यूएस-इज़राइल, ईरान युद्ध: PM मोदी ने क्यों कोरोना से तुलना की और भारत पर असर
पश्चिम एशिया में अमरीका-इज़राइल और ईरान के बीच युद्ध अब एक महीने से अधिक समय से जारी है। इस बीच, इसका असर भारत तक भी पहुंच चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस स्थिति को गंभीर चुनौती बताते हुए कोरोना संकट से तुलना की। उन्होंने कहा कि कोरोना काल में जिस तरह देश ने एकजुट होकर चुनौती का सामना किया था, उसी तरह इस संकट का भी सामना करना होगा।
हालांकि भारत में कोरोना की तरह जान का खतरा नहीं है, लेकिन इस युद्ध के आर्थिक और सामाजिक प्रभाव व्यापक हैं। माल और वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी, एलपीजी संकट, उद्योग और व्यवसाय पर असर, रोजमर्रा की जिंदगी में कठिनाइयाँ — यह सब पहले ही देखने को मिल रहा है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री ने पहली बार संसद में इस संकट का जिक्र करते हुए इसे कोरोना संकट से जोड़कर समझाया।
रोजमर्रा की जिंदगी पर असर
कोरोना संकट की तरह पश्चिम एशिया का युद्ध भी आम नागरिकों को प्रभावित कर रहा है। छोटे व्यवसाय, स्ट्रीट वेंडर्स और घरों तक इसकी झलक दिखाई दे रही है। उदाहरण के लिए, कई चाय दुकानदारों ने दाम बढ़ा दिए हैं, कुछ ने छोटी चाय की बिक्री बंद कर दी। उनका कहना है कि अब रोजमर्रा का खर्च दोगुना हो गया है।
शहरी क्षेत्रों में स्कूल, ऑफिस और कैंटीन भी प्रभावित हुए हैं। कई निजी स्कूलों ने बच्चों को खाने की पेड सुविधा कम या बंद कर दी है। ऑफिस कैंटीन में मैन्यू सीमित हो गया है। ढाबे और रेस्तरां भी पहले की तुलना में कम वस्तुएँ बेच रहे हैं और ज्यादा कीमत ले रहे हैं।
LPG संकट और गैस की कमी
इस संकट के चलते LPG सिलिंडर की किल्लत भी सामने आई है। कई घरों और व्यवसायों में सिलिंडर या तो उपलब्ध नहीं हैं या कालाबाजारी से महंगे दामों में मिल रहे हैं। पहले घरेलू सिलिंडर 1000–1200 रुपये में मिलते थे, अब कीमत 2200–3000 रुपये तक पहुँच गई है। कमर्शियल सिलिंडर की कीमत भी बढ़कर 6000 रुपये तक पहुंच गई।
इस कमी के कारण लोग लकड़ी-कोयला वाले चूल्हों या बिजली के इंडक्शन का इस्तेमाल बढ़ाने लगे हैं। बड़े होटल भी पारंपरिक चूल्हों पर खाना बनाना शुरू कर चुके हैं। मुंबई में डब्बा सेवा प्रभावित हुई है। कई टिफिन सेवा प्रदाता लकड़ी-कोयले की सिगड़ी पर खाना बना रहे हैं या अपने काम को बंद कर चुके हैं।
छोटे सिलिंडर का गैरकानूनी उपयोग भी बढ़ा है। कई अकेले रहने वाले छात्र और मजदूर छोटे सिलिंडर भरकर खाना पकाते हैं। इसका क़ीमत बढ़कर 60–70 रुपये प्रति किलो से 300 रुपये प्रति किलो तक हो गया है। सिलिंडर की लंबी कतारें भी कोरोना की याद दिला रही हैं, क्योंकि कई स्थानों पर बुकिंग के बावजूद डिलीवरी में 10–15 दिन लग रहे हैं।
कारोबारी गतिविधियों पर असर
एचएसबीसी फ्लैश इंडिया पीएमआई के आंकड़े बताते हैं कि मार्च में निजी क्षेत्र की कारोबारी गतिविधियाँ पिछले साढ़े तीन साल में सबसे निचले स्तर पर चली गईं। इसका मुख्य कारण पश्चिम एशिया में युद्ध, घरेलू मांग में कमी, बाजार की अस्थिरता और महंगाई का दबाव बताया गया है।
एसबीआई की रिसर्च के अनुसार तेल की बढ़ती कीमतें वित्त वर्ष 2027 में विकास दर को 0.25% तक गिरा सकती हैं। मूडी एनालिटिक्स का अनुमान है कि यदि युद्ध लंबा चला, तो भारत की आर्थिक विकास दर घटकर चार प्रतिशत तक रह सकती है। भारत की लगभग 40% तेल और 80% गैस की खपत पश्चिम एशिया से होती है। इनकी कीमतों में वृद्धि से महंगाई बढ़ेगी, व्यापार घाटा बढ़ेगा और आर्थिक दबाव और बढ़ जाएगा।
LPG और ऊर्जा सुरक्षा
दिल्ली स्थित थिंक‑टैंक ब्यूरो ऑफ रिसर्च ऑन इंडस्ट्री एंड इकनॉमिक फंडामेंटल्स (BRIEF) के अख्तर मलिक ने बताया कि भारत ने कच्चे तेल का रणनीतिक भंडार तो बना रखा है, लेकिन एलपीजी के लिए कोई विशेष बफर स्टॉक नहीं है। आम तौर पर वैश्विक स्तर पर आवश्यक ईंधन का 40–60 दिन का भंडार रखा जाता है, जबकि भारत के पास एलपीजी का मात्र 20 दिन का भंडार है।
भारत में एलपीजी की खपत का 60% आयात से आता है और इसका 90% स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के रास्ते आता है। युद्ध के कारण सप्लाई प्रभावित हुई है। सरकार ने एलपीजी उत्पादन बढ़ाने और दूसरे देशों से आयात करने के आदेश दिए हैं। हालांकि, इसमें समय और अतिरिक्त खर्च बढ़ रहा है।
LPG आपूर्ति में प्राथमिकता
सरकार ने एलपीजी आपूर्ति में प्राथमिकता तय की है। घरेलू उपभोक्ता, अस्पताल, शिक्षण संस्थान पहले आते हैं। व्यवसाय और होटल बाद में आते हैं। जिन व्यवसायियों ने ब्लैक मार्केट से गैस ली, वे मुनाफा कमाने में सक्षम हैं, लेकिन अन्य व्यवसाय बाधित हुए हैं।
उद्योग और रोजगार पर असर
गैस पर निर्भर उद्योगों की हालत खराब है। गुजरात के मोरबी में टाइल उद्योग पूरी तरह प्रभावित हुआ है। कई फैक्ट्रियां बंद हुईं या उत्पादन रोक दिया गया। इससे मजदूर बेरोजगार हुए और अपने गाँव लौट गए।
विदेशी मुद्रा पर भी असर पड़ा है। खाड़ी देशों में लगभग 90 लाख भारतीय काम करते हैं। उनके काम पर संकट है और युद्ध लंबा चला तो उन्हें घर लौटना पड़ सकता है।
शेयर बाजार और निर्यात
शेयर बाजार में सात दिनों में निवेशकों के 240 अरब डॉलर डूब गए। डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत बढ़ी। तेल महंगा हुआ और विदेश से सामान मंगवाना महंगा हो गया। बासमती चावल का निर्यात भी प्रभावित हुआ है। 2024-25 में भारत से 50,312 करोड़ रुपये का बासमती चावल भेजा गया, इसका करीब आधा पांच देशों (सऊदी अरब, ईराक, ईरान, UAE और यमन) को गया था। युद्ध ने निर्यात पर गंभीर असर डाला है।
निष्कर्ष
PM नरेंद्र मोदी ने इस संकट को कोरोना काल जैसी गंभीर चुनौती बताया है। यह स्पष्ट है कि युद्ध केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं है। इसका आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असर भारत तक भी पहुंचा है। आवश्यक है कि सरकार, उद्योग और नागरिक मिलकर इस चुनौती का सामना करें, ताकि देश की आपूर्ति श्रृंखला, अर्थव्यवस्था और आम जनता प्रभावित न हो।
