बीजेपी में क्या चल रहा है? सागर में दो दिग्गजों की अचानक ‘सुलह दावत’, कांग्रेस बोली— गुटबाजी चरम पर
मध्य प्रदेश की राजनीति में इस समय सबसे ज्यादा चर्चा सागर की उसी तस्वीर की है, जिसमें बीजेपी के दो बड़े नेता— मंत्री गोविंद सिंह राजपूत और पूर्व मंत्री भूपेंद्र सिंह—एक ही टेबल पर बैठकर भोजन करते दिखाई दिए। यह दृश्य इतना साधारण नहीं था; बल्कि इसे लेकर प्रदेश की राजनीति में नई बहस और हलचल छिड़ चुकी है। लोग इसे “भोजन कूटनीति” कह रहे हैं, तो कांग्रेस का दावा है कि यह तस्वीर बताती है कि बीजेपी में गुटबाजी चरम पर है।
सवाल यह भी उठ रहा है कि बीजेपी में आखिर क्या चल रहा है, और किस वजह से प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल को स्वयं सागर तक पहुंचकर दोनों नेताओं को साथ बैठाने का प्रयास करना पड़ा?
आइए पूरी घटना को विस्तार से समझते हैं।
पृष्ठभूमि: सागर में बीजेपी का असली विवाद क्या है?
सागर में पिछले एक साल से बीजेपी के भीतर दो खेमों की खाई बढ़ती जा रही थी।
एक ओर मंत्री गोविंद सिंह राजपूत, दूसरी ओर पूर्व मंत्री और सागर में बेहद प्रभावशाली नेता भूपेंद्र सिंह।
दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच कई महीनों से आपसी खींचतान और टकराव के किस्से राजनीतिक हलकों में चर्चा में रहे हैं।
यह तनाव इतना बढ़ गया कि सागर की राजनीति में विकास कार्यों और प्रशासनिक समन्वय पर भी इसका असर माना जाने लगा।
बीजेपी हाईकमान भी इस बात को लेकर चिंतित था कि यदि 2028 विधानसभा चुनाव की तैयारी करनी है, तो सागर जैसे मजबूत बीजेपी क्षेत्र में अंतर्कलह का समाधान जरूरी है।
“भोजन कूटनीति” – हेमंत खंडेलवाल का अनोखा तरीका
खबरों के मुताबिक, प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल पिछले कई दिनों से अंदरूनी खींचतान को खत्म करने की कोशिश कर रहे थे।
लेकिन शनिवार को उन्होंने एक बिल्कुल अलग तरीका अपनाया, जिसने राजनीति में हलचल पैदा कर दी।
पहला दौर: गोविंद सिंह राजपूत के घर भोजन
खंडेलवाल भूपेंद्र सिंह को लेकर सबसे पहले गोविंद सिंह राजपूत के निवास पहुंचे।
दोनों नेताओं को एक साथ बैठाया गया।
मेज पर भोजन था… और दोनों नेताओं के चेहरों पर हल्की-फुल्की मुस्कान।
यह तस्वीर तेजी से वायरल हो गई और सवाल उठने लगे—
“क्या यह सुलह की शुरुआत है?”
दूसरा दौर: भूपेंद्र सिंह के घर भोजन
कुछ देर बाद ही यह ‘सुलह यात्रा’ आगे बढ़ी और इस बार गोविंद सिंह राजपूत को लेकर प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह के घर पहुंचे।
यहां फिर दोनों दिग्गज नेताओं ने साथ बैठकर खाना खाया।
राजनीतिक गलियारों में इसे “भोज-दर-भोज राजनीति” कहा जा रहा है—
जहाँ एक नहीं, बल्कि दो बार सामंजस्य दिखाने का प्रयास किया गया।
क्या वास्तव में बीजेपी में गुटबाजी है?
प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल ने भोजन के बाद मीडिया से बात करते हुए कहा:
“पार्टी में किसी तरह की गुटबाजी नहीं है। बीजेपी एक परिवार है और सभी नेता मिलकर काम कर रहे हैं।”
लेकिन ज़मीनी हकीकत और पिछले महीनों के घटनाक्रम को देखें तो कई राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि सागर में दोनों नेताओं के बीच दूरियां वास्तविक थीं।
भाजपा संगठन इन्हें सार्वजनिक टकराव में बदलने से रोकना चाहता था, इसलिए खुद प्रदेश अध्यक्ष को मोर्चा संभालना पड़ा।
कांग्रेस का तंज— “बीजेपी में गुटबाजी चरम पर, तभी तो ये दांव चलाना पड़ा”
कांग्रेस ने इस पूरे घटनाक्रम पर चुटकी लेते हुए इसे बीजेपी की कमजोरी बताया।
पूर्व मंत्री पीसी शर्मा ने कहा:
“बीजेपी में गुटबाजी चरम पर है।
अगर सब ठीक होता तो प्रदेश अध्यक्ष को सागर जाकर भोजन करवाने की नौबत ही क्यों आती?”
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि यह सुलह दावत इसलिए करवाई गई ताकि आने वाले स्थानीय निकाय चुनाव और भविष्य की तैयारियों में पार्टी को नुकसान न हो।
राजनीतिक संदेश क्या निकला?
इस ‘भोजन कूटनीति’ का संदेश कई स्तरों पर समझा जा रहा है—
1. बीजेपी हाईकमान का संदेश: एकजुट रहो
बीजेपी नेतृत्व नहीं चाहता कि सागर जैसा मजबूत गढ़ अंतर्कलह से कमजोर पड़े।
2. भूपेंद्र सिंह और गोविंद राजपूत को संकेत
दोनों ही सागर क्षेत्र के बड़े पावर सेंटर हैं।
उन्हें यह दिखाना जरूरी था कि पार्टी में कोई दो खेमे नहीं, बल्कि एक ही नेतृत्व है।
3. समर्थकों को भी कड़ा संदेश
कई बार असली समस्या नेता नहीं, उनके कार्यकर्ता बन जाते हैं।
इसलिए यह सामंजस्य बैठक जमीनी स्तर पर भी संदेश देने के लिए थी।
क्या यह सुलह लंबी चलेगी?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि ऐसी सामंजस्य बैठकों से तुरंत हलचल कम तो होती है, लेकिन स्थायी समाधान तभी होगा जब दोनों नेता आने वाले महीनों में एक-दूसरे के क्षेत्रों और कार्यकर्ताओं के साथ भी तालमेल दिखाएं।
सागर की राजनीति में दोनों नेताओं का दबदबा है, और किसी भी तरह की दूरी भाजपा संगठन के लिए चुनौती बन सकती है।
क्यों जरूरी था यह कदम?
बीजेपी के लिए सागर सिर्फ एक जिला नहीं, बल्कि एक राजनीतिक मजबूती का केंद्र है।
पार्टी का लक्ष्य है:
- गुटबाजी खत्म करना
- स्थानीय नाराज़गियों को शांत करना
- 2028 चुनाव की तैयारी
- संगठन को ज़मीनी स्तर पर मजबूत रखना
इन्हीं कारणों से प्रदेश अध्यक्ष ने व्यक्तिगत रूप से हस्तक्षेप किया।
निष्कर्ष: ‘दावत’ के बहाने एकता का संदेश
सागर में हुआ यह ‘सुलह भोज’ सिर्फ एक भोजन नहीं था—
यह एक बड़ा राजनीतिक संकेत था कि बीजेपी अपनी अंदरूनी खींचतान को गंभीरता से ले रही है और समय रहते सामंजस्य बनाना चाहती है।
हालाँकि कांग्रेस इसे गुटबाजी का प्रमाण बता रही है, लेकिन बीजेपी नेतृत्व इस मुलाकात को मजबूती और एकजुटता का प्रदर्शन बता रहा है।
सवाल अब यह है—
क्या मिट चुकी खाई?
या यह राजनीतिक तस्वीर सिर्फ अगले संघर्ष तक की शांति है?
आने वाले दिनों में सागर की राजनीति इसका जवाब दे देगी।

