UCC पर ओवैसी और रामेश्वर शर्मा में जुबानी जंग तेज, हलाला और धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर आमने-सामने
हुजूर विधायक ने समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए ओवैसी पर साधा निशाना; AIMIM प्रमुख ने UCC को धार्मिक अधिकारों के खिलाफ बताया
भोपाल। समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड को लेकर देश में जारी राजनीतिक बहस के बीच AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी और भोपाल की हुजूर विधानसभा सीट से भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा के बीच तीखा वार-पलटवार शुरू हो गया है। ओवैसी द्वारा UCC के विरोध में दिए गए बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए रामेश्वर शर्मा ने कहा कि देश में रहने वाले प्रत्येक नागरिक को कानून का पालन करना होगा।
रामेश्वर शर्मा ने आरोप लगाया कि कुछ राजनीतिक दल और नेता बहुसंख्यक समाज के मत तो चाहते हैं, लेकिन समान कानून का समर्थन नहीं करते। उन्होंने निकाह हलाला जैसी प्रथाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि महिलाओं के सम्मान और अधिकारों के खिलाफ किसी भी गतिविधि को स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए।
उनकी टिप्पणियों को एक राजनीतिक बयान के रूप में देखा जाना चाहिए। विभिन्न धार्मिक प्रथाओं की कानूनी और संवैधानिक स्थिति का निर्णय संसद और न्यायालयों द्वारा किया जाता है।
ओवैसी ने UCC पर उठाए संवैधानिक सवाल
असदुद्दीन ओवैसी ने केंद्र सरकार और भाजपा शासित राज्यों की UCC लागू करने की योजना का विरोध किया है। उनका आरोप है कि समान नागरिक संहिता के नाम पर अल्पसंख्यक समुदायों के व्यक्तिगत और धार्मिक अधिकारों को प्रभावित करने का प्रयास किया जा रहा है।
ओवैसी ने कहा कि भारत की वास्तविक पहचान उसकी विविधता और बहुलतावादी व्यवस्था में है। उन्होंने दावा किया कि UCC से जुड़े प्रस्ताव सभी समुदायों पर समान तरीके से लागू नहीं किए जा रहे हैं। आदिवासी समुदायों और कुछ अन्य वर्गों को संभावित छूट दिए जाने का उल्लेख करते हुए उन्होंने पूछा कि यदि कानून वास्तव में समान है तो अलग-अलग समुदायों के लिए अलग प्रावधान क्यों रखे जा रहे हैं।
उन्होंने भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में शामिल दलों से भी UCC पर अपना रुख स्पष्ट करने को कहा है। ओवैसी का कहना है कि कई सहयोगी दलों की विचारधारा और सामाजिक आधार इस विषय पर भाजपा से अलग है।
रामेश्वर शर्मा ने किया पलटवार
ओवैसी के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा कि देश में सभी नागरिकों के लिए समान कानून होना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि राजनीतिक दल बहुसंख्यक आबादी से वोट तो मांगते हैं, लेकिन समान नागरिक कानून का समर्थन करने से पीछे क्यों हटते हैं।
शर्मा ने कहा कि भारत संविधान और कानून से संचालित देश है। किसी भी धर्म या समुदाय के नाम पर महिलाओं के अधिकारों और सम्मान से समझौता नहीं होना चाहिए। उन्होंने निकाह हलाला को अनुचित बताते हुए कहा कि ऐसी प्रथाओं को रोकने के लिए कानूनी व्यवस्था आवश्यक है।
विधायक ने दावा किया कि UCC का उद्देश्य किसी धर्म का विरोध करना नहीं, बल्कि विवाह, तलाक, उत्तराधिकार और गोद लेने जैसे नागरिक विषयों पर समान व्यवस्था बनाना है।
‘80 प्रतिशत आबादी का वोट चाहिए, लेकिन कानून नहीं’
रामेश्वर शर्मा ने अपने बयान में कहा कि कुछ दलों और नेताओं को देश की करीब 80 प्रतिशत हिंदू आबादी का वोट चाहिए, लेकिन वे समान कानून का पालन करने की बात स्वीकार नहीं करते। उन्होंने इसे राजनीतिक विरोधाभास बताते हुए ओवैसी पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया।
उन्होंने ओवैसी को चुनौती देते हुए कहा कि यदि उन्हें अपने विचारों पर भरोसा है तो मध्य प्रदेश की सभी 230 विधानसभा सीटों पर उम्मीदवार उतारकर जनता के बीच जाएं। शर्मा ने दावा किया कि मध्य प्रदेश की जनता विभाजनकारी राजनीति को स्वीकार नहीं करेगी।
ओवैसी अथवा AIMIM की ओर से रामेश्वर शर्मा के इन नए आरोपों पर विस्तृत प्रतिक्रिया सामने आने के बाद ही दोनों पक्षों की पूरी स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
हलाला को लेकर क्या है विवाद?
निकाह हलाला एक धार्मिक-सामाजिक विषय है, जिसे लेकर लंबे समय से कानूनी और सार्वजनिक बहस होती रही है। इसके आलोचकों का कहना है कि इस प्रथा का दुरुपयोग महिलाओं के अधिकारों और गरिमा को प्रभावित कर सकता है। दूसरी ओर, धार्मिक मामलों के जानकार इसकी व्याख्या शरीयत और व्यक्तिगत कानूनों के संदर्भ में करते हैं।
रामेश्वर शर्मा ने इसी मुद्दे को UCC की आवश्यकता से जोड़ते हुए कहा कि महिलाओं के शोषण की आशंका वाली प्रथाओं को जारी रखने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। हालांकि किसी संपूर्ण धार्मिक समुदाय या सभी मौलवियों को ऐसी गतिविधियों से जोड़कर देखना तथ्यात्मक रूप से उचित नहीं होगा।
महिलाओं के अधिकारों से जुड़े मामलों में अदालतें पहले भी संवैधानिक समानता, गरिमा और धार्मिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन की आवश्यकता पर जोर देती रही हैं।
क्या है समान नागरिक संहिता?
समान नागरिक संहिता का सामान्य अर्थ देश के सभी नागरिकों के लिए विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, संपत्ति और गोद लेने जैसे व्यक्तिगत नागरिक मामलों में एक समान कानूनी व्यवस्था लागू करना है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 44 में राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करने का प्रयास करने की बात कही गई है। यह संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में शामिल है। ये तत्व सरकार के लिए मार्गदर्शक होते हैं, लेकिन इन्हें सीधे अदालत के माध्यम से लागू नहीं कराया जा सकता।
UCC समर्थकों का कहना है कि इससे सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे और विशेष रूप से महिलाओं के साथ होने वाले भेदभाव को कम किया जा सकेगा। विरोधियों का तर्क है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में एक समान कानून बनाते समय धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं और जनजातीय रीति-रिवाजों का सम्मान आवश्यक है।
अमित शाह के बयान के बाद तेज हुई बहस
UCC को लेकर राजनीतिक बहस केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस बयान के बाद तेज हुई, जिसमें भाजपा नेतृत्व वाले राज्यों में इसे लागू करने की योजना की बात कही गई। इसके बाद ओवैसी ने सरकार की मंशा पर सवाल उठाए और इसे देश की बहुलतावादी भावना के विरुद्ध बताया।
रामेश्वर शर्मा ने ओवैसी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि समान नागरिक संहिता संविधान की भावना के अनुरूप है। उनका कहना है कि कानून का उद्देश्य सभी नागरिकों को समान अधिकार और सुरक्षा प्रदान करना होना चाहिए।
फिलहाल पूरे देश के लिए कोई नया समान नागरिक संहिता कानून लागू नहीं हुआ है। अलग-अलग राज्यों में प्रस्तावों और कानूनों का स्वरूप अलग हो सकता है। इसलिए UCC के वास्तविक प्रभाव का आकलन किसी अंतिम विधेयक या कानून के प्रावधान सामने आने के बाद ही किया जा सकेगा।
राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह विषय धार्मिक स्वतंत्रता, लैंगिक समानता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा है। ऐसे में सभी पक्षों की जिम्मेदारी है कि बहस तथ्यों और संवैधानिक मर्यादा के आधार पर हो तथा किसी समुदाय के प्रति घृणा अथवा गलत धारणा को बढ़ावा न दिया जाए।
