शासकीय महाविद्यालय कानवन में मनाया गया महर्षि सांदीपनि गुरु पर्व, गुरु-शिष्य परंपरा पर हुई चर्चा
रिपोर्टर: गजानंद पाटीदार
बदनावर। मध्य प्रदेश शासन उच्च शिक्षा विभाग के निर्देशानुसार शासकीय महाविद्यालय कानवन, जिला धार में बुधवार को गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर महर्षि सांदीपनि गुरु पर्व का आयोजन श्रद्धा और गरिमामय वातावरण में किया गया। कार्यक्रम में गुरु-शिष्य परंपरा, भारतीय संस्कृति में गुरु के महत्व और जीवन निर्माण में गुरु की भूमिका पर विस्तार से विचार व्यक्त किए गए।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि पूर्व अध्यापक श्री मोहनलाल जगताप एवं हनुमान मंदिर की परम पूजनीय गुरु माताजी रहीं। कार्यक्रम का शुभारंभ मां सरस्वती एवं महर्षि सांदीपनि की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। भारतीय परंपरा के अनुसार महाविद्यालय के प्राचार्य द्वारा अतिथियों का श्रीफल भेंट कर एवं तिलक लगाकर स्वागत किया गया।
गुरु के प्रति श्रद्धा और सम्मान का पर्व है गुरु पूर्णिमा
महाविद्यालय के प्राचार्य डॉ. ईश्वरलाल ओसारी ने उपस्थित विद्यार्थियों और स्टाफ को संबोधित करते हुए कहा कि गुरु पूर्णिमा गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का विशेष अवसर है। भारतीय संस्कृति में गुरु को सदैव सर्वोच्च स्थान दिया गया है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में ऐसे आयोजनों की आवश्यकता इसलिए है, क्योंकि आधुनिक जीवनशैली में कई लोग अपनी परंपरागत मान्यताओं और संस्कारों से दूर होते जा रहे हैं। गुरु और शिष्य के बीच संबंधों को मजबूत करने तथा भारतीय संस्कृति के मूल्यों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से इस प्रकार के कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।
गुरु अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का प्रकाश देते हैं
कार्यक्रम में मुख्य अतिथियों ने प्राचीन भारतीय गुरु-शिष्य परंपरा पर प्रकाश डाला। उन्होंने बताया कि गुरु केवल शिक्षा देने वाला व्यक्ति नहीं होता, बल्कि वह शिष्य के जीवन को सही दिशा प्रदान करता है।
उन्होंने कहा कि गुरु अपने ज्ञान, अनुभव और संस्कारों के माध्यम से शिष्य के जीवन में आने वाली कठिनाइयों का सामना करने की क्षमता विकसित करता है। गुरु के मार्गदर्शन से व्यक्ति अपने लक्ष्य को प्राप्त करने की दिशा में आगे बढ़ता है।

कबीर के दोहों से समझाई गुरु की महिमा
कार्यक्रम प्रभारी श्री राम ठाकुर ने संत कबीरदास के प्रसिद्ध दोहे के माध्यम से गुरु की महिमा बताई—
“सब धरती कागज करूं, लेखनी सब वन राय,
सात समुद्र की मसि करूं, गुरु गुण लिखा न जाए।”
उन्होंने कहा कि गुरु के योगदान और महत्व का पूर्ण वर्णन करना संभव नहीं है। गुरु अपने शिष्य के जीवन में ज्ञान, संस्कार और सकारात्मक सोच का संचार करता है।
वहीं डॉ. शोभाराम डावर ने गुरु और शिष्य के बीच के संबंधों पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि गुरु-शिष्य का रिश्ता विश्वास, समर्पण और अनुशासन पर आधारित होता है।
गुरु और भगवान के संबंध पर दिया संदेश
सहायक प्राध्यापक श्री प्रेम सिंह अनारे ने संत कबीरदास के दोहे—
“गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागूं पाय,
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताए।”
के माध्यम से विद्यार्थियों को गुरु के महत्व को समझाया। उन्होंने बताया कि गुरु ही वह माध्यम है, जो व्यक्ति को ईश्वर और सत्य के मार्ग का ज्ञान कराता है।
उन्होंने विद्यार्थियों से कहा कि जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए गुरुजनों के मार्गदर्शन, अनुशासन और संस्कारों को अपनाना आवश्यक है।

विद्यार्थियों और स्टाफ ने बढ़-चढ़कर लिया भाग
कार्यक्रम में महाविद्यालय के शिक्षक, कर्मचारी और विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। इस अवसर पर श्री अजय सिंह सोलंकी, श्री शांतिलाल चौहान, श्रीमती निर्मला चौहान सहित महाविद्यालय का समस्त स्टाफ एवं बड़ी संख्या में विद्यार्थी उपस्थित रहे।
कार्यक्रम के दौरान भारतीय संस्कृति में गुरु के स्थान और गुरु-शिष्य परंपरा की प्रासंगिकता पर चर्चा की गई। आयोजन का उद्देश्य विद्यार्थियों में संस्कार, अनुशासन और गुरुजनों के प्रति सम्मान की भावना को मजबूत करना रहा।
गुरु पूर्णिमा के अवसर पर आयोजित यह कार्यक्रम विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक रहा और भारतीय ज्ञान परंपरा के महत्व को समझाने वाला साबित हुआ।
