हिंदी से परहेज क्यों?
अंग्रेजी के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदी के प्रति बदलती सोच और हिंदी शिक्षकों की उपेक्षा पर गंभीर सवाल
हिंदी दिवस विशेष | 14 सितंबर 2026
आलेख : सपना परिहार, नागदा (मध्यप्रदेश)
संवाददाता : निलेश मेहता, नागदा
14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था। इसी ऐतिहासिक दिन की स्मृति में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस दिन हिंदी के प्रचार-प्रसार, सम्मान और उपयोग को लेकर अनेक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लेकिन एक गंभीर सवाल आज भी हमारे सामने खड़ा है—क्या हिंदी को सम्मान देने की हमारी जिम्मेदारी केवल एक दिन या हिंदी पखवाड़े तक सीमित रह गई है?
हिंदी बोलने में झिझक क्यों?
आज हमारी शिक्षा व्यवस्था और सामाजिक व्यवहार के बीच एक बड़ा अंतर दिखाई देता है। कोई व्यक्ति सहजता से शुद्ध हिंदी में बात करे तो कई बार उसे कम आधुनिक या कम पढ़ा-लिखा समझ लिया जाता है। इसके विपरीत अंग्रेजी में धाराप्रवाह बातचीत करने वाले व्यक्ति को अधिक योग्य और आधुनिक मानने की मानसिकता तेजी से बढ़ रही है।
माता-पिता, मित्रों, पड़ोस और यहां तक कि कुछ शिक्षण संस्थानों में भी अंग्रेजी बोलना प्रतिष्ठा और योग्यता का प्रतीक बनता जा रहा है। यह स्थिति केवल भाषा के चुनाव का विषय नहीं है, बल्कि हमारी सोच और सामाजिक मानसिकता से भी जुड़ा प्रश्न है।
कॉन्वेंट संस्कृति और रोजगार की बाध्यता
अंग्रेजी माध्यम विद्यालयों के बढ़ते प्रभाव के बीच हिंदी शिक्षकों के सामने भी एक अलग चुनौती खड़ी हो गई है। कई संस्थानों में हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षकों से भी अंग्रेजी में धाराप्रवाह संवाद करने की अपेक्षा की जाती है। इसके चलते हिंदी विषय में दक्षता, साहित्य का ज्ञान और वर्षों का अध्यापन अनुभव रखने वाले शिक्षक भी केवल अंग्रेजी में संवाद करने में अपेक्षित दक्षता न होने के कारण रोजगार के अवसरों से वंचित हो जाते हैं।
लगभग दो दशकों से हिंदी अध्यापन से जुड़ी होने के कारण मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी यही रहा है। कई साक्षात्कारों में यह सुनना पड़ा कि अंग्रेजी में संवाद करना अनिवार्य है। ऐसे में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है—यदि हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षक से अंग्रेजी का पूर्ण ज्ञान अपेक्षित है, तो क्या अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने वाले शिक्षकों से हिंदी का समान स्तर का ज्ञान अपेक्षित किया जाता है?
अंग्रेजी सीखने में कोई बुराई नहीं है। आज अंग्रेजी रोजगार, उच्च शिक्षा और वैश्विक संवाद की महत्वपूर्ण भाषा है। लेकिन अंग्रेजी का ज्ञान प्राप्त करने के लिए हिंदी को कमतर समझना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं कहा जा सकता।
हिंग्लिश और रोमन हिंदी का बढ़ता चलन
भाषा के स्वरूप में भी तेजी से बदलाव दिखाई दे रहा है। बच्चों और युवाओं के बीच हिंग्लिश तथा रोमन हिंदी का चलन बढ़ता जा रहा है। हिंदी के शब्दों को देवनागरी लिपि में लिखने के बजाय अंग्रेजी अक्षरों में लिखना उन्हें अधिक सहज लगता है।
जब उनसे हिंदी को देवनागरी में लिखने के लिए कहा जाता है तो अक्सर जवाब मिलता है—“मैम, हमें समझ तो आ ही जाता है।”
बेशक भाषा का स्वरूप समय के साथ बदलता है, लेकिन देवनागरी लेखन से लगातार दूरी बनना चिंता का विषय है। भाषा केवल बोलने और समझने का माध्यम नहीं होती, बल्कि उसकी लिपि भी हमारी सांस्कृतिक और भाषाई पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा होती है।
हिंदी शिक्षक की भूमिका को कमतर क्यों आंका जाए?
हिंदी पढ़ाना केवल किताब का पाठ पढ़ा देना नहीं है। एक कुशल हिंदी शिक्षक विद्यार्थियों को व्याकरण, मात्राओं के सही प्रयोग, शब्दों के अर्थ, उच्चारण, साहित्य, लेखन और प्रभावी अभिव्यक्ति की बारीकियां समझाता है।
इसके बावजूद समाज में यह धारणा देखने को मिलती है कि “हिंदी तो कोई भी पढ़ा सकता है।” यह सोच न केवल हिंदी विषय को, बल्कि हिंदी शिक्षक की विशेषज्ञता और भूमिका को भी कमतर करती है।
हर विषय की तरह हिंदी के अध्यापन के लिए भी विषय की गहरी समझ, प्रशिक्षण और अनुभव आवश्यक है। हिंदी शिक्षक भाषा के साथ-साथ संस्कृति, साहित्य और अभिव्यक्ति की परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का महत्वपूर्ण कार्य करता है।
समाज की मानसिकता बदलना जरूरी
हिंदी के प्रति बदलती सोच के लिए केवल शिक्षा व्यवस्था को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। समाज की मानसिकता भी इसके लिए उतनी ही जिम्मेदार है। अंग्रेजी बोलने वाले व्यक्ति को अधिक आधुनिक और हिंदी बोलने वाले को कम योग्य समझने की प्रवृत्ति पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
आधुनिकता का अर्थ अपनी भाषा, संस्कृति और जड़ों से दूरी बनाना नहीं हो सकता। एक व्यक्ति जितनी अधिक भाषाएं सीखे, उसका ज्ञान उतना ही व्यापक होता है। इसलिए अंग्रेजी का ज्ञान हिंदी के विरोध में नहीं, बल्कि हिंदी के साथ होना चाहिए।
हिंदी दिवस केवल एक दिन का उत्सव न बने
हर वर्ष हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़े के दौरान गोष्ठियां, प्रतियोगिताएं, कार्यशालाएं और भाषण आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों का अपना महत्व है, लेकिन हिंदी के प्रति हमारा दायित्व केवल इन्हीं कार्यक्रमों तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
हिंदी को वास्तविक सम्मान तब मिलेगा, जब हम इसे केवल परीक्षा का विषय न मानकर दैनिक जीवन, शिक्षा, संवाद और अभिव्यक्ति का स्वाभाविक माध्यम बनाएंगे। घर में बच्चों से हिंदी में संवाद करना, देवनागरी में लिखने के लिए प्रेरित करना और हिंदी साहित्य पढ़ने की आदत विकसित करना छोटे लेकिन महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
हिंदी हमारी पहचान और अभिमान
हिंदी कोई ‘टाइमपास’ की भाषा नहीं है। यह समृद्ध साहित्य, विशाल शब्द-संपदा और गहरी अभिव्यक्ति क्षमता वाली भाषा है। कबीर, तुलसीदास, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, निराला और अनेक साहित्यकारों ने हिंदी को अपनी रचनात्मकता से समृद्ध किया है। हिंदी का अध्ययन जितना गहरा किया जाए, इसकी विविधता और सामर्थ्य उतनी ही अधिक सामने आती है।
अंग्रेजी सीखना आज आवश्यक हो सकता है, लेकिन हिंदी को भूल जाना हमारी मजबूरी नहीं होनी चाहिए। हमें दोनों भाषाओं का ज्ञान अर्जित करना चाहिए, पर अपनी मातृभाषा और अपनी भाषाई पहचान के प्रति सम्मान बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
हिंदी हमारी केवल भाषा नहीं, बल्कि हमारी पहचान, सम्मान और अभिमान भी है। आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी दिवस कैलेंडर की एक तारीख बनकर न रह जाए। हिंदी के प्रति सम्मान हमारे व्यवहार, शिक्षा और दैनिक जीवन का स्वाभाविक हिस्सा बने—यही हिंदी दिवस की वास्तविक सार्थकता होगी।
