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उत्तम संयम धर्म का सार मन, वचन और काया पर नियंत्रण : आर्यिका संगममति

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Published On: 21 September 2026
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उत्तम संयम धर्म का सार मन, वचन और काया पर नियंत्रण : आर्यिका संगममति

दशलक्षण महापर्व के छठे दिन अम्बाह जैन बगीची में श्रद्धा और भक्तिभाव के साथ मनाया गया उत्तम संयम धर्म

अम्बाह/मुरैना। दशलक्षण महापर्व के छठे दिन अम्बाह जैन बगीची में उत्तम संयम धर्म श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ मनाया गया। इस अवसर पर श्रद्धालुओं ने अभिषेक, शांतिधारा, पूजन सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में उत्साहपूर्वक सहभागिता की। जैन बगीची में दिनभर धार्मिक वातावरण बना रहा और बड़ी संख्या में श्रद्धालु कार्यक्रमों में शामिल हुए।

मन, वचन और काया पर नियंत्रण ही उत्तम संयम

आर्यिका रत्न 105 श्री संगममति माताजी ने उत्तम संयम धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि मन, वचन और काया पर नियंत्रण रखते हुए जीवों की रक्षा करना तथा इंद्रियों को संयमित रखना ही उत्तम संयम धर्म का सार है। उन्होंने कहा कि संयम केवल बाहरी क्रियाओं पर नियंत्रण रखने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह क्रोध, मान, माया और लोभ जैसी कषायों को शांत करने का माध्यम भी है।

इंद्रिय संयम के साथ जीवों के प्रति रखें दया और करुणा

आर्यिका संगममति माताजी ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि इंद्रियों पर नियंत्रण रखने के साथ ही प्रत्येक जीव के प्रति अहिंसा, दया और करुणा का भाव रखना आवश्यक है। जैन धर्म में पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और वनस्पति सहित चलायमान जीवों की रक्षा करना संयम का महत्वपूर्ण स्वरूप माना गया है। उन्होंने कहा कि जीवन में संयम अपनाने से व्यक्ति के व्यवहार, विचार और आचरण में सकारात्मक परिवर्तन आता है।

संयमित मन से विचारों में आती है शुद्धता

माताजी ने कहा कि जब मन संयमित होता है तो विचारों में शुद्धता आती है। वाणी पर नियंत्रण रखने से व्यवहार और संबंध मधुर बनते हैं, जबकि काया के संयम से जीवन अहिंसा और आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ता है। उन्होंने श्रद्धालुओं को संयम को केवल धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित न रखते हुए उसे दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने का संदेश दिया।

संयम आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण का मार्ग

आर्यिका संगममति माताजी ने कहा कि संयम जीवन को अनुशासन प्रदान करता है और आत्मा को विकारों से मुक्त करने का मार्ग प्रशस्त करता है। मनुष्य को अपनी इच्छाओं, भावनाओं और इंद्रियों पर नियंत्रण रखते हुए आत्मचिंतन करना चाहिए। संयम के माध्यम से व्यक्ति अपने आचरण को बेहतर बना सकता है और आत्मिक विकास की दिशा में आगे बढ़ सकता है।

दशलक्षण महापर्व में श्रद्धालु ले रहे आत्मशुद्धि का संकल्प

उन्होंने कहा कि दशलक्षण महापर्व आत्मचिंतन, आत्मशुद्धि और सद्गुणों को जीवन में उतारने का अवसर है। पर्व के दौरान श्रद्धालु धार्मिक आयोजनों में शामिल होकर आत्मसंयम, अहिंसा और सदाचार को अपनाने का संकल्प ले रहे हैं। अम्बाह जैन बगीची में आयोजित धार्मिक कार्यक्रमों में श्रद्धालुओं की सहभागिता बनी रही। भक्तों ने उत्तम संयम धर्म के संदेश को सुनकर उसे अपने जीवन में उतारने का संकल्प लिया।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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