संवाददाता : कौशिक पण्डित
मनावर। विश्व शांति, धर्म और वैदिक सनातन संस्कृति के संरक्षण के उद्देश्य से प्रतिवर्ष आयोजित होने वाली श्रीराम सप्ताजी पदयात्रा इस वर्ष भी श्रद्धा, भक्ति और आस्था के साथ ननोदा (कुक्षी) से ओंकारेश्वर के लिए रवाना हुई। अखंड रामधुन, संकीर्तन और धार्मिक उत्साह के बीच बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस पदयात्रा में शामिल हुए।
इस पदयात्रा का समापन ओंकारेश्वर में श्री योगेश जी महाराज एवं सुधाकर जी महाराज के पावन सानिध्य में धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होगा। यात्रा के माध्यम से विश्व में शांति, सद्भाव और धर्म के संदेश को प्रसारित करने का संकल्प लिया गया है।
सनातन संस्कृति को जीवित रखने का संदेश
जीवनदायिनी मां नर्मदा के उत्तरी तट पर बसे ग्राम बाकानेर में स्थापित श्री अंबिका आश्रम के माध्यम से वैदिक सनातन संस्कृति के प्रचार-प्रसार का कार्य निरंतर किया जा रहा है। प्रातः स्मरणीय एवं वंदनीय यज्ञाचार्य श्री श्री 1000 श्री गजानन जी महाराज श्रीबालीपुरधाम ने जप, तप और यज्ञ की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अखंड अग्नि प्रज्ज्वलित रखी है।
बाबाजी ने भक्तों को मार्गदर्शन देते हुए भारतीय संस्कृति, धर्म और आध्यात्मिक मूल्यों को जीवन में अपनाने का संदेश दिया। उन्होंने बताया कि भारतीय संस्कृति विश्व की प्राचीन और समृद्ध संस्कृतियों में से एक है, जिसमें विविधता के साथ एकता का भाव विद्यमान है।
उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति में सभी पर्व और उत्सवों का विशेष महत्व है। यही उत्सव समाज को जोड़ने, आपसी प्रेम बढ़ाने और राष्ट्र की एकता व अखंडता को मजबूत करने का कार्य करते हैं।
धर्म और संस्कृति से राष्ट्र का विकास संभव
श्री राम सप्ताजी पदयात्रा के पीछे केवल धार्मिक आस्था ही नहीं, बल्कि एक गहरा सामाजिक और आध्यात्मिक संदेश भी जुड़ा हुआ है। इसी कारण भारतीय संस्कृति को उत्सव संस्कृति भी कहा जाता है।
गुरुजी ने श्रीराम जन्म प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा था कि जीवन जलेबी की तरह उलझा हुआ है, लेकिन धर्म और भक्ति की चाशनी में डूबकर जीवन को आनंदमय बनाया जा सकता है। धर्म के मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति, समाज और राष्ट्र का सर्वांगीण विकास संभव है।

अखंड रामधुन के साथ निकलती है यात्रा
सद्गुरु सेवा समिति के जगदीश चंद्र पाटीदार ने बताया कि अखंड ज्योत और अखंड रामधुन के साथ 24 घंटे चलने वाला श्रीराम सप्ताजी संकीर्तन इस पदयात्रा की विशेष पहचान है। विश्व शांति की कामना को लेकर यह यात्रा प्रतिवर्ष ननोदा से ओंकारेश्वर तक निकाली जाती है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष श्रीराम पदयात्रा अपने 43वें वर्ष में प्रवेश कर रही है। यात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालु शामिल होकर भक्ति और सेवा का संदेश दे रहे हैं।
यात्रा के दौरान श्रद्धालुओं के लिए विभिन्न स्थानों पर विश्राम और भोजन की व्यवस्था की जाती है। बड़वाह में सत्यनारायण सोनी द्वारा सभी पदयात्रियों को नि:शुल्क भोजन प्रसादी उपलब्ध कराई जाती है।
पदयात्रा का मार्ग और प्रमुख पड़ाव
श्रीराम सप्ताजी पदयात्रा का पहला पड़ाव बाकानेर रहा, जहां श्रद्धालुओं ने विश्राम किया और रामधुन के साथ भजन-कीर्तन किए। इसके बाद यात्रा नर्मदा मंदिर, जय सियाराम बाबा मंदिर महेश्वर, उमिया माता मंदिर करौंदिया, पिपलिया स्थित नर्मदा मंदिर होते हुए बड़वाह से ओंकारेश्वर की ओर आगे बढ़ेगी।
यात्रा के अंतिम पड़ाव पर ओंकारेश्वर घाट पर मां नर्मदा के तट पर धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। यहां “ओम जय जगदीश हरे” की आरती और गुरु महाराज की आरती श्री योगेश जी महाराज एवं सुधाकर जी महाराज के सानिध्य में संपन्न होगी।
43 वर्षों से जारी है धार्मिक परंपरा
श्रीराम सप्ताजी पदयात्रा की शुरुआत वर्ष 1984 में हुई थी। उस समय आदर्श ग्राम ननोदा में ग्रामीण आर्थिक परेशानियों, महामारी और अकाल जैसी परिस्थितियों से जूझ रहे थे। जनसेवा को समर्पित बाबाजी के प्रति ग्रामीणों की गहरी श्रद्धा थी।
ग्रामीणों ने जब बाबाजी से समाधान और मार्गदर्शन की प्रार्थना की, तब श्रीबालीपुरधाम के गुरुजी ने श्रावण मास के प्रथम बुधवार को ननोदा से ओंकारेश्वर तक श्रीराम सप्ताह पदयात्रा निकालने का संकल्प लिया। तभी से यह धार्मिक यात्रा लगातार जारी है और अब 43 वर्षों की गौरवशाली परंपरा बन चुकी है।
श्रद्धालुओं के सहयोग से आगे बढ़ रही यात्रा
इस धार्मिक आयोजन को सफल बनाने में अनेक श्रद्धालुओं और सेवाभावी लोगों का योगदान रहता है। रमेश भाई पाटीदार, लक्ष्मण मुकाती, मोहन बरफा, केशव भायल, गोविंद भायल, कमल पाटीदार, पन्नालाल बर्फा सहित अनेक भक्तजन यात्रा की व्यवस्थाओं में सहयोग प्रदान करते हैं।
भजन गायक तेज भाई तेजालाल बर्फा सहित अन्य श्रद्धालु अखंड रामधुन और संकीर्तन के माध्यम से पूरे मार्ग को भक्तिमय वातावरण से भर देते हैं।
श्रीराम सप्ताजी पदयात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि सेवा, संस्कृति, आध्यात्मिकता और सामाजिक एकता का प्रतीक बन चुकी है। 43 वर्षों से निरंतर चल रही यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों को धर्म, संस्कार और भारतीय संस्कृति से जोड़ने का कार्य कर रही है।
