राष्ट्रसंत सारस्वताचार्य श्री देवनंदी जी महाराज का 64वां जन्म जयंती महामहोत्सव : णमोकार तीर्थ में आस्था, साधना और सेवा का अद्भुत संगम
आध्यात्मिक चेतना के केंद्र के रूप में विकसित हो रहा णमोकार तीर्थ
नाशिक (महाराष्ट्र)। प्रज्ञाश्रमण, सर्वोदयी राष्ट्रसंत, सारस्वताचार्य एवं वात्सल्य रत्नाकर पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री देवनंदी जी महाराज का 64वां जन्म जयंती महामहोत्सव वर्ष 2026 में विशेष आध्यात्मिक एवं धार्मिक वातावरण में मनाया जा रहा है। 15 अगस्त 1963 को बुंदेलखंड की शाहगढ़ नगरी में जन्मे आचार्य श्री देवनंदी जी महाराज ने धर्म, अध्यात्म, समाजोत्थान और तीर्थ विकास के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किए हैं। उनके मार्गदर्शन और संकल्प से नाशिक जिले में स्थित णमोकार तीर्थ आज श्रद्धा, साधना, सेवा और आध्यात्मिक चेतना का महत्वपूर्ण केंद्र बनकर उभरा है।
इस वर्ष जन्म जयंती का अवसर देश के स्वतंत्रता दिवस के साथ भी जुड़ रहा है। ऐसे में राष्ट्रप्रेम, अध्यात्म और संस्कारों का यह समागम श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
सिद्ध क्षेत्रों के मध्य स्थित है णमोकार तीर्थ
मुंबई-आगरा हाईवे क्रमांक 3 पर मोहाड़ी (मांसले), तहसील चांदवड़, जिला नाशिक में स्थित णमोकार तीर्थ सिद्ध क्षेत्र गजपंथा और सिद्ध क्षेत्र मांगीतुंगी की पर्वतीय श्रृंखलाओं के मध्य स्थित है। प्राकृतिक सौंदर्य से घिरा यह क्षेत्र धार्मिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से भी विशेष महत्व रखता है। मनमाड़, नासिक, शिरडी और त्र्यंबकेश्वर जैसे प्रमुख धार्मिक स्थलों के समीप होने के कारण यहां आने वाले श्रद्धालुओं के लिए तीर्थ यात्रा का विशेष आध्यात्मिक अनुभव निर्मित होता है।
तीर्थ की स्थापना और विकास की परिकल्पना परमपूज्य गणाचार्य 108 श्री कुंथु सागर जी महाराज के आशीर्वाद तथा उनके उत्तराधिकारी परम शिष्य सारस्वताचार्य 108 श्री देवनंदी जी महाराज की दूरदृष्टि से हुई। अल्प अवधि में यहां जिस प्रकार धार्मिक एवं सामाजिक सुविधाओं का विस्तार हुआ है, वह श्रद्धालुओं और तीर्थयात्रियों के लिए आकर्षण का विषय है।
बोलते हुए णमोकार मंत्र पर आधारित भव्य समवशरण
णमोकार तीर्थ की प्रमुख विशेषताओं में 5.5 एकड़ क्षेत्र में निर्मित लगभग 108 फीट ऊंचा समवशरण विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसे णमोकार महामंत्र की आध्यात्मिक अवधारणा से जोड़ा गया है। समवशरण परिसर में पंचपरमेष्ठी की विशाल प्रतिमाएं और भगवान चंद्रप्रभु की मनोहारी प्रतिमा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक अनुभूति प्रदान करती हैं।
सफेद संगमरमर से निर्मित लगभग 32 फीट ऊंची भगवान चंद्रप्रभु की प्रतिमा, त्रिकाल चौबीसी, 24 जिनालय, नवदेवता, नंदीश्वर द्वीप, पंचमेरु तथा पद्मावती माता के विभिन्न स्वरूपों की प्रतिमाएं तीर्थ की धार्मिक भव्यता को बढ़ाती हैं। इसके अलावा 51 फीट ऊंची अरिहंत प्रतिमा तथा पंचपरमेष्ठी की विशाल प्रतिमाएं भी यहां श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र हैं।

आधुनिक सुविधाओं के साथ धार्मिक पर्यटन का केंद्र
तीर्थ परिसर में श्रद्धालुओं की सुविधा को ध्यान में रखते हुए नौका विहार और मिनी ट्रेन जैसी व्यवस्थाएं भी विकसित की गई हैं। णमोकार आराधना केंद्र, डिजिटल प्रभावना केंद्र, गुरुमंदिर, प्राचीन तीर्थंकर प्रतिमाओं का संग्रह, ग्रंथालय, संत भवन, धर्मशाला, मंगल कार्यालय सहित विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक सुविधाओं का विकास किया गया है।
इन निर्माण कार्यों ने एक समय अपेक्षाकृत दुर्गम दिखाई देने वाली भूमि को सुव्यवस्थित धार्मिक परिसर का स्वरूप प्रदान किया है। तीर्थ के विकास से जुड़े लोगों का मानना है कि यह केवल निर्माण गतिविधि नहीं, बल्कि गुरु संकल्प और सामूहिक सहयोग का परिणाम है।
पंचकल्याणक एवं महामस्तकाभिषेक ने बनाया ऐतिहासिक अवसर
णमोकार तीर्थ में अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पंचकल्याणक महामहोत्सव का आयोजन 6 फरवरी से 13 फरवरी 2026 तक किया गया, जबकि महामस्तकाभिषेक कार्यक्रम 25 फरवरी 2026 तक संपन्न हुआ। बाल ब्रह्मचारिणी वैशाली दीदी की प्रस्तावना तथा ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री नीलम जी (अजमेर) और श्री संतोष पैंढारी (नागपुर) की अध्यक्षता में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में देश के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु, साधु-साध्वियां, आचार्य एवं तपस्वी शामिल हुए।
महामहोत्सव के दौरान 30 से अधिक जैनाचार्यों का सानिध्य तथा 400 से अधिक साधु-साध्वियों एवं तपस्वियों की उपस्थिति ने आयोजन को विशेष आध्यात्मिक गरिमा प्रदान की। विशाल स्तर पर हुई व्यवस्थाओं में अनुशासन और सेवा भावना का परिचय देखने को मिला।
समवशरण के दर्शन ने श्रद्धालुओं को किया भाव-विभोर
महामहोत्सव के दौरान निर्मित और सजाए गए समवशरण परिसर का वातावरण श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहा। चंद्रमा की शीतल रोशनी में श्वेत समवशरण, चारों ओर प्रवाहित जलधारा और आकाश के प्रतिबिंब ने वातावरण को अत्यंत मनोहारी बना दिया।
श्रद्धालुओं के लिए यह अनुभव केवल स्थापत्य की भव्यता देखने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि जैन दर्शन में वर्णित समवशरण की आध्यात्मिक कल्पना को निकट से अनुभव करने का अवसर भी बना। पंचपरमेष्ठी की उत्तुंग प्रतिमाओं और भगवान चंद्रप्रभु के दर्शन से श्रद्धालुओं में आध्यात्मिक भाव जागृत हुए।

अतिशय एवं आस्था से जुड़ी घटनाएं बनीं आकर्षण का केंद्र
णमोकार तीर्थ को श्रद्धालु अतिशययुक्त स्थली के रूप में भी मानते हैं। तीर्थ परिसर में ऋषि पंचमी जैसे पावन अवसर पर नाग-नागिन के युगल के गुरुदेव के समीप आने और लगभग 35 मिनट तक वहां रहने की घटना का उल्लेख श्रद्धालु विशेष आस्था के साथ करते हैं। उपस्थित लोगों ने इसे आध्यात्मिक वातावरण से जुड़ी अद्भुत अनुभूति के रूप में देखा।
तीर्थ से जुड़ी ऐसी घटनाओं ने श्रद्धालुओं की आस्था को और गहरा किया है। हालांकि इन घटनाओं को श्रद्धा और धार्मिक विश्वास के संदर्भ में ही देखा जाता है, लेकिन इनके कारण तीर्थ की आध्यात्मिक पहचान और मजबूत हुई है।
एक संकल्प से साकार हुई तीर्थ की भव्यता
णमोकार तीर्थ के विकास की यात्रा को करीब से देखने वाले श्रद्धालुओं के अनुसार लगभग डेढ़ दशक पहले यहां सीमित संसाधनों के बीच धार्मिक गतिविधियां प्रारंभ हुई थीं। उस समय साधारण टीनशेड और तख्त के आसपास से शुरू हुई गतिविधियां आज विशाल धर्मशालाओं, मंडपों, कॉटेज और सुव्यवस्थित धार्मिक परिसर के रूप में दिखाई देती हैं।
इसी परिवर्तन को गुरुदेव के संकल्प और दूरदृष्टि का परिणाम माना जाता है। तीर्थ परिसर की वर्तमान भव्यता को देखकर यह सहज विश्वास करना कठिन लगता है कि कभी यही स्थान सीमित सुविधाओं वाला क्षेत्र था। निर्माण और व्यवस्थाओं से जुड़े लोगों के लिए भी इतनी बड़ी परियोजना को कम समय में साकार करना चुनौतीपूर्ण रहा होगा।
गुरु के प्रति समर्पण और श्रद्धा का भाव
आचार्य श्री देवनंदी जी महाराज के अनुयायी उन्हें केवल धार्मिक गुरु के रूप में नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाले मार्गदर्शक के रूप में देखते हैं। उनके व्यक्तित्व के संदर्भ में कहा जाता है—
“यस्य वाचि शांतिः, दृष्टि में करुणा और चाल में मोक्षमार्ग हो—वे हैं आचार्य श्री देवनंदी जी महामुनिराज।”
उनका संदेश केवल धार्मिक उपदेशों तक सीमित नहीं, बल्कि आत्मसंयम, सेवा, अनुशासन और आध्यात्मिक उन्नति की प्रेरणा से जुड़ा है। उनके अनुयायियों के लिए गुरु चरणों में समर्पण जीवन को संस्कारित करने का माध्यम है।
णमोकार तीर्थ : श्रद्धा से सेवा तक की यात्रा
णमोकार तीर्थ आज केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं, बल्कि धार्मिक शिक्षा, साधना, सेवा और सामाजिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है। यहां विकसित ग्रंथालय, आराधना केंद्र, संत भवन, धर्मशाला और अन्य सुविधाएं तीर्थयात्रियों के साथ-साथ साधु-साध्वियों और धार्मिक गतिविधियों के लिए उपयोगी बन रही हैं।
तीर्थ के विकास में सामूहिक सहयोग और सेवा भावना की भूमिका भी महत्वपूर्ण रही है। यही कारण है कि श्रद्धालुओं के लिए यह स्थल केवल एक भव्य धार्मिक परिसर न होकर भावनात्मक और आध्यात्मिक जुड़ाव का केंद्र बन गया है।

जन्म जयंती पर श्रद्धालुओं से जुड़ने का आह्वान
सारस्वताचार्य श्री देवनंदी जी महाराज के 64वें जन्म जयंती महामहोत्सव का अवसर उनके अनुयायियों के लिए गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और उनके संदेश को जीवन में उतारने का अवसर है। यह अवसर आत्मचिंतन, संयम, सेवा और धर्म के प्रति समर्पण की प्रेरणा भी देता है।
गुरु परंपरा के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हुए कहा गया है—
“कर्ता करे न कर सके, गुरु करे सो होय।
सात द्वीप नौ खंड में, गुरु से बड़ा न कोय।”
और गुरु महिमा को व्यक्त करने वाली पंक्तियां आज भी श्रद्धालुओं के मन में श्रद्धा जगाती हैं—
“सात समुद्र की मसि करूं, लेखनी सब बनराय,
सब धरती कागद करूं, गुरु गुण लिखा न जाय।”
णमोकार तीर्थ की यात्रा इस भाव को सार्थक करती दिखाई देती है कि जब श्रद्धा के साथ संकल्प, साधना और सेवा जुड़ते हैं, तो एक विचार धीरे-धीरे एक विशाल आध्यात्मिक केंद्र का रूप ले सकता है।
आस्था, साधना और संस्कारों की जीवंत धरा
णमोकार तीर्थ आज श्रद्धालुओं के लिए आस्था का ऐसा केंद्र बन रहा है, जहां प्राकृतिक सौंदर्य, धार्मिक परंपरा, आधुनिक सुविधाएं और आध्यात्मिक साधना एक साथ दिखाई देती हैं। यहां की प्रत्येक गतिविधि गुरु परंपरा, जिनवाणी और आत्मकल्याण की भावना से जुड़ी हुई है।
आचार्य श्री देवनंदी जी महाराज की जन्म जयंती का यह अवसर केवल उत्सव मनाने का अवसर नहीं, बल्कि उनके विचारों और जीवन-संदेश को आत्मसात करने का अवसर भी है। उनके अनुयायियों के लिए गुरु से जुड़ना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्वपूर्ण है उस जुड़ाव को सेवा, साधना और संस्कारों में बनाए रखना।
इसी भाव के साथ णमोकार तीर्थ आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक संदेश देता है—श्रद्धा को जीवन में उतारें, साधना को आचरण बनाएं और गुरु के बताए मार्ग पर चलते हुए आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ें।
“जिंदगी संवारने को तो जिंदगी पड़ी है,
चलो वो लम्हा संवार लेते हैं, जहां जिंदगी खड़ी है।”
चरणों में नमन।
— पवन घुवारा (भूमिपुत्र)
