एस जयशंकर ने यूक्रेन के विदेश मंत्री को अचानक क्यों किया फोन? रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी पीस प्लान और भारत की भूमिका पर हुई अहम बातचीत
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने रविवार शाम यूक्रेन के विदेश मंत्री आंद्रेई सिबिहा से फोन पर बातचीत कर रूस-यूक्रेन युद्ध के ताजा हालात, अमेरिकी पीस प्लान और शांति प्रक्रिया को लेकर भारत के रुख को स्पष्ट किया। यह बातचीत ऐसे समय हुई है जब अमेरिका ने यूक्रेन पर शांति समझौते को लेकर अपना दबाव बढ़ा दिया है और रूस भी पहली बार अमेरिकी ड्राफ्ट को एक संभावित आधार मानकर संकेत दे चुका है।
भारत शुरुआत से ही रूस-यूक्रेन युद्ध को बातचीत के माध्यम से खत्म करने, शांति स्थापित करने और मानवीय सहयोग बढ़ाने की वकालत करता रहा है। ऐसे में विदेश मंत्री जयशंकर का यह फोन कॉल अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज़ से बेहद अहम माना जा रहा है।
फोन कॉल में क्या हुई चर्चा? जयशंकर ने X पोस्ट में दी जानकारी
एस जयशंकर ने अपनी बातचीत की जानकारी X (पूर्व में ट्विटर) पर शेयर करते हुए लिखा:
“कल शाम यूक्रेन के विदेश मंत्री एंड्री सिबिहा से फोन पर बातचीत हुई। यूक्रेन विवाद से जुड़े हालिया विकास पर उनकी ब्रीफिंग के लिए धन्यवाद। इस विवाद को जल्द खत्म करने और स्थायी शांति स्थापित करने के लिए भारत ने अपने समर्थन को दोहराया।”
जयशंकर के संदेश में साफ संकेत है कि भारत एक बार फिर अपनी न्यूट्रल और बैलेंस्ड डिप्लोमैसी को आगे बढ़ा रहा है, जिसमें वह किसी भी पक्ष का समर्थन करने की बजाय स्थिति को शांतिपूर्ण समाधान की ओर ले जाने पर जोर देता है।
भारत-यूक्रेन संबंधों के संदर्भ में यह फोन कॉल क्यों महत्वपूर्ण?
रूस-यूक्रेन युद्ध करीब तीन साल से जारी है और इसका प्रभाव पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य आपूर्ति पर पड़ा है। भारत ने भी युद्ध के चलते कच्चे तेल, खाद्य सामग्री और उर्वरकों की आपूर्ति के मुद्दों का सामना किया है।
इस पृष्ठभूमि में भारत की भूमिका कई कारणों से महत्त्वपूर्ण बनती है—
1. भारत की बैलेंस्ड फॉरेन पॉलिसी
भारत ने युद्ध शुरू होने से अब तक न तो रूस के खिलाफ कोई सार्वजनिक आलोचना की और न ही यूक्रेन की मानवीय जरूरतों को नजरअंदाज किया। भारत लगातार बातचीत और कूटनीति का समर्थन करता रहा है।
2. दोनों देशों के साथ गहरे संबंध
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रूस भारत का रणनीतिक साझेदार है—रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष सहित कई क्षेत्रों में सहयोग।
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यूक्रेन भी भारत का रक्षा टेक्नोलॉजी और कृषि उत्पादों में प्रमुख व्यापारिक साझेदार रहा है।
3. यूक्रेन कई बार भारत से मध्यस्थता की उम्मीद दिखा चुका है
जेलेंस्की ने भी कई बार कहा है कि भारत जैसे “विस्तृत प्रभाव वाले देश” को शांति प्रयासों में सक्रिय होना चाहिए।
ऐसे में जयशंकर का यह फोन कॉल यूक्रेन के साथ भारत के संवाद को मजबूत करता है और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत को एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है।
G7 बैठक में हुई पिछली मुलाकात की याद
दोनों देशों के विदेश मंत्रियों की इससे पहले मुलाकात नवंबर 2025 में कनाडा में हुई G7 विदेश मंत्रियों की बैठक के दौरान हुई थी। उस बैठक में भी तीन बातें प्रमुख थीं—
- द्विपक्षीय सहयोग बढ़ाना
- शांति प्रक्रिया के रास्ते तलाशना
- मौजूदा युद्ध के मैदान की स्थिति पर चर्चा
भारत ने वहां भी यह स्पष्ट किया था कि वह किसी भी तरह की वार्ता-आधारित समाधान के लिए तैयार है।
अमेरिकी पीस प्लान: आखिर क्या है ड्राफ्ट और क्यों बढ़ा विवाद?
हाल ही में अमेरिकी विदेश सचिव मार्को रुबियो ने कहा कि जिस अमेरिकी पीस प्लान पर यूक्रेन को जल्द निर्णय लेना है, उसमें रूस का भी योगदान शामिल है। यह पहली बार है जब अमेरिका ने सार्वजनिक रूप से माना कि ड्राफ्ट में रूस की शर्तें भी जोड़ी गई हैं।
यूक्रेन को किन शर्तों पर आपत्ति है?
यूक्रेनी मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार अमेरिका द्वारा भेजे गए ड्राफ्ट में कुछ प्रमुख बिंदु ऐसे हैं जिन्हें यूक्रेन मानने से इंकार करता रहा है—
- रूस-नियंत्रित क्षेत्रों पर समझौता
- क्रीमिया की स्थिति पर रियायतें
- यूक्रेन की भविष्य की सैन्य रणनीति पर सीमाएं
- नाटो सदस्यता के सवाल पर नरमी
यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोडिमिर जेलेंस्की ने भी यह स्वीकार किया है कि देश “इतिहास के सबसे मुश्किल दौर” से गुजर रहा है और पश्चिमी देशों का दबाव बढ़ता जा रहा है।
अमेरिका ने क्यों दी 27 नवंबर की डेडलाइन?
अमेरिका चाहता है कि युद्ध जल्द खत्म हो। इसके पीछे कई कारण बताए जा रहे हैं—
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अमेरिका की घरेलू राजनीति और चुनावी दबाव
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लाखों करोड़ डॉलर की सहायता जारी रखना मुश्किल हो रहा है
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यूरोप में युद्ध से बढ़ती थकान
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रूस की बढ़ती सैन्य बढ़त
इसलिए वाशिंगटन चाहता है कि कीव जल्द से जल्द ड्राफ्ट पर प्रतिक्रिया दे। वहीं जेलेंस्की पर यह दबाव यूक्रेन में विवाद का कारण बन गया है।
रूस का रुख—पहली बार अमेरिकी ड्राफ्ट को “बेस” बताया
रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने अमेरिकी पीस प्लान को दोनों देशों के बीच समझौते की दिशा में एक संभावित आधार बताया है। पुतिन का यह बयान चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि इससे पहले रूस हमेशा पश्चिमी देशों की किसी भी शांति पहल को नकारता रहा है।
राजनयिक विशेषज्ञ मानते हैं कि—
- रूस वर्तमान स्थिति में खुद को मजबूत मानता है
- अमेरिकी ड्राफ्ट में कुछ ऐसे बिंदु हैं जो रूस के हितों के अनुकूल हैं
- इसलिए रूस इसे “शुरुआती आधार” मानकर आगे बातचीत के लिए इच्छुक दिख रहा है
भारत की भूमिका: क्या भारत बनेगा शांति मध्यस्थ?
भारत बार-बार कह चुका है कि वह किसी भी शांति प्रयास को समर्थन देगा, बशर्ते—
- सभी पक्ष तैयार हों
- समाधान बातचीत द्वारा निकले
- युद्ध का अंत स्थायी और टिकाऊ हो
यूक्रेन के साथ फोन कॉल में जयशंकर का संदेश भी यही था कि भारत स्थायी शांति के लिए प्रयासों में भागीदारी के लिए तैयार है।
भारत के लिए यह अवसर क्यों अहम?
- भारत की वैश्विक प्रतिष्ठा बढ़ रही है
- G20 अध्यक्षता के दौरान भारत ने “वैश्विक दक्षिण” की आवाज बुलंद की
- रूस और पश्चिम दोनों के साथ भारत के रिश्ते मजबूत हैं
- दुनिया चाहती है कि भारत एक संतुलनकारी ताकत के रूप में आगे आए
निष्कर्ष: जयशंकर का फोन कॉल—शांति प्रक्रिया की ओर संकेत
एस जयशंकर का यह अचानक फोन कॉल सिर्फ एक सामान्य कूटनीतिक बातचीत नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक समीकरणों का संकेत है।
जहां अमेरिका यूक्रेन पर समझौते का दबाव बढ़ा रहा है, वहीं रूस अमेरिकी ड्राफ्ट को आधार मानने को तैयार हो रहा है। ऐसे तनावपूर्ण माहौल में भारत एक तटस्थ, विश्वासयोग्य और प्रभावी शक्ति के रूप में उभर रहा है।
यह देखना दिलचस्प होगा कि—
- क्या भारत आने वाले हफ्तों में शांति वार्ता में किसी भूमिका के लिए चुना जाता है?
- क्या यूक्रेन अमेरिकी ड्राफ्ट को स्वीकार करेगा?
- और क्या रूस-यूक्रेन युद्ध 2026 से पहले किसी समाधान की ओर बढ़ पाएगा?
फिलहाल, जयशंकर के इस फोन कॉल ने यह जरूर स्पष्ट कर दिया है कि भारत की सक्रिय कूटनीति आने वाले समय में वैश्विक राजनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बनने वाली है।
