हार्दिक हुंडिया साबित करते हैं कि पत्रकारिता सिर्फ पेशा नहीं बल्कि अन्याय के खिलाफ धर्मयुद्ध है। मुंबई के मांगीलाल सोलंकी ने हार्दिक हुंडिया की निर्भीकता को सलाम करते हुए ये भावों की अभिव्यक्ति लिखी है।
हार्दिक हुंडिया ने सिद्ध किया की पत्रकारिता पेशा नहीं , अन्याय के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध है
मुंबई: पत्रकारिता की दुनिया में आजकल सतही खबरों और स्टिंग ऑपरेशन के दौर में एक नाम ऐसा भी है जो सिर्फ खबरें नहीं लिखता, बल्कि इतिहास रचता है। जब ताकतवर लोग सच को दबाने की कोशिश करते हैं, तब हार्दिक हुंडिया जैसे पत्रकार कलम को तलवार बना लेते हैं। लालबाग, मुंबई के रहने वाले मांगीलाल सोलंकी ने हार्दिक हुंडिया के इसी जुनून और निडरता को सलाम करते हुए भावों की अभिव्यक्ति लिखी है, जो सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रही है।
हार्दिक हुंडिया: जब पत्रकारिता धर्मयुद्ध बन जाती है
अक्सर कहा जाता है कि कलम तो बहुतों के पास होती है, लेकिन उसे तलवार बनाने का हुनर हर किसी में नहीं होता। हार्दिक हुंडिया ने अपने करियर में यह साबित कर दिया है। उनके लिए पत्रकारिता कोई 9 से 5 की नौकरी नहीं, बल्कि अन्याय के खिलाफ एक ईमानदार धर्मयुद्ध है। मांगीलाल सोलंकी ने अपने संदेश में लिखा कि हार्दिक जी ने यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता केवल एक पेशा नहीं, बल्कि अन्याय के विरुद्ध एक धर्मयुद्ध है।
सोलंकी जी की लिखी ये पंक्तियाँ हार्दिक हुंडिया के व्यक्तित्व का सटीक चित्रण करती हैं:
“वक्त की गर्द में चेहरे तो बहुत खो जाते हैं, पर जो सच का आइना दिखाएं, वही इतिहास रचाते हैं।”
अडिग हिमालय: सत्ता के दबाव में न झुकने वाली कलम
आज के दौर में जहाँ मीडिया हाउस सत्ता के दबाव में झुकते दिख जाते हैं, वहीं हार्दिक हुंडिया हिमालय की तरह अडिग रहे हैं। उनकी पत्रिका ‘हीरा माणक’ और ‘स्टार रिपोर्ट’ हमेशा से जमीनी हकीकत और सच्चाई के लिए जानी जाती रही है ।
मांगीलाल सोलंकी की कविता में इसी गुण को उभारा गया है:
“तूफान चाहे साजिशों का हो या विरोध का, जो अपने उसूलों पर हिमालय की तरह डटा रहे, वही सच्चा मार्गदर्शक है। आपकी आवाज उन हजारों दबे हुए लोगों की उम्मीद है जो सच कहना तो चाहते हैं, पर डरते हैं।”
हार्दिक हुंडिया ने हमेशा महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक न्याय की वकालत की है । वे सिर्फ एक संपादक नहीं हैं, बल्कि एक विचारधारा हैं जो दबे-कुचले वर्ग की आवाज बनकर उभरे हैं।
सच का कारवां: हार्दिक हुंडिया की विरासत
जब दुनिया समझौते की भाषा बोलने लगती है, तब कोई हार्दिक हुंडिया ही होता है जो अपने फौलादी इरादों से समाज की सोई हुई चेतना को जगा देता है। गुजरात के डीसा से निकलकर मुंबई के दिग्गज संपादक बनने तक का उनका सफर संघर्ष और ईमानदारी की गाथा है ।
सोलंकी जी ने उनके इस सफर को खूबसूरत शब्द दिए हैं:
“दौर-ए-खामोशी में जो गूँज बनकर उभरे, वो आवाज़ हैं आप। झूठ की बस्ती में सच का खुला आगाज़ हैं आप।”
हार्दिक हुंडिया का मानना है कि पत्रकारिता का कर्तव्य केवल खबर प्रसारित करना नहीं, बल्कि संस्कृति और सत्य की रक्षा करना है। उनके प्रशंसक उन्हें सिर्फ एक पत्रकार नहीं, बल्कि समाज का सारथी मानते हैं।
निष्कर्ष: हर युग में चाहिए हार्दिक
मांगीलाल सोलंकी ने अपनी श्रद्धांजलि के अंत में जो चार लाइनें लिखी हैं, वह हर उस व्यक्ति के लिए प्रेरणा है जो सच बोलने से डरता है:
“जमीर जिंदा हो जिसका, वो झुक नहीं सकता, सच का कारवां कभी रुक नहीं सकता। सलाम है उस जज्बे को जो मुश्किलों में भी मुस्कुराता है, हार्दिक जैसा शेर ही अंधेरों में मशाल जलाता है।”
एक सच्चे पत्रकार को दी गई यह सच्ची श्रद्धांजलि यह साबित करती है कि हार्दिक हुंडिया का प्रभाव केवल अखबार के पन्नों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जन-जन के दिलों में बसते हैं।
