संतों के दर्शन से साधक हो जाता है रिचार्ज: वर्षितप आराधकों को मुनि पियुषविजय ने दिए प्रेरणादायी आशीर्वचन
संतों के दर्शन से साधक हो जाता है रिचार्ज
थांदला। अहिंसा प्रधान जैन धर्म के साधक तप और संयम के माध्यम से मोक्ष की यात्रा तय करते हैं। इसी भावना को सशक्त बनाने और वर्षितप आराधकों के उत्साह में वृद्धि करने के उद्देश्य से मोहनखेड़ा महातीर्थ प्रणेता जैनाचार्य परम पूज्य गुरुदेव श्रीमद्विजय ऋषभचन्द्र सूरीश्वरजी महाराज साहब के आज्ञानुवर्ती सुशिष्य अष्टम वर्षितप तपस्वी परम पूज्य मुनिराज श्री पीयूषचन्द्र विजयजी महाराज साहब एवं परम पूज्य मुनिराज श्री रजतचन्द्र विजयजी महाराज साहब ने स्थानीय महावीर भवन स्थित पारणा स्थल पहुंचकर तपस्वियों को आशीर्वचन प्रदान किए।
वर्षितप आराधकों के बीच पहुंचे संत
मुनिद्वय ने सभी वर्षितप आराधकों के तप की अनुमोदना करते हुए उन्हें आध्यात्मिक ऊर्जा प्रदान की। इस अवसर पर मुनि श्री पियुषविजय ने कहा कि प्रथम राजराजेश्वर, प्रथम मुनि एवं प्रथम तीर्थंकर भगवान आदिनाथ ऋषभदेव के अंतराय निदान रूप वर्षितप की आराधना अत्यंत कठिन और महत्त्वपूर्ण साधना है।उन्होंने कहा कि वर्षितप केवल उपवास का नाम नहीं बल्कि इच्छाओं के निरोध और आत्मसंयम की सर्वोच्च साधना है। साधकों को पूरे वर्ष अपने नियमों का पालन करते हुए सावधानीपूर्वक तप आराधना करनी होती है।
तप और संयम का महत्व बताया
मुनिश्री ने कहा कि वर्तमान समय में जैन समाज में भी कई प्रकार की विकृतियां देखने को मिल रही हैं। रात्रि भोजन को सामान्य और फैशन के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। कई परिवारों में तप और संयम की अनुमोदना के भाव कम होते जा रहे हैं।उन्होंने कहा कि आज के दौर में छोटे-छोटे तप करने से भी लोग बचते हैं, ऐसे समय में वर्षभर नियमों का पालन करते हुए वर्षितप करने वाले साधक वास्तव में धन्य हैं।
इच्छाओं का निरोध ही सच्चा तप
अपने प्रेरणादायी प्रवचन में मुनि श्री पियुषविजय ने कहा कि तप का मूल आधार इच्छाओं का नियंत्रण है। जब तक मनुष्य अपनी इच्छाओं को नियंत्रित नहीं करेगा, तब तक तप की वास्तविकता को प्राप्त नहीं कर सकता।उन्होंने कहा कि संसार के लोग ही नहीं बल्कि संतों को भी रसासक्ति से बचने के लिए सतत जागरूक रहना पड़ता है। इसलिए प्रत्येक साधक को अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखना सीखना चाहिए।
मुनिश्री ने कहा कि जिस तप में संयम का समावेश हो जाता है, वही तप मोक्षदायी बन जाता है।
संतों के दर्शन से साधक हो जाता है रिचार्ज
अपने संबोधन में मुनि श्री पियुषविजय ने एक अत्यंत सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा कि जैसे मोबाइल फोन में रिचार्ज करवाने के बाद नेटवर्क और ऊर्जा प्राप्त होती है, उसी प्रकार संतों के दर्शन, वंदन और समागम से साधक आध्यात्मिक रूप से रिचार्ज हो जाता है।उन्होंने कहा कि संतों के सानिध्य में आने वाला आराधक नई ऊर्जा और दोगुने उत्साह के साथ अपने तप एवं साधना मार्ग पर आगे बढ़ता है।
यही कारण है कि संत समागम को जैन धर्म में विशेष महत्व दिया गया है।
जैनाचार्य उमेशमुनिजी का किया स्मरण
मुनिश्री ने धर्मधरा थांदला में जन्मे जैनाचार्य पूज्य श्री उमेशमुनिजी महाराज साहब का विशेष उल्लेख करते हुए कहा कि उनके जैसा विशिष्ट साधक और उनकी संत परंपरा से प्रेरणा लेकर आज संपूर्ण जैन समाज सहित अनेक जेनेत्तर बंधु भी तप आराधना के माध्यम से अपने कर्मों का क्षय कर रहे हैं।उन्होंने कहा कि यह निश्चित रूप से अनुमोदना का विषय है।
तप सहयोगियों और लाभार्थी परिवार की सराहना
इस अवसर पर मुनिश्री ने पूर्व प्राचार्य एवं सरस्वती नंदन स्वामी न्यास मंडल सचिव डॉ. जया पाठक परिवार की तप अनुमोदना की प्रशंसा करते हुए कहा कि तपस्वियों के तप का छठा भाग लाभार्थी परिवार को प्राप्त होता है।साथ ही उन्होंने तप सहयोगी समिति तथा श्रीसंघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया और मंत्री हितेश शाह द्वारा वर्षितप आराधकों के पारणा की उत्कृष्ट व्यवस्थाओं की भी सराहना की।
मांगलिक श्रवण के बाद हुआ पारणा
कार्यक्रम के दौरान मुनिश्री ने सभी तपस्वियों को मांगलिक श्रवण करवाया। इसके पश्चात सामूहिक नवकार महामंत्र का जाप किया गया।बाद में सभी तपस्वियों ने मुनिद्वय के दर्शन-वंदन कर पारणा किया।
90 तपस्वी कर रहे हैं सामूहिक वर्षितप
उल्लेखनीय है कि थांदला में जैनाचार्य पूज्य श्री उमेशमुनिजी महाराज साहब के अणु शताब्दी वर्ष के आराधना क्रम में बुद्ध पुत्र प्रवर्तक पूज्य गुरुदेव श्री जिनेन्द्रमुनिजी महाराज साहब की प्रेरणा तथा महाविदुषी महासती पूज्या श्री निखिलशीलाजी महाराज साहिबा के सानिध्य में लगभग 90 तपस्वी सामूहिक वर्षितप की आराधना कर रहे हैं।हो जाता है रिचार्ज संदेश देते हुए मुनि पियुषविजय ने थांदला में 90 वर्षितप तपस्वियों को आशीर्वाद दिया। महावीर भवन में पारणा कार्यक्रम के दौरान तप, संयम और मोक्ष मार्ग पर महत्वपूर्ण प्रेरणा दी गई।
