अमेरिका-इजरायल टकराव और ईरान युद्ध: ट्रंप-नेतन्याहू विवाद ने बदला वैश्विक शक्ति संतुलन
वैश्विक राजनीति का टर्निंग पॉइंट
28 फरवरी 2026 को अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर बड़े पैमाने पर सैन्य हमला किया। इस संयुक्त कार्रवाई को शुरुआत में एक रणनीतिक कदम माना गया, जिसका उद्देश्य ईरान के सैन्य और परमाणु ढांचे को कमजोर करना बताया गया।
लेकिन यह युद्ध कुछ ही महीनों में अपने मूल स्वरूप से आगे बढ़ गया और एक नए राजनीतिक संकट का रूप ले बैठा। धीरे-धीरे यह साफ होने लगा कि यह संघर्ष सिर्फ ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच नहीं, बल्कि खुद अमेरिका और इजरायल के रिश्तों की परीक्षा बन चुका है।
ट्रंप बनाम नेतन्याहू: युद्ध या शांति की टकराहट
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप युद्ध को जल्द खत्म कर एक कूटनीतिक समझौते की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं। उनका मानना है कि लंबे सैन्य संघर्ष से वैश्विक अर्थव्यवस्था, खासकर तेल बाजार, गंभीर संकट में जा रहा है।
वहीं इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू का रुख बिल्कुल अलग है। वे मानते हैं कि ईरान पर सैन्य दबाव जारी रहना चाहिए और किसी भी तरह का समझौता तब तक नहीं होना चाहिए जब तक ईरान पूरी तरह कमजोर न हो जाए।
यह मतभेद अब केवल रणनीति का नहीं, बल्कि नेतृत्व और वैश्विक दृष्टिकोण का टकराव बन गया है।
20 मई 2026 की फोन कॉल: तनाव की चरम सीमा
20 मई 2026 को ट्रंप और नेतन्याहू के बीच लगभग एक घंटे लंबी फोन बातचीत हुई, जिसे बाद में “सबसे तनावपूर्ण बातचीत” बताया गया।
इस कॉल में ट्रंप ने बताया कि अमेरिका, कतर और पाकिस्तान की मध्यस्थता से ईरान के साथ एक “लेटर ऑफ इंटेंट” तैयार किया जा रहा है। इसके लागू होने पर युद्ध औपचारिक रूप से समाप्त हो जाएगा और अगले 30 दिनों तक होर्मुज स्ट्रेट और ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर बातचीत होगी।
लेकिन यह प्रस्ताव नेतन्याहू को स्वीकार नहीं हुआ।
‘बीबी के बालों में आग लगी थी’—विवादित बयान
रिपोर्ट्स के अनुसार, बातचीत के बाद इजरायली प्रधानमंत्री बेहद गुस्से में थे। एक अमेरिकी सूत्र के हवाले से कहा गया कि “उस कॉल के बाद बीबी के बालों में आग लगी हुई थी।”
नेतन्याहू ने साफ कहा कि ईरान पर दबाव कम करना बड़ी गलती होगी और इससे वह फिर से मजबूत हो सकता है। उनका मानना था कि सैन्य अभियान को और तेज किया जाना चाहिए।
टकराव की असली वजह क्या है?
जेएनयू के अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ डॉ. राजन कुमार के अनुसार यह टकराव केवल दो नेताओं का नहीं, बल्कि दो अलग-अलग रणनीतिक सोच का परिणाम है।
ट्रंप प्रशासन के लिए यह युद्ध अब एक राजनीतिक और आर्थिक संकट बन चुका है। ईरान द्वारा होर्मुज स्ट्रेट को बाधित किए जाने के बाद वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे अमेरिका में पेट्रोल की कीमतें बढ़ीं और घरेलू असंतोष बढ़ा।
इसके उलट, नेतन्याहू इसे अस्तित्व की लड़ाई मानते हैं और किसी भी तरह की ढील देने के पक्ष में नहीं हैं।
ईरान की रणनीति और वैश्विक असर
ईरान ने जवाबी कार्रवाई में होर्मुज स्ट्रेट को आंशिक रूप से बंद कर दिया, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा संभालता है।
इसके परिणामस्वरूप अंतरराष्ट्रीय बाजार में ऊर्जा संकट पैदा हो गया। यूरोप और एशिया के कई देशों में ईंधन कीमतों में तेज उछाल देखने को मिला, जिससे वैश्विक मंदी की आशंका बढ़ गई।
नेतन्याहू की तीन मुख्य शर्तें
इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू किसी भी समझौते के लिए तीन मुख्य शर्तें रख रहे हैं:
- ईरान का समृद्ध यूरेनियम पूरी तरह देश से बाहर किया जाए
- ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम समाप्त किया जाए
- क्षेत्रीय सशस्त्र संगठनों को मिलने वाली ईरानी मदद रोकी जाए
उनका कहना है कि बिना इन शर्तों के कोई भी समझौता सिर्फ “अस्थायी राहत” होगा।
अमेरिका का इजरायल समर्थन क्यों नहीं रुकता?
हालांकि ट्रंप और नेतन्याहू के बीच तनाव बढ़ रहा है, फिर भी अमेरिका की इजरायल को दी जाने वाली सहायता में कोई कमी नहीं आई है। इसके पीछे कई ऐतिहासिक और रणनीतिक कारण हैं।
1. रणनीतिक साझेदारी
अमेरिका के लिए इजरायल मध्य पूर्व में एक स्थायी रणनीतिक साझेदार है। 1967 के बाद से इसे क्षेत्रीय शक्ति संतुलन का अहम केंद्र माना गया है।
इजरायल को कई अमेरिकी रणनीतिक विश्लेषक “न डूबने वाला एयरक्राफ्ट कैरियर” भी कहते हैं, जो अमेरिका के हितों की रक्षा करता है।
2. सैन्य और आर्थिक हित
अमेरिका हर साल अरबों डॉलर की सैन्य सहायता इजरायल को देता है। यह सहायता केवल आर्थिक मदद नहीं, बल्कि अमेरिकी रक्षा उद्योग के लिए एक बड़ा बाजार भी है।
इससे अमेरिकी हथियार कंपनियों को स्थायी ग्राहक मिलता है और इजरायल को आधुनिक हथियार प्रणाली प्राप्त होती है।
3. AIPAC का प्रभाव
अमेरिकी राजनीति में AIPAC जैसे लॉबिंग समूहों का भी बड़ा प्रभाव है। यह संगठन इजरायल समर्थक नीतियों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है।
दोनों प्रमुख अमेरिकी दलों पर इसका प्रभाव लंबे समय से देखा जा रहा है।
4. रक्षा तकनीक और इनोवेशन
इजरायल और अमेरिका के बीच रक्षा तकनीक का गहरा सहयोग है। आयरन डोम जैसे सिस्टम में अमेरिकी तकनीकी और वित्तीय सहयोग शामिल है।
यह साझेदारी केवल युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि रक्षा उद्योग और तकनीकी विकास से भी जुड़ी हुई है।
क्या इजरायल अमेरिका से अलग होना चाहता है?
हाल के वर्षों में नेतन्याहू ने संकेत दिए हैं कि इजरायल भविष्य में अमेरिकी सैन्य सहायता पर निर्भरता कम करना चाहता है। उनका लक्ष्य अगले 10 वर्षों में आत्मनिर्भर रक्षा प्रणाली विकसित करना है।
हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि यह बेहद कठिन प्रक्रिया होगी क्योंकि दोनों देशों की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा ढांचा आपस में गहराई से जुड़े हैं।
अमेरिकी जनता की बदलती सोच
हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार अमेरिका में इजरायल को लेकर जनमत में धीरे-धीरे बदलाव देखने को मिला है।
लगभग 60% अमेरिकी नागरिक अब विदेश नीति और रक्षा खर्चों पर सवाल उठाने लगे हैं। हालांकि इसका असर सरकारी नीति पर अभी सीमित है।
क्या यह रिश्ता टूट सकता है?
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेद अस्थायी हो सकते हैं, लेकिन अमेरिका-इजरायल गठबंधन लंबे समय तक कमजोर नहीं होगा।
यह रिश्ता केवल नेताओं पर नहीं, बल्कि रणनीतिक सुरक्षा, हथियार उद्योग और वैश्विक राजनीति पर आधारित है।
निष्कर्ष
ईरान युद्ध ने वैश्विक राजनीति को नई दिशा दी है। यह संघर्ष अब केवल सैन्य टकराव नहीं रहा, बल्कि अमेरिका और इजरायल के बीच रणनीतिक असहमति का प्रतीक बन गया है।
ट्रंप और नेतन्याहू के बीच मतभेद भले ही बढ़ते दिख रहे हों, लेकिन दोनों देशों का दशकों पुराना गठबंधन अभी भी बेहद मजबूत है।
आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह तनाव किसी कूटनीतिक समाधान में बदलता है या एक और बड़े वैश्विक संकट की ओर दुनिया को ले जाता है।
