धर्मसभा में महासति सरोज श्रीजी का संदेश: कर्मों से मुक्ति ही मोक्ष का मार्ग
‘अपने आप को मत देखो, ऊपर वाला सब देख रहा है’ — सरोज श्रीजी
Nagda जंक्शन। पूज्य महासति सरोज श्रीजी ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जब तक कर्मों के बंधन में बंधा रहता है, तब तक उसका आध्यात्मिक उत्थान संभव नहीं है। जिन आत्माओं ने अपने कर्मों का क्षय कर लिया है, वही आत्माएं मोक्ष की प्राप्ति करती हैं। उन्होंने कहा कि जीवन में किए गए प्रत्येक कार्य का प्रभाव आत्मा पर पड़ता है, इसलिए व्यक्ति को अपने आचरण और विचारों के प्रति सजग रहना चाहिए।
धर्मसभा में महासति श्रीजी ने कहा कि मनुष्य अक्सर यह सोचकर कर्म करता है कि उसे कौन देख रहा है, लेकिन वास्तविकता यह है कि ईश्वर और आत्मा सब कुछ देख रहे हैं। उन्होंने कहा, “आप अपने आप को मत देखो, ऊपर वाला सब देख रहा है।” व्यक्ति को बाहरी दिखावे के बजाय अपने भीतर झांककर आत्ममंथन करना चाहिए।
इंद्रियों पर नियंत्रण जरूरी
महासति सरोज श्रीजी ने कहा कि मनुष्य की पंचेंद्रियां — नाक, कान, आंख, शरीर और जिह्वा — लगातार इच्छाओं की ओर आकर्षित होती हैं। यदि व्यक्ति इन इच्छाओं और विकारों पर नियंत्रण नहीं रखता है तो वह नए कर्मों का बंधन करता रहता है।
उन्होंने कहा कि मनुष्य के भीतर हमेशा मन और आत्मा के बीच संघर्ष चलता रहता है। मन को जो अच्छा लगता है, वह कई बार आत्मा को स्वीकार नहीं होता। इसलिए विवेक के आधार पर निर्णय लेना चाहिए और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
संप्रदायवाद से ऊपर उठने का आह्वान
धर्मसभा में उन्होंने कहा कि समाज को संप्रदायवाद और भेदभाव से ऊपर उठकर मानवता के मार्ग पर चलना चाहिए। आपसी प्रेम, सहयोग और सद्भावना से ही संसार में शांति स्थापित हो सकती है।
उन्होंने कहा कि सभी तीर्थंकर महाविदेह क्षेत्र में विराजमान हैं और उनका संदेश संपूर्ण मानव समाज के लिए कल्याणकारी है। वर्तमान समय में लोगों में एक-दूसरे के साथ रहने की भावना कम होती जा रही है, जबकि धर्म हमें प्रेम और सह-अस्तित्व का मार्ग दिखाता है।
स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग पर दिया जोर
महासति श्रीजी ने वर्तमान जीवनशैली पर चर्चा करते हुए कहा कि आज लोग बाहरी वस्तुओं और दिखावे को अधिक महत्व देने लगे हैं। उन्होंने स्वदेशी वस्तुओं के उपयोग और देश के प्रति प्रेम की भावना रखने का संदेश दिया।
उन्होंने कहा कि जिस व्यक्ति को अपने देश और संस्कृति से प्रेम नहीं होता, उसका वास्तविक मूल्य और वर्चस्व कम हो जाता है। समाज को अपनी परंपराओं और संस्कारों को बनाए रखने का प्रयास करना चाहिए।
खान-पान और जीवनशैली पर चिंता व्यक्त की
धर्मसभा में उन्होंने आधुनिक खान-पान की बदलती प्रवृत्तियों पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि आज विवाह समारोहों और आयोजनों में भोजन के नाम भी बदलते जा रहे हैं। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि नई पीढ़ी को अपनी संस्कृति और खान-पान की शुद्ध परंपराओं को समझना चाहिए।
उन्होंने कहा कि बाहरी आकर्षण के पीछे भागने के बजाय सात्विक जीवन शैली अपनानी चाहिए, जिससे मन और आत्मा दोनों को शांति मिल सके।
धार्मिक अध्ययन के लिए आगम वाचन प्रारंभ
धर्मसभा के दौरान जानकारी दी गई कि अब से महावीर भवन में नियमित रूप से आगम का वाचन भी किया जाएगा। इससे श्रद्धालुओं को धार्मिक ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
धर्मसभा में बड़ी संख्या में समाजजन उपस्थित रहे। कार्यक्रम में चंद्रशेखर जैन, विनोद रांठोड़, अभय चपलोत, बसंतीलाल कोलन, विलास पावेचा, अमरचंद जैन, पारस पोखरना, सुरेंद्र पितलिया, अमृत काठेड़, सुनील वोरा, मनोज चपलोत, अजीत मारु, रखबचंद पितलिया, मनोज कोठारी, हेमंत संघवी, उमेश संघवी, किशोर रांठोड़, राजेंद्र गोखरु, देवेंद्र काठेड़, आकाश वोरा सहित अनेक धर्मप्रेमी मौजूद रहे।
कार्यक्रम का संचालन चंदनमल संघवी ने किया। आतिथ्य सत्कार का लाभ दिलीप काठेड़ ने लिया। धर्मसभा में श्रद्धालुओं ने महासति श्रीजी के प्रवचनों को ध्यानपूर्वक सुना और धर्म मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
संवाददाता जीवनलाल जैन की रिपोर्ट।
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