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Silent Resignation बढ़ा भारत में, कर्मचारी सिर्फ सैलरी के लिए काम कर रहे, वर्कप्लेस क्राइसिस और मानसिक दूरी बढ़ी

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Published On: 14 May 2026
Silent Resignation बढ़ा भारत में, कर्मचारी सिर्फ सैलरी के लिए काम कर रहे, वर्कप्लेस क्राइसिस और मानसिक दूरी बढ़ी

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Silent Resignation in India: अब सिर्फ सैलरी के लिए नौकरी, बढ़ रहा नया वर्कप्लेस क्राइसिस

भोपाल। नौकरी, करियर और वर्कप्लेस कल्चर को लेकर भारत में एक नया ट्रेंड तेजी से उभर रहा है, जिसे एक्सपर्ट्स “Silent Resignation” या “Quiet Quitting” कह रहे हैं। यह स्थिति ऐसी है जिसमें कर्मचारी नौकरी छोड़ते नहीं हैं, लेकिन मानसिक और भावनात्मक रूप से काम से पूरी तरह अलग हो जाते हैं। वे केवल उतना ही काम करते हैं जितना जरूरी होता है, और उनका मुख्य उद्देश्य सिर्फ महीने के अंत में सैलरी प्राप्त करना रह जाता है।

क्या है Silent Resignation?

Silent Resignation का मतलब यह नहीं है कि कर्मचारी नौकरी छोड़ देता है, बल्कि वह मानसिक रूप से अपने काम से दूरी बना लेता है। ऐसे कर्मचारी ऑफिस जाते हैं, निर्धारित काम पूरा करते हैं, लेकिन अतिरिक्त जिम्मेदारियों, ओवरटाइम या एक्स्ट्रा इनिशिएटिव से बचते हैं।

वे न तो काम में ज्यादा उत्साह दिखाते हैं और न ही कंपनी के लक्ष्यों से खुद को भावनात्मक रूप से जोड़ते हैं। यह एक तरह का “minimum effort mindset” बन जाता है, जिसमें व्यक्ति सिर्फ अपनी नौकरी बचाने और सैलरी पाने पर ध्यान देता है।

भारत में क्यों बढ़ रहा यह ट्रेंड?

विशेषज्ञों के अनुसार भारत में Silent Resignation बढ़ने के पीछे कई कारण हैं। सबसे बड़ा कारण काम का बढ़ता दबाव और वर्क-लाइफ बैलेंस का बिगड़ना है। कई कंपनियों में कर्मचारियों से लगातार ज्यादा आउटपुट की उम्मीद की जाती है, लेकिन इसके बदले में मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान कम दिया जाता है।

इसके अलावा, नौकरी की असुरक्षा भी एक बड़ा कारण है। कई कर्मचारी इस डर में रहते हैं कि अगर उन्होंने ज्यादा बोल दिया या अतिरिक्त जिम्मेदारी से इनकार किया तो नौकरी खतरे में पड़ सकती है। ऐसे में वे धीरे-धीरे काम से भावनात्मक दूरी बना लेते हैं।

कोविड-19 महामारी के बाद भी काम करने के तरीके में बड़ा बदलाव आया है। वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड मॉडल के बावजूद कई लोगों में काम के प्रति जुड़ाव कम हुआ है।

सोशल मीडिया पर चर्चा में ट्रेंड

Silent Resignation अब सिर्फ वर्कप्लेस तक सीमित नहीं है, बल्कि सोशल मीडिया पर भी यह एक बड़ा ट्रेंड बन चुका है। कई लोग खुलकर बता रहे हैं कि वे अपनी नौकरी कर रहे हैं, लेकिन उससे कोई भावनात्मक जुड़ाव महसूस नहीं करते।

कुछ पोस्ट में लोग लिखते हैं कि वे “सिर्फ सैलरी के लिए काम कर रहे हैं” और इससे ज्यादा कुछ नहीं चाहते। यह मानसिकता खासकर युवा कर्मचारियों में तेजी से देखी जा रही है, जो वर्कप्लेस प्रेशर और करियर अनिश्चितता से जूझ रहे हैं।

मनोवैज्ञानिक क्या कहते हैं?

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार Silent Resignation एक तरह का “emotional burnout” है। जब व्यक्ति लंबे समय तक तनाव, दबाव और असंतुलित वर्कलोड में काम करता है, तो धीरे-धीरे उसका काम से लगाव कम होने लगता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई अचानक होने वाली स्थिति नहीं है, बल्कि यह धीरे-धीरे विकसित होती है। इसमें कर्मचारी मानसिक रूप से थक जाते हैं और खुद को बचाने के लिए काम से दूरी बना लेते हैं।

कुछ मामलों में यह स्थिति डिप्रेशन, चिंता और आत्मविश्वास की कमी से भी जुड़ी हो सकती है।

कंपनियों पर क्या असर पड़ रहा है?

Silent Resignation का सीधा असर कंपनियों की उत्पादकता पर पड़ रहा है। जब कर्मचारी केवल न्यूनतम काम करते हैं, तो टीम की कुल परफॉर्मेंस प्रभावित होती है।

इसके अलावा, इनोवेशन और क्रिएटिविटी में भी कमी आती है, क्योंकि कर्मचारी नए आइडियाज देने या अतिरिक्त जिम्मेदारी लेने से बचते हैं।

कंपनियों को अब यह समझना पड़ रहा है कि केवल सैलरी देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि कर्मचारियों को मानसिक रूप से जोड़ना भी जरूरी है।

युवाओं में ज्यादा देखने को मिल रहा ट्रेंड

भारत में यह ट्रेंड खासकर 20 से 35 वर्ष के युवाओं में ज्यादा देखा जा रहा है। इस उम्र के लोग करियर ग्रोथ, वर्क प्रेशर और पर्सनल लाइफ के बीच संतुलन बनाने में संघर्ष कर रहे हैं।

कई युवा अब “हustle culture” से दूर होकर एक संतुलित जीवन की ओर बढ़ना चाहते हैं। वे मानते हैं कि हर समय ओवरवर्क करना जरूरी नहीं है।

क्या यह वर्कप्लेस का नया संकट है?

विशेषज्ञ मानते हैं कि Silent Resignation को नजरअंदाज करना कंपनियों के लिए खतरनाक हो सकता है। यह धीरे-धीरे एक बड़े वर्कप्लेस क्राइसिस का रूप ले सकता है।

अगर कर्मचारियों का जुड़ाव लगातार कम होता रहा, तो कंपनियों को टैलेंट लॉस और लो प्रोडक्टिविटी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

समाधान क्या हो सकता है?

विशेषज्ञों के अनुसार इस समस्या का समाधान केवल सख्ती नहीं है, बल्कि बेहतर वर्कप्लेस कल्चर बनाना है।

  • कर्मचारियों के लिए बेहतर वर्क-लाइफ बैलेंस
  • मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान
  • ओपन कम्युनिकेशन
  • फेयर वर्कलोड
  • और रिवॉर्ड सिस्टम में पारदर्शिता

अगर कंपनियां इन बातों पर ध्यान दें, तो कर्मचारियों का जुड़ाव फिर से बढ़ सकता है।

निष्कर्ष

Silent Resignation भारत में एक उभरता हुआ वर्कप्लेस ट्रेंड है, जो यह दिखाता है कि कर्मचारी अब केवल नौकरी नहीं, बल्कि मानसिक शांति भी चाहते हैं। यह ट्रेंड कंपनियों और कर्मचारियों दोनों के लिए एक चेतावनी है कि काम और जीवन के बीच संतुलन बनाना अब पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गया है।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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