भिलाई विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार पर महिला कर्मचारी का वेतन हड़पने का आरोप, जांच में प्रथम दृष्टया पुष्टि के बाद हुई गिरफ्तारी
करीब 18 माह तक दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी से बेटे के खाते में राशि ट्रांसफर कराने का आरोप, समिति की रिपोर्ट के आधार पर दर्ज हुई एफआईआर
भिलाई। छत्तीसगढ़ के भिलाई स्थित हेमचंद यादव विश्वविद्यालय के रजिस्ट्रार भूपेंद्र कुमार कुलदीप पर एक दैनिक वेतनभोगी महिला कर्मचारी का वेतन कथित रूप से दबाव बनाकर अपने बेटे के खाते में ट्रांसफर कराने का गंभीर आरोप सामने आया है। मामले में विश्वविद्यालय की ओर से गठित जांच समिति ने आरोपों को प्रथम दृष्टया सही पाया, जिसके बाद पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धारा के तहत मामला दर्ज कर रजिस्ट्रार को गिरफ्तार किया। बाद में उन्हें नियमानुसार जमानत पर रिहा कर दिया गया। इस घटना ने विश्वविद्यालय प्रशासन और उच्च शिक्षा जगत में हलचल पैदा कर दी है।
महिला कर्मचारी ने लगाए गंभीर आरोप
जानकारी के अनुसार, शिकायतकर्ता शुभांगी मराठे दुर्ग के राजीव गांधी नगर की निवासी हैं और हेमचंद यादव विश्वविद्यालय में अर्द्धकुशल दैनिक वेतनभोगी कर्मचारी के रूप में कार्यरत हैं। उन्हें कलेक्टर दर के अनुसार प्रति माह लगभग 11,515 रुपये का वेतन मिलता था।
महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया कि रजिस्ट्रार भूपेंद्र कुमार कुलदीप उन्हें लगातार मानसिक दबाव और धमकी देकर उनके खाते में आने वाली अधिकांश वेतन राशि अपने बेटे के बैंक खाते में ऑनलाइन ट्रांसफर करवाते थे। महिला का कहना है कि वेतन खाते में आने के एक से तीन दिन के भीतर उनसे फोनपे और पेटीएम जैसे डिजिटल माध्यमों से राशि ट्रांसफर कराई जाती थी।
शिकायत के अनुसार, प्रत्येक महीने वेतन का अधिकांश हिस्सा ट्रांसफर हो जाने के बाद उनके पास घरेलू खर्च चलाने के लिए केवल लगभग दो हजार रुपये ही बचते थे। महिला ने यह भी आरोप लगाया कि उनसे रजिस्ट्रार के घर पर खाना बनवाने जैसे निजी कार्य भी कराए जाते थे।
कुलपति के निर्देश पर गठित हुई जांच समिति
मामले की शिकायत सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने इसे गंभीरता से लिया। कुलपति के निर्देश पर पूरे प्रकरण की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति का गठन किया गया। समिति को महिला कर्मचारी द्वारा लगाए गए आरोपों की तथ्यात्मक जांच कर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी दी गई।
समिति ने शिकायतकर्ता के बैंक खातों, वेतन भुगतान संबंधी दस्तावेजों तथा डिजिटल लेनदेन के रिकॉर्ड का गहन परीक्षण किया। जांच के दौरान लगभग 35 पन्नों के डिजिटल ट्रांजेक्शन रिकॉर्ड और बैंक स्टेटमेंट का विश्लेषण किया गया। समिति ने यह पता लगाने का प्रयास किया कि महिला के खाते से किस खाते में और किन परिस्थितियों में राशि ट्रांसफर हुई।
18 महीने के लेनदेन में सामने आई बड़ी गड़बड़ी
जांच रिपोर्ट के अनुसार, फरवरी 2025 से जुलाई 2026 के बीच महिला कर्मचारी के खाते में कुल 1,77,137 रुपये वेतन के रूप में जमा हुए। समिति की जांच में पाया गया कि इसी अवधि के दौरान कुल 1,49,384 रुपये कथित रूप से रजिस्ट्रार के बेटे के बैंक खाते में ट्रांसफर किए गए।
यदि इन आंकड़ों को देखा जाए तो महिला के कुल वेतन का लगभग 84.3 प्रतिशत हिस्सा दूसरे खाते में स्थानांतरित हुआ। समिति ने इसे प्रथम दृष्टया गंभीर वित्तीय अनियमितता मानते हुए अपनी रिपोर्ट विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपी।
समिति की रिपोर्ट के बाद दर्ज हुई एफआईआर
विश्वविद्यालय की जांच रिपोर्ट मिलने के बाद मामला पुलिस तक पहुंचा। पुलिस अधीक्षक के निर्देश पर मोहन नगर थाना में रजिस्ट्रार भूपेंद्र कुमार कुलदीप के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की संबंधित धारा के तहत एफआईआर दर्ज की गई।
पुलिस ने प्रारंभिक जांच के बाद आरोपी रजिस्ट्रार को गिरफ्तार किया। हालांकि, कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें तत्काल जमानत पर रिहा कर दिया गया। पुलिस का कहना है कि मामले की विस्तृत जांच जारी है और जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।
डिजिटल लेनदेन बने जांच का अहम आधार
इस मामले की जांच में सबसे महत्वपूर्ण भूमिका डिजिटल बैंकिंग रिकॉर्ड ने निभाई। बैंक स्टेटमेंट, यूपीआई ट्रांजेक्शन, फोनपे और पेटीएम के माध्यम से हुए भुगतान के रिकॉर्ड ने कथित लेनदेन की श्रृंखला को स्पष्ट करने में मदद की।
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल भुगतान व्यवस्था के कारण आर्थिक लेनदेन का पूरा रिकॉर्ड सुरक्षित रहता है, जिससे ऐसे मामलों की जांच अधिक पारदर्शी और तथ्य आधारित हो जाती है।
कार्यस्थल पर उत्पीड़न के आरोप भी चर्चा में
वित्तीय लेनदेन के आरोपों के अलावा महिला कर्मचारी ने यह भी आरोप लगाया है कि उनसे कार्यालयीन कार्यों के अतिरिक्त रजिस्ट्रार के निजी घरेलू कार्य भी कराए जाते थे। शिकायत में कहा गया कि उनसे कई बार घर पर खाना बनवाया जाता था। इन आरोपों की भी जांच की जा रही है और पुलिस ने इन्हें जांच के दायरे में रखा है।
यदि जांच में ये आरोप भी सही पाए जाते हैं तो यह मामला केवल आर्थिक शोषण तक सीमित न रहकर कार्यस्थल पर अधिकारों के दुरुपयोग और कर्मचारी उत्पीड़न का गंभीर उदाहरण माना जा सकता है।
विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका
मामला सामने आने के बाद विश्वविद्यालय प्रशासन ने जांच समिति गठित कर प्रारंभिक स्तर पर कार्रवाई की। उच्च शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों में समयबद्ध जांच को महत्वपूर्ण माना जाता है।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी विश्वविद्यालय में कर्मचारियों के साथ निष्पक्ष व्यवहार, वित्तीय पारदर्शिता और सुरक्षित कार्य वातावरण सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिक जिम्मेदारी होती है। ऐसे मामलों में त्वरित जांच संस्थान की विश्वसनीयता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
कानूनी प्रक्रिया अभी जारी
पुलिस अधिकारियों के अनुसार, एफआईआर दर्ज होने और गिरफ्तारी के बाद भी जांच समाप्त नहीं हुई है। जांच के दौरान बैंक रिकॉर्ड, डिजिटल भुगतान विवरण, संबंधित अधिकारियों के बयान तथा अन्य दस्तावेजी साक्ष्यों का परीक्षण किया जाएगा। आवश्यकता पड़ने पर अन्य संबंधित व्यक्तियों से भी पूछताछ की जा सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी आपराधिक मामले में अंतिम निष्कर्ष न्यायालय की सुनवाई और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर ही तय होता है। इसलिए जांच पूरी होने और न्यायिक प्रक्रिया समाप्त होने तक सभी पक्षों के अधिकार सुरक्षित रहते हैं।
कर्मचारियों के अधिकारों की सुरक्षा पर उठे सवाल
इस घटना के बाद विश्वविद्यालयों और अन्य सरकारी संस्थानों में कार्यरत दैनिक वेतनभोगी एवं संविदा कर्मचारियों की सुरक्षा, आर्थिक अधिकारों और कार्यस्थल पर सम्मानजनक वातावरण को लेकर भी चर्चा शुरू हो गई है। श्रम एवं प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे कर्मचारियों के लिए प्रभावी शिकायत निवारण प्रणाली, नियमित निगरानी और पारदर्शी वेतन व्यवस्था आवश्यक है ताकि किसी भी प्रकार के कथित आर्थिक या मानसिक शोषण की संभावना को रोका जा सके।
जांच के निष्कर्षों पर रहेगी नजर
फिलहाल यह मामला जांच के अधीन है और पुलिस सभी पहलुओं की पड़ताल कर रही है। विश्वविद्यालय प्रशासन भी आगे की कार्रवाई पर निर्णय लेने की प्रक्रिया में है। इस पूरे प्रकरण पर अब सभी की नजर पुलिस जांच, संभावित विभागीय कार्रवाई और न्यायालय की आगामी कार्यवाही पर टिकी हुई है। अंतिम निष्कर्ष जांच और न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा।
