US-India व्यापार समझौते पर अमेरिका का रुख स्पष्ट: ‘अमेरिका फर्स्ट’ के साथ आगे बढ़ेगी साझेदारी
नई दिल्ली में आयोजित प्रतिष्ठित वैश्विक सम्मेलन Raisina Dialogue के दौरान अमेरिका के उप-विदेश मंत्री Christopher Landau ने India और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को आगे बढ़ाने को लेकर उत्साहित है, लेकिन किसी भी समझौते में अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देगा।
लैंडाउ ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अमेरिका वही गलती भारत के साथ नहीं दोहराएगा जो लगभग दो दशक पहले China के साथ हुई थी। उस समय अमेरिका ने चीन को अपने बाजारों तक व्यापक पहुंच दी थी, जिससे चीन को अपनी अर्थव्यवस्था और उद्योगों को तेजी से विकसित करने का अवसर मिला। बाद के वर्षों में चीन कई व्यापारिक और औद्योगिक क्षेत्रों में अमेरिका के लिए मजबूत प्रतिस्पर्धी बन गया और कई मामलों में उससे आगे भी निकल गया।
चीन के अनुभव से सीख लेने की बात
लैंडाउ ने कहा कि पिछले अनुभवों से सीख लेते हुए अमेरिका अब किसी भी अंतरराष्ट्रीय व्यापार समझौते में अधिक सतर्क और संतुलित दृष्टिकोण अपनाना चाहता है। उन्होंने कहा कि अमेरिका यह सुनिश्चित करेगा कि जो भी व्यापार समझौता हो, वह अमेरिकी नागरिकों और उद्योगों के लिए निष्पक्ष और लाभकारी हो।
उन्होंने कहा, “हमारा पहला दायित्व अपने लोगों के प्रति है। जिस प्रकार भारत सरकार अपने नागरिकों के प्रति जवाबदेह है, उसी प्रकार अमेरिका भी अपने नागरिकों और उद्योगों के हितों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है।”
लैंडाउ के इस बयान से यह संकेत मिलता है कि अमेरिका भारत के साथ व्यापार समझौते को लेकर सकारात्मक है, लेकिन वह यह भी चाहता है कि समझौता दोनों देशों के हितों को संतुलित रूप से ध्यान में रखते हुए किया जाए।
‘अमेरिका फर्स्ट’ की नीति पर स्पष्टीकरण
लैंडाउ ने अपने संबोधन में America First नीति का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इस नीति का अर्थ यह नहीं है कि अमेरिका वैश्विक स्तर पर अलग-थलग रहना चाहता है या अन्य देशों से दूरी बनाना चाहता है।
उनके अनुसार, “अमेरिका फर्स्ट का मतलब अमेरिका अकेला नहीं है। कई बार अपने राष्ट्रीय हितों को आगे बढ़ाने का सबसे प्रभावी तरीका यह होता है कि हम अन्य देशों के साथ सहयोग करें और मजबूत साझेदारी विकसित करें।”
उन्होंने कहा कि भारत के साथ प्रस्तावित व्यापार समझौता इसी सहयोग और साझेदारी की भावना का हिस्सा है।
व्यापार समझौता अंतिम चरण में
लैंडाउ ने यह भी बताया कि भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते पर बातचीत अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है। दोनों देशों के बीच पिछले कुछ वर्षों में आर्थिक और रणनीतिक संबंधों में लगातार वृद्धि हुई है, और यह समझौता उन संबंधों को और मजबूत बना सकता है।
उन्होंने कहा कि दोनों देश व्यापार, निवेश और तकनीकी सहयोग के नए अवसरों को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ आगे बढ़ रहे हैं।
भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक संबंध पहले से ही काफी मजबूत हैं। दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का व्यापार लगातार बढ़ रहा है, और कई अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश कर रही हैं। वहीं भारतीय कंपनियां भी अमेरिका में अपने व्यापार और निवेश का विस्तार कर रही हैं।
ट्रंप और मोदी के विजन का उल्लेख
लैंडाउ ने अपने वक्तव्य में अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति Donald Trump और भारत के प्रधानमंत्री Narendra Modi के विजन का भी उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि जैसे डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका को फिर से महान बनाने की बात करते रहे हैं, वैसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी भारत को वैश्विक स्तर पर मजबूत और प्रभावशाली राष्ट्र बनाने के लिए काम कर रहे हैं।
लैंडाउ के अनुसार यह स्वाभाविक है कि हर देश का नेतृत्व अपने देश के विकास और नागरिकों के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देता है। उन्होंने कहा कि जब दो देश अपने-अपने हितों को ध्यान में रखते हुए सहयोग करते हैं, तो वह साझेदारी अधिक मजबूत और टिकाऊ बनती है।
भारत की वैश्विक भूमिका पर जोर
लैंडाउ ने 21वीं सदी में भारत की बढ़ती भूमिका पर भी जोर दिया। उन्होंने कहा कि भारत अब दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है और इसके पास विशाल मानव संसाधन, तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और मजबूत तकनीकी क्षमता है।
उन्होंने कहा कि इन सभी कारणों से भारत उन देशों में शामिल है जो आने वाले दशकों में वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित करेंगे। अमेरिका इस वास्तविकता को समझता है और भारत के साथ दीर्घकालिक साझेदारी को और मजबूत करने का इच्छुक है।
ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग की संभावना
लैंडाउ ने यह भी कहा कि अमेरिका भारत के साथ ऊर्जा क्षेत्र में सहयोग बढ़ाने के लिए तैयार है। भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था के कारण ऊर्जा की मांग भी तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में अमेरिका भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में सहयोग कर सकता है।
उन्होंने कहा कि अमेरिका भारत की अल्पकालिक और दीर्घकालिक ऊर्जा चुनौतियों को समझता है और इन चुनौतियों से निपटने के लिए दोनों देश मिलकर काम कर सकते हैं।
ऊर्जा सहयोग में तेल और गैस आपूर्ति, स्वच्छ ऊर्जा तकनीक, और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़े कई क्षेत्र शामिल हो सकते हैं।
रणनीतिक साझेदारी और भविष्य की संभावनाएं
लैंडाउ के अनुसार, भारत और अमेरिका के बीच संबंध केवल व्यापार तक सीमित नहीं हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, तकनीक, शिक्षा, स्वास्थ्य और ऊर्जा जैसे कई क्षेत्रों में सहयोग बढ़ रहा है।
उन्होंने कहा कि आने वाले वर्षों में यह साझेदारी और गहरी हो सकती है, क्योंकि दोनों देशों के साझा हित और वैश्विक चुनौतियां कई मामलों में एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि भारत और अमेरिका के बीच मजबूत संबंध वैश्विक स्तर पर स्थिरता और आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
निष्कर्ष
नई दिल्ली में दिए गए अपने संबोधन में क्रिस्टोफर लैंडाउ ने यह स्पष्ट कर दिया कि अमेरिका भारत के साथ मजबूत आर्थिक और रणनीतिक साझेदारी चाहता है। हालांकि, किसी भी व्यापार समझौते में अमेरिका अपने राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता देगा और पिछले अनुभवों से सीख लेकर संतुलित और सावधानीपूर्ण नीति अपनाएगा।
फिर भी, दोनों देशों के बीच सहयोग की संभावनाएं काफी व्यापक हैं। व्यापार, ऊर्जा, तकनीक और रणनीतिक क्षेत्रों में बढ़ता सहयोग भारत और अमेरिका के संबंधों को आने वाले वर्षों में और मजबूत बना सकता है।

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