में अनावश्यक बातचीत और हंसी-मजाक से बचें
मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि मंदिर में अनावश्यक बातचीत, हंसी-मजाक, ऊंची आवाज में बोलना, क्रोध करना या अशांत व्यवहार करना उचित नहीं है।
यदि कोई व्यक्ति मंदिर में आने के बाद भी केवल सांसारिक चर्चाओं में व्यस्त रहता है तो उसका शरीर मंदिर में जरूर पहुंच गया है, लेकिन मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण अभी उसके भीतर प्रवेश नहीं कर पाया है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से मंदिर में शांत भाव रखते हुए भगवान के स्वरूप और स्वयं की आत्मा पर चिंतन करने का संदेश दिया।
बाहरी के साथ मन की शुद्धि भी जरूरी
मुनिश्री ने कहा कि मंदिर में प्रवेश के समय केवल शरीर की बाहरी शुद्धि पर्याप्त नहीं है। मन, वाणी और भावों की शुद्धता भी उतनी ही आवश्यक है।
यदि किसी व्यक्ति के मन में दूसरे के प्रति द्वेष है, वाणी में कठोरता है या भीतर अहंकार है तो भगवान के सामने खड़े होकर सबसे पहले इन दोषों को पहचानने और उन्हें दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
आत्मावलोकन ही व्यक्ति को अपनी कमजोरियों और विकारों को समझने का अवसर देता है।
प्रतिमा की वीतरागता को जीवन में उतारने का प्रयास करें
मुनिश्री उपशांतसागर महाराज ने कहा कि मंदिर मनुष्य को मौन, विनय, आत्मावलोकन और अपने भीतर के विकारों को पहचानने की प्रेरणा देता है।
जिनेन्द्र भगवान की प्रतिमा के दर्शन करते समय श्रद्धालु के भीतर यह भावना होनी चाहिए कि जिस वीतरागता को वह प्रतिमा में देख रहा है, उसी दिशा में स्वयं को भी आगे बढ़ाना है।
उन्होंने कहा कि मंदिर में दर्शन केवल एक धार्मिक परंपरा न बनें, बल्कि वे आत्मसुधार की प्रेरणा बनें। जब व्यक्ति मंदिर से लौटते समय अपने भीतर किसी एक बुराई को कम करने और किसी एक अच्छे गुण को बढ़ाने का संकल्प लेकर जाए, तभी मंदिर आने का उद्देश्य अधिक सार्थक हो सकता है।
धर्मसभा में आचार्यश्री उदारसागर महाराज और मुनिश्री उपशांतसागर महाराज की मंगलवाणी सुनने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। धर्मसभा के माध्यम से श्रद्धालुओं को अडिग श्रद्धा, आत्मचिंतन, सम्यक् आचरण और मंदिर की मर्यादा को जीवन में अपनाने का संदेश दिया गया।
