धर्म आत्मा का स्वाभाविक गुण है, बाहरी आडंबर नहीं — आचार्यश्री उदारसागर महाराज
मुरैना के बड़ा जैन मंदिर में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने दिया आत्मकल्याण और सम्यक् धर्म का संदेश
मुरैना (मनोज जैन नायक)। धर्म केवल पूजा-पाठ, कर्मकांड या बाहरी प्रदर्शन का विषय नहीं है, बल्कि यह आत्मा का स्वाभाविक गुण है। मनुष्य यदि जीवन में शाश्वत सुख, आत्मकल्याण और मोक्ष की प्राप्ति करना चाहता है तो उसे सम्यक् धर्म के मार्ग पर चलना होगा। यह प्रेरक विचार परम पूज्य आचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज ने मुरैना स्थित श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किए।
आचार्यश्री ने कहा कि जैन दर्शन के अनुसार प्रत्येक जीव की आत्मा मूल रूप से शुद्ध, बुद्ध और आनंदमय स्वरूप वाली है, लेकिन राग, द्वेष, मोह और कषायों के कारण जीव अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर संसार के दुखों में भटकता रहता है। धर्म का उद्देश्य बाहरी आडंबर नहीं, बल्कि आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना और उसमें स्थित होना है।
उन्होंने कहा कि जब मनुष्य सम्यक् दर्शन, सम्यक् ज्ञान और सम्यक् चरित्र को अपने जीवन में धारण करता है, तभी उसके अंदर वास्तविक धर्म का उदय होता है। धर्म व्यक्ति को आत्मचिंतन, संयम और सदाचार के मार्ग पर आगे बढ़ाता है।
भौतिक सुख क्षणिक, धर्म देता है स्थायी शांति
आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि संसार में धन, पद, प्रतिष्ठा और वैभव से मिलने वाला सुख स्थायी नहीं होता। ये सभी साधन कुछ समय के लिए प्रसन्नता दे सकते हैं, लेकिन वास्तविक शांति और आत्मिक आनंद केवल धर्म के आचरण से ही प्राप्त होता है।
उन्होंने कहा कि धर्म मनुष्य को क्रोध, मान, माया और लोभ जैसे आंतरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करना सिखाता है। क्षमा, दया, करुणा और समता जैसे गुणों का विकास ही जीवन को श्रेष्ठ बनाता है।
आचार्यश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार उत्तम बीज से ही उत्तम वृक्ष का निर्माण होता है, उसी प्रकार श्रेष्ठ जीवन और श्रेष्ठ परिणाम के लिए धर्म, संयम, सदाचार और आत्मचिंतन का मार्ग अपनाना आवश्यक है। धर्म वह प्रकाश है जो जीव को अज्ञान और मिथ्यात्व के अंधकार से निकालकर आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है।

सांसारिक संबंध कर्मों के अधीन होते हैं — मुनिश्री उपशांतसागर महाराज
धर्मसभा में मुनिश्री 108 उपशांतसागर महाराज ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि संसार में आत्मा के अतिरिक्त कोई भी संबंध स्थायी नहीं है।
मुनिश्री ने जैन दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि माता-पिता, परिवार, धन-संपत्ति और अन्य सांसारिक संबंध कर्मों के निमित्त होते हैं। जब तक कर्मों का संयोग रहता है, तब तक ये संबंध दिखाई देते हैं, लेकिन कर्मों का वियोग होते ही ये संबंध समाप्त हो जाते हैं।
उन्होंने कहा कि विवेकी व्यक्ति को मोह-ममता और परिग्रह में उलझने के बजाय अपने आत्मस्वरूप की ओर बढ़ना चाहिए। धर्म का वास्तविक उद्देश्य केवल धार्मिक क्रियाओं का प्रदर्शन नहीं, बल्कि आत्मा की शुद्धि, कषायों का क्षय और सम्यक् दृष्टि का जागरण है।
मुनिश्री ने कहा कि आत्मसंयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन को जीवन का हिस्सा बनाने से व्यक्ति अपने भीतर छिपे आध्यात्मिक गुणों को जागृत कर सकता है।

प्रतिदिन हो रहे धर्म प्रवचन और गुरु भक्ति कार्यक्रम
जैन विद्वान नवनीत जैन शास्त्री ने बताया कि श्री पार्श्वनाथ दिगंबर जैन पंचायती बड़ा मंदिर, मुरैना में जैनाचार्य श्री 108 उदारसागर महाराज अपने पांच शिष्यों सहित वर्षायोग के लिए विराजमान हैं।
उन्होंने बताया कि प्रतिदिन सुबह 8:30 बजे से आचार्यश्री एवं मुनिश्री उपशांतसागर महाराज के प्रेरणादायी प्रवचन आयोजित किए जा रहे हैं, जिसमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल हो रहे हैं।
सायंकालीन कार्यक्रमों का संचालन डॉ. मनोज जैन द्वारा किया जाता है। शाम के कार्यक्रमों में प्रश्न मंच, मंगल आरती, गुरु भक्ति और वैयावृत्ति जैसे धार्मिक आयोजन नियमित रूप से किए जा रहे हैं।
प्रश्न मंच प्रतियोगिता में हर्षित गुंजन जैन रहे प्रथम
धार्मिक कार्यक्रमों के अंतर्गत आयोजित प्रश्न मंच प्रतियोगिता में श्रद्धालुओं ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। शुक्रवार को आयोजित प्रतियोगिता में हर्षित गुंजन जैन ने प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिन्हें सम्मानपूर्वक पुरस्कार प्रदान किया गया।
आयोजन समिति ने बताया कि वर्षायोग के दौरान प्रतिदिन धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जा रहा है, जिनसे समाज में धर्म, संस्कार और आत्मचिंतन की भावना को बढ़ावा मिल रहा है।

