बोलियां सबके सामने बोली जाती हैं तो उनका हिसाब भी सबके सामने रखा जाना चाहिए
धार्मिक आयोजनों में पारदर्शिता, जवाबदेही और समाज के प्रति ईमानदारी अत्यंत आवश्यक मानी जाती है। विशेष रूप से जैन समाज में होने वाले धार्मिक महोत्सव, प्रतिष्ठा, पूजन, यात्रा या अन्य धार्मिक प्रसंगों में श्रद्धालु भक्तजन उत्साहपूर्वक बोलियां लगाते हैं और धर्म के कार्यों में अपनी आस्था के अनुसार दान देते हैं। यह परंपरा लंबे समय से समाज में चलती आ रही है और इसे धर्म की प्रभावना का एक महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है।
इसी विषय को लेकर समाजसेवी Hardik Hundiya ने एक महत्वपूर्ण मुद्दा उठाते हुए कहा है कि जब बोलियां समाज और संघ के सामने सार्वजनिक रूप से बोली जाती हैं, तब उनका पूरा हिसाब भी समाज के सामने ही प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इससे न केवल पारदर्शिता बनी रहेगी बल्कि समाज का विश्वास भी मजबूत होगा।
बड़ी-बड़ी बोलियां बोलने वाले क्या वास्तव में पूरी राशि भरते हैं?
धर्म जगत में कई वर्षों पहले एक चर्चा काफी प्रचलित हुई थी। बताया जाता है कि एक बड़े राजनीतिक पद पर आसीन व्यक्ति ने एक संत को कांबली ओढ़ाने के प्रसंग में लाखों रुपये की बोली ली थी। उस समय यह चर्चा थी कि संत और नेता के बीच आपसी समझ थी कि बोली तो बड़ी लगाई जाएगी, लेकिन वास्तव में राशि भरना आवश्यक नहीं होगा। कार्यक्रम किसी संघ का नहीं बल्कि एक निजी ट्रस्ट के माध्यम से आयोजित किया गया था, इसलिए यह व्यवस्था संभव बताई गई।
ऐसी स्थिति में उस नेता की समाज में छवि मजबूत होती है कि वह जैन धर्म के प्रति अत्यंत श्रद्धा रखता है और बड़े दान देता है। दूसरी ओर संत की प्रतिष्ठा भी बढ़ती है कि उनके कार्यक्रम में इतनी बड़ी बोली लगी। परंतु यह आज भी एक रहस्य बना हुआ है कि वह बोली वास्तव में भरी गई थी या नहीं।
इस उदाहरण को सामने रखते हुए हार्दिक हुंडिया का कहना है कि समाज को यह समझने की आवश्यकता है कि धार्मिक आयोजनों में जो भी बोलियां लगाई जाती हैं, उनका पूरा लेखा-जोखा सार्वजनिक होना चाहिए। जब संघ के सामने बोली लगाई जाती है और बोली लगाने वाले का नाम और राशि सार्वजनिक रूप से घोषित की जाती है, तब कार्यक्रम के बाद खर्च और आय का पूरा विवरण भी समाज के सामने रखा जाना चाहिए।
आजकल एक नया ट्रेंड भी देखने को मिल रहा है
Hardik Hundiya ने यह भी कहा कि वर्तमान समय में कई धार्मिक आयोजनों में एक नया चलन देखने को मिल रहा है। कई बार ट्रस्ट के ट्रस्टी पहले से यह देख लेते हैं कि ज़ाज़म या सभा में कौन-कौन प्रमुख लोग बैठे हैं। उसके आधार पर यह तय किया जाता है कि किस व्यक्ति से बोली लगवाई जा सकती है और किसका नाम अधिक बार मंच से लिया जाए।
कुछ मामलों में ऐसा भी देखने को मिलता है कि जो व्यक्ति बड़ी बोली लगाता है, उसे मंच पर विशेष स्थान दिया जाता है। गवैया या कार्यक्रम संचालक को भी यह संकेत दिया जाता है कि किस व्यक्ति का नाम अधिक बार लेना है, ताकि उसकी प्रतिष्ठा समाज में बढ़े और अन्य लोग भी प्रभावित होकर अधिक बोली लगाएं।
यह भी आरोप सामने आते रहे हैं कि कुछ लोग केवल बोली बढ़ाने के उद्देश्य से सभा में बैठते हैं। वे बोलियां तो बढ़ाते हैं, लेकिन वास्तविक भुगतान नहीं करते। ऐसे लोग अक्सर ट्रस्ट से जुड़े होते हैं या किसी प्रकार से आयोजन से संबंधित होते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य यह होता है कि बोलियों का आंकड़ा बड़ा दिखाई दे और कार्यक्रम की आय अधिक प्रतीत हो।
नाम की घोषणा और वास्तविक भुगतान में अंतर
समाज में कई बार यह देखा गया है कि जिन लोगों को वास्तव में राशि नहीं भरनी होती, उनका नाम भी बड़ी धूमधाम से लिया जाता है। ढोल-नगाड़ों और तालियों के बीच उनके दान की घोषणा की जाती है, जिससे समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ती है।
कुछ मामलों में यह भी कहा जाता है कि ट्रस्ट से जुड़े लोगों को बिना लिखापढ़ी या बहुत कम ब्याज पर आर्थिक सुविधाएं मिलती हैं। इसलिए वे बोली बढ़ाने में भूमिका निभाते हैं, लेकिन वास्तविक भुगतान से बच जाते हैं।
यदि ऐसी परिस्थितियां वास्तव में मौजूद हैं, तो यह समाज और धर्म दोनों के लिए चिंताजनक विषय है। धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य केवल प्रतिष्ठा प्राप्त करना नहीं, बल्कि धर्म की सच्ची प्रभावना और समाज के हित में कार्य करना होना चाहिए।
समाज के सामने पूरा हिसाब रखना क्यों जरूरी है?
Hardik Hundiya ने देशभर के जैन धर्म प्रेमियों से विनम्र निवेदन करते हुए कहा है कि जब भी किसी धार्मिक आयोजन में श्रद्धा से बोली लगाई जाए, तो बाद में उस कार्यक्रम का पूरा लेखा-जोखा समाज के सामने अवश्य रखा जाए।
इससे समाज को यह स्पष्ट जानकारी मिलेगी कि—
- कुल कितनी बोलियां लगीं
- किन-किन लोगों ने बोलियां लगाईं
- किसने वास्तव में राशि का भुगतान किया
- कार्यक्रम से कुल कितनी आय हुई
- और कुल कितना खर्च हुआ
जब समाज के सामने पारदर्शी तरीके से हिसाब रखा जाता है, तो इससे लोगों का विश्वास और अधिक मजबूत होता है।
धार्मिक आयोजनों में होने वाले खर्च
आज के समय में किसी भी बड़े धार्मिक आयोजन में कई प्रकार के खर्च होते हैं। इनमें विभिन्न सेवाओं और व्यवस्थाओं का समावेश होता है। उदाहरण के रूप में—
- गवैया या भजन गायक
- प्रिंटिंग और निमंत्रण पत्र
- टेंट और सजावट
- विधिकारक या पूजन कराने वाले
- बैंड और बाजा
- नृत्य या सांस्कृतिक कार्यक्रम
- रसोइया और भोजन व्यवस्था
- घोड़ा-बग्गी या शोभायात्रा की व्यवस्था
- फोटो और वीडियो ग्राफी
- मीडिया कवरेज
- अखबारों में विज्ञापन
- इवेंट मैनेजमेंट
- हाथी, घोड़ा या बैलगाड़ी की व्यवस्था
- सोशल मीडिया प्रचार आदि
इन सभी व्यवस्थाओं पर कितना खर्च हुआ और कार्यक्रम से कुल कितनी आय प्राप्त हुई, यह जानकारी समाज के सामने होना आवश्यक है।
पारदर्शिता से समाज का पैसा भी बचेगा
जब कार्यक्रम का पूरा हिसाब समाज के सामने प्रस्तुत किया जाता है, तो लोगों को यह भी समझ में आता है कि कहां खर्च अधिक हुआ और कहां बचत की जा सकती थी।
यदि किसी व्यवस्था पर आवश्यकता से अधिक खर्च हुआ है, तो समाज के लोग सुझाव दे सकते हैं कि भविष्य में उस खर्च को कम किया जाए। इससे आने वाले आयोजनों में अनावश्यक खर्च से बचा जा सकता है और समाज का पैसा भी सुरक्षित रहता है।
दान देने वालों की भावना का सम्मान जरूरी
हार्दिक हुंडिया का कहना है कि जो लोग धर्म के नाम पर दान देते हैं, वे केवल प्रतिष्ठा के लिए ही नहीं बल्कि धर्म की सेवा और प्रभावना की भावना से दान करते हैं। उन्हें विश्वास होता है कि उनका दिया हुआ पैसा सही स्थान और सही कार्य में उपयोग होगा।
इसलिए यह आवश्यक है कि उस धन का उपयोग पूरी ईमानदारी और जिम्मेदारी के साथ किया जाए। यदि समाज के सामने पूरा हिसाब रखा जाता है, तो दान देने वालों को भी संतोष होता है कि उनका योगदान वास्तव में धर्म और समाज के हित में उपयोग हुआ।
निष्कर्ष
धार्मिक आयोजनों का उद्देश्य समाज में आध्यात्मिकता, सद्भावना और सेवा की भावना को बढ़ाना होता है। यदि इन आयोजनों में पारदर्शिता और जवाबदेही बनी रहे, तो समाज का विश्वास और अधिक मजबूत होता है।
Hardik Hundiya ने सभी जैन धर्म प्रेमियों से अपील की है कि जहां भी धार्मिक कार्यक्रमों में बोलियां लगाई जाएं, वहां बाद में कार्यक्रम की आय और व्यय का पूरा विवरण समाज के सामने प्रस्तुत किया जाए।
जब बोलियां सबके सामने बोली जाती हैं, तो उनका हिसाब भी सबके सामने होना चाहिए। यही पारदर्शिता धर्म की सच्ची सेवा और समाज के विश्वास की सबसे मजबूत नींव है।
