आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना ही आत्म कल्याण की दिशा : आचार्यश्री उदारसागर
मुरैना (मनोज जैन नायक)। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में चल रही प्रवचन श्रृंखला में चातुर्मासरत परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने सम्यग्दर्शन के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना और उसके प्रति दृढ़ श्रद्धा रखना ही आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
सम्यग्दर्शन के आठ अंगों में ‘नि:शंकित’ प्रथम अंग
आचार्यश्री ने बताया कि सम्यग्दर्शन तीन मूढ़ताओं से रहित तथा आठ अंगों से युक्त होता है। इनमें प्रथम अंग ‘नि:शंकित’ है। इसका अर्थ है कि तत्त्वों तथा सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति मन में किसी प्रकार का संशय नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि तत्त्व जैसा है, उसके वास्तविक स्वरूप को उसी रूप में दृढ़ता से स्वीकार करना सम्यग्दर्शन का मूल आधार है। मनुष्य के जीवन में अनेक प्रकार की शंकाएं और भ्रम बने रहते हैं। जब तक तत्त्वों का वास्तविक ज्ञान और उनके प्रति दृढ़ श्रद्धा उत्पन्न नहीं होती, तब तक आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त नहीं हो सकता।
राजा-मंत्री के उदाहरण से समझाया आत्मा का स्वरूप
आचार्यश्री ने राजा और मंत्री का दृष्टांत देते हुए आत्मा और परमात्मा के स्वरूप को सरलता से समझाया। उन्होंने बताया कि एक बार राजा ने अपने मंत्री से पूछा कि आत्मा और परमात्मा क्या हैं। मंत्री ने कहा कि उचित समय आने पर वह इसका उत्तर देगा।
कुछ समय बाद राजा घोड़े पर सवार होकर जा रहे थे। मंत्री ने उनसे पहले वचन लिया कि उत्तर देते समय राजा क्रोधित होकर उन्हें दंड नहीं देंगे। इसके बाद मंत्री ने राजा के हाथ से चाबुक लेकर उन्हें मार दिया। चाबुक लगने पर राजा को पीड़ा हुई और उन्होंने दर्द होने की बात कही।
मंत्री ने समझाया कि दर्द दिखाई नहीं देता, लेकिन उसका अनुभव करने वाला चेतन तत्व अवश्य है। वही चेतन तत्व आत्मा है। जब यही आत्मा कर्मों का क्षय कर पूर्ण ज्ञान, पूर्ण दर्शन और अनंत सुख को प्राप्त कर लेती है, तब वह परमात्मा कहलाती है।
शरीर से भिन्न है आत्मा
आचार्यश्री ने कहा कि आत्मा शरीर से भिन्न चेतन तत्व है। मनुष्य अज्ञानवश शरीर को ही अपना स्वरूप मानकर संसार में भटकता रहता है। आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझना और उसके प्रति दृढ़ श्रद्धान करना आत्मकल्याण की दिशा में आवश्यक कदम है।
उन्होंने कहा कि देव, शास्त्र और गुरु के प्रति दृढ़ श्रद्धा रखने के साथ जैन धर्म की मर्यादाओं, कुलाचारों और अहिंसा की भावना को जीवन में उतारना चाहिए। धर्म केवल सुनने या जानने की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे व्यवहार और आचरण में उतारना ही वास्तविक धर्म साधना है।

जल के उपयोग में जीवदया और सावधानी जरूरी : मुनिश्री उपशान्तसागर
मुनिश्री 108 उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि जीव जन्म-मरण के संसार चक्र में निरंतर भ्रमण कर रहा है। संसार के दुखों से मुक्त होकर मोक्ष की ओर बढ़ने के लिए सच्चे देव, शास्त्र और गुरु के प्रति दृढ़ श्रद्धान आवश्यक है। इसके साथ जैन कुलाचारों और अहिंसा के नियमों का पालन भी जीवन में जरूरी है।
जल की शुद्धि के साथ जीवदया का भाव
मुनिश्री ने जल की शुद्धि और जीवदया की भावना पर विशेष प्रकाश डालते हुए कहा कि जैन धर्म में पानी के उपयोग को लेकर भी सावधानी रखने की परंपरा है। उन्होंने जल को छानकर उपयोग करने तथा पानी से संबंधित धार्मिक मर्यादाओं का पालन करने की बात कही।
उन्होंने बताया कि पानी को छानकर उपयोग करने के पीछे केवल स्वच्छता का उद्देश्य नहीं है, बल्कि जल में मौजूद सूक्ष्म जीवों के प्रति जीवदया और अहिंसा की भावना भी निहित है। जैन धर्म प्रत्येक कार्य में सावधानी रखने और अनावश्यक जीव हिंसा से बचने की प्रेरणा देता है।
नई पीढ़ी में विकसित हों जीवदया के संस्कार
मुनिश्री ने कहा कि आधुनिक सुविधाओं के बढ़ने के साथ मनुष्य कई पारंपरिक सावधानियों को भूलता जा रहा है। ऐसे समय में नई पीढ़ी को जैन धर्म की परंपराओं के पीछे छिपे जीवदया, अहिंसा और संयम के भाव को समझाना आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि बच्चों में प्रारंभ से ही प्रत्येक जीव के प्रति करुणा और संवेदना के संस्कार विकसित किए जाने चाहिए। धार्मिक शिक्षा का उद्देश्य केवल पूजा-पाठ तक सीमित न रहकर जीवन में संयम, करुणा और अहिंसा की भावना विकसित करना होना चाहिए।
आचरण में धर्म उतारना ही वास्तविक साधना
मुनिश्री उपशान्तसागर महाराज ने कहा कि जैन धर्म केवल पूजा-पाठ अथवा मंदिर जाने तक सीमित नहीं है। यह जीवन के प्रत्येक व्यवहार में अहिंसा, संयम, करुणा और सावधानी अपनाने की प्रेरणा देता है।
उन्होंने कहा कि यदि गृहस्थ अपने दैनिक जीवन में छोटी-छोटी धार्मिक मर्यादाओं और जीवदया की भावना का पालन करें तो इससे आत्मशुद्धि के साथ समाज में भी अहिंसा और संवेदना का वातावरण निर्मित होगा। प्रवचन के माध्यम से श्रद्धालुओं को धर्म के सिद्धांतों को जीवन में उतारने और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया गया।
