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Nagda कॉलेज में 12वां राष्ट्रीय हथकरघा दिवस: व्याख्यान और क्विज़ से विद्यार्थियों ने जानी समृद्ध विरासत

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Published On: 8 August 2026
Nagda

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12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर व्याख्यान एवं ज्ञानवर्धक गतिविधियों का आयोजन

Nagda , 7 अगस्त। स्वामी विवेकानंद शासकीय महाविद्यालय, नागदा में प्राचार्य डॉ. पी. बी. रेड्डी के मार्गदर्शन में 12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के अवसर पर विशेष कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम स्वामी विवेकानंद करियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ एवं इतिहास विभाग के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ। आयोजन का उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय हथकरघा परंपरा, स्वदेशी आंदोलन के ऐतिहासिक महत्व, पारंपरिक उद्योगों की वर्तमान उपयोगिता तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था में हथकरघा क्षेत्र की भूमिका से परिचित कराना रहा।

कार्यक्रम के दौरान व्याख्यान, संवाद एवं ज्ञानवर्धक क्विज़ जैसी गतिविधियों के माध्यम से विद्यार्थियों को देश की समृद्ध हथकरघा विरासत से जोड़ा गया। आयोजन में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता करते हुए भारतीय संस्कृति, परंपरा और स्थानीय उद्योगों से जुड़े विषयों पर अपनी जानकारी का प्रदर्शन किया।National Handloom Day Celebrated in Nagda with Lecture

भारतीय परंपरा और हथकरघा का गहरा संबंध

कार्यक्रम के मुख्य वक्ता श्री प्रांजल रंजन अवस्थी, सहायक प्राध्यापक (इतिहास) रहे। उन्होंने अपने व्याख्यान में भारतीय हथकरघा परंपरा की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत में हथकरघा केवल कपड़ा तैयार करने की एक पारंपरिक विधि नहीं है, बल्कि यह देश की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है।

भारत के अलग-अलग क्षेत्रों में स्थानीय जलवायु, प्राकृतिक संसाधनों, सामाजिक परंपराओं और सांस्कृतिक मान्यताओं के अनुरूप विभिन्न प्रकार की बुनाई और वस्त्र निर्माण की परंपराएं विकसित हुईं। यही कारण है कि देश के अलग-अलग राज्यों की हथकरघा शैलियों में विविधता देखने को मिलती है।

हथकरघा उत्पादों में स्थानीय कला, कारीगरों की कुशलता और पीढ़ियों से चली आ रही तकनीकों का समावेश होता है। एक हथकरघा वस्त्र केवल एक परिधान नहीं होता, बल्कि उसके पीछे कारीगर का श्रम, समय, अनुभव और सांस्कृतिक विरासत जुड़ी होती है।

मुख्य वक्ता ने विद्यार्थियों को इस बात से अवगत कराया कि हथकरघा उद्योग भारतीय समाज में लंबे समय से रोजगार और आजीविका का महत्वपूर्ण साधन रहा है। ग्रामीण एवं अर्धशहरी क्षेत्रों में बड़ी संख्या में परिवार अपनी पारंपरिक बुनाई कला के माध्यम से आजीविका अर्जित करते हैं।

स्वदेशी आंदोलन और हथकरघा उद्योग

व्याख्यान के दौरान स्वदेशी आंदोलन की ऐतिहासिक भूमिका पर विशेष रूप से चर्चा की गई। श्री अवस्थी ने बताया कि स्वदेशी आंदोलन ने भारतीयों में अपने देश में निर्मित वस्तुओं के प्रति जागरूकता और आत्मसम्मान की भावना को मजबूत किया।

स्वदेशी आंदोलन केवल विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका व्यापक उद्देश्य भारतीय उत्पादों, कारीगरों और स्थानीय उद्योगों को प्रोत्साहन देना भी था। इस आंदोलन ने भारतीय हथकरघा उद्योग को नई दिशा प्रदान की और स्थानीय उत्पादन को राष्ट्रीय चेतना से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

उन्होंने विद्यार्थियों को बताया कि उस दौर में भारतीय कपड़ा उद्योग और पारंपरिक कारीगरों के सामने अनेक चुनौतियां थीं। ऐसे समय में स्वदेशी विचारधारा ने भारतीय समाज को स्थानीय उत्पादों के महत्व का एहसास कराया।

स्वदेशी आंदोलन से जुड़ी यह ऐतिहासिक विरासत आज भी प्रासंगिक है। वर्तमान समय में स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा देना, छोटे उद्योगों को प्रोत्साहित करना और पारंपरिक कौशल को संरक्षित करना आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है।

आत्मनिर्भर भारत में हथकरघा की भूमिका

मुख्य वक्ता ने हथकरघा उद्योग की वर्तमान प्रासंगिकता पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को मजबूत करने में स्थानीय उद्योगों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

हथकरघा क्षेत्र में बड़ी मात्रा में मशीनरी आधारित बड़े निवेश की आवश्यकता नहीं होती और इसमें पारंपरिक कौशल का उपयोग होता है। इसके कारण यह क्षेत्र विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने की क्षमता रखता है।

हथकरघा से जुड़े कारीगर अपने पारंपरिक कौशल के माध्यम से न केवल परिवार की आजीविका चलाते हैं, बल्कि देश की सांस्कृतिक पहचान को भी आगे बढ़ाते हैं। यदि स्थानीय हथकरघा उत्पादों को बाजार, तकनीक, डिजाइन, ब्रांडिंग और उचित मूल्य उपलब्ध कराया जाए, तो इस क्षेत्र में रोजगार और आर्थिक विकास की व्यापक संभावनाएं हैं।

उन्होंने विद्यार्थियों से आह्वान किया कि वे स्थानीय उत्पादों को समझें, उनके महत्व को पहचानें और अपनी क्षमता के अनुसार स्वदेशी तथा पारंपरिक उत्पादों को प्रोत्साहित करें।

विद्यार्थियों को कराया गया भारतीय हथकरघा विरासत से परिचित

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य विद्यार्थियों को भारत के विभिन्न राज्यों की प्रसिद्ध हथकरघा परंपराओं से परिचित कराना भी रहा। भारत की भौगोलिक और सांस्कृतिक विविधता के अनुरूप यहां अनेक विशिष्ट हथकरघा शैलियां विकसित हुई हैं।

विद्यार्थियों को बताया गया कि मध्य प्रदेश की चंदेरी और महेश्वरी, महाराष्ट्र की पैठणी, असम की मूगा सिल्क, गुजरात की पटोला, तमिलनाडु की कांचीवरम, जम्मू-कश्मीर की पश्मीना तथा तेलंगाना और ओडिशा की इकत जैसी परंपराएं अपनी विशिष्ट पहचान रखती हैं।

इन वस्त्र परंपराओं में रंग, डिजाइन, बुनाई की तकनीक और स्थानीय सांस्कृतिक प्रतीकों का अनूठा समावेश देखने को मिलता है। इनके माध्यम से भारत की सांस्कृतिक विविधता और रचनात्मकता का परिचय मिलता है।

ज्ञानवर्धक क्विज़ से बढ़ी विद्यार्थियों की रुचि

व्याख्यान के उपरांत विद्यार्थियों की सक्रिय सहभागिता सुनिश्चित करने के लिए एक ज्ञानवर्धक क्विज़ गतिविधि का आयोजन किया गया। क्विज़ का संचालन सुश्री उर्वी मिश्रा, सहायक प्राध्यापक (अर्थशास्त्र) एवं संयोजक, स्वामी विवेकानंद करियर मार्गदर्शन प्रकोष्ठ द्वारा किया गया।

क्विज़ में विद्यार्थियों से भारत की विभिन्न हथकरघा परंपराओं, प्रमुख वस्त्र शैलियों, उनके भौगोलिक क्षेत्रों तथा ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़े प्रश्न पूछे गए।

मध्य प्रदेश की चंदेरी एवं महेश्वरी साड़ियों से लेकर महाराष्ट्र की पैठणी, असम के मूगा सिल्क, गुजरात के पटोला, तमिलनाडु की कांचीवरम, जम्मू-कश्मीर की पश्मीना और तेलंगाना एवं ओडिशा की इकत जैसी विभिन्न परंपराओं से जुड़े प्रश्नों ने विद्यार्थियों की रुचि बढ़ाई।

इसके साथ ही स्वदेशी आंदोलन, हथकरघा उद्योग की विशेषताओं, पारंपरिक उद्योगों की भूमिका और स्थानीय उत्पादों के महत्व से संबंधित प्रश्न भी शामिल किए गए।

उत्साह के साथ शामिल हुए विद्यार्थी

क्विज़ गतिविधि में विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। उन्होंने प्रश्नों के उत्तर देने के साथ-साथ विभिन्न हथकरघा परंपराओं से संबंधित नई जानकारियां भी प्राप्त कीं।

इस गतिविधि का विशेष महत्व इसलिए रहा क्योंकि विद्यार्थियों को केवल व्याख्यान के माध्यम से जानकारी देने के बजाय उन्हें सहभागिता आधारित गतिविधि से जोड़ा गया। इससे कार्यक्रम अधिक रोचक और ज्ञानवर्धक बना।

विद्यार्थियों की सक्रिय भागीदारी ने यह भी दर्शाया कि यदि ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक विषयों को रोचक गतिविधियों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाए, तो युवा पीढ़ी उनमें गहरी रुचि ले सकती है।

क्विज़ के अंत में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले विद्यार्थियों को प्रोत्साहित किया गया। इस अवसर पर विद्यार्थियों को निरंतर अध्ययन करने तथा देश की सांस्कृतिक एवं पारंपरिक विरासत को जानने के लिए प्रेरित किया गया।

स्थानीय उद्योगों के प्रति जागरूकता जरूरी

कार्यक्रम में इस बात पर भी जोर दिया गया कि पारंपरिक उद्योगों के संरक्षण के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं हैं। समाज और उपभोक्ताओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

जब लोग स्थानीय और पारंपरिक उत्पाद खरीदते हैं, तो उसका सीधा लाभ कारीगरों और उनके परिवारों तक पहुंचता है। इससे पारंपरिक कौशल को जीवित रखने में सहायता मिलती है और नई पीढ़ी भी इन व्यवसायों से जुड़ने के लिए प्रेरित होती है।

हथकरघा उत्पादों को बढ़ावा देने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिल सकती है। साथ ही यह देश की सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने में भी सहायक है।

विद्यार्थियों के लिए सीख और संदेश

कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को यह संदेश दिया गया कि भारत की प्रगति केवल आधुनिक तकनीक और उद्योगों से नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं और स्थानीय कौशल को संरक्षित करते हुए भी संभव है।

आधुनिक बाजार में हथकरघा क्षेत्र के सामने मशीन निर्मित वस्त्रों से प्रतिस्पर्धा, बदलती उपभोक्ता पसंद और बाजार तक सीमित पहुंच जैसी चुनौतियां हैं। ऐसे में तकनीकी नवाचार, आधुनिक डिजाइन, डिजिटल प्लेटफॉर्म, बेहतर विपणन और युवाओं की भागीदारी इस क्षेत्र को नई दिशा दे सकती है।

विद्यार्थी भविष्य में उद्यमिता, डिजाइन, विपणन, पर्यटन और अन्य क्षेत्रों के माध्यम से हथकरघा उद्योग के विकास में योगदान दे सकते हैं।

सार्थक रहा आयोजन

12वें राष्ट्रीय हथकरघा दिवस पर आयोजित यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए ज्ञानवर्धक और प्रेरणादायी रहा। व्याख्यान के माध्यम से उन्हें स्वदेशी आंदोलन की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और भारतीय हथकरघा उद्योग के महत्व की जानकारी मिली, जबकि क्विज़ के माध्यम से उन्होंने देश की विभिन्न हथकरघा परंपराओं के बारे में अपनी जानकारी को और समृद्ध किया।

कार्यक्रम का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को भारतीय हथकरघा परंपरा, स्वदेशी आंदोलन, स्थानीय उद्योगों और ग्रामीण आजीविका के महत्व से परिचित कराना था। आयोजन ने विद्यार्थियों में भारतीय पारंपरिक उद्योगों के प्रति जागरूकता उत्पन्न करने के साथ-साथ अपनी सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण की भावना को भी मजबूत किया।

इस प्रकार राष्ट्रीय हथकरघा दिवस का आयोजन केवल एक औपचारिक कार्यक्रम न रहकर विद्यार्थियों के लिए इतिहास, अर्थव्यवस्था, संस्कृति और आत्मनिर्भरता से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारियां प्राप्त करने का अवसर बना।

नागदा से जीवनलाल जैन की रिपोर्ट।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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