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सच्चे देव मार्ग दिखाते हैं, सच्चा आगम उस मार्ग को समझाता है: आचार्यश्री उदारसागर महाराज

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Published On: 12 August 2026
Acharya Udar Sagar Maharaj addresses a Jain religious gathering at Shri Parshwanath Digambar Jain Temple in Morena
— Acharya Udar Sagar Maharaj addresses a Jain religious gathering at Shri Parshwanath Digambar Jain Temple in Morena

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सच्चे देव मार्ग दिखाते हैं, सच्चा आगम उस मार्ग को समझाता है: आचार्यश्री उदारसागर महाराज

संवाददाता:  मनोज जैन नायक

मुरैना। नगर के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में परम पूज्य आचार्यश्री 108 उदारसागर महाराज ने श्रद्धालुओं को सच्चे देव और सच्चे आगम की पहचान का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि संसार में देवत्व को लेकर अनेक प्रकार की धारणाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं, लेकिन जैन दर्शन के अनुसार वीतराग, सर्वज्ञ और हितोपदेशी ही वास्तविक सच्चे देव हैं।

आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे देव की पहचान केवल चमत्कार या सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति के आधार पर नहीं की जा सकती। वास्तविक देव वह हैं, जिन्होंने राग-द्वेष से पूर्ण रूप से ऊपर उठकर आत्मकल्याण और मोक्ष का मार्ग बताया है। उनके बताए मार्ग को समझने के लिए सच्चे आगम का ज्ञान भी उतना ही आवश्यक है।

सच्चे देव की पहचान बाहरी चमत्कार से नहीं

धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि संसार में लोग अलग-अलग प्रकार से देवत्व की कल्पना करते हैं। कई बार किसी शक्ति या चमत्कार को देखकर व्यक्ति उसे देवत्व का आधार मान लेता है। लेकिन जैन दर्शन में देव की पहचान सांसारिक इच्छाओं की पूर्ति से नहीं, बल्कि उनके वीतराग स्वरूप, सर्वज्ञता और हितोपदेश से होती है।

उन्होंने कहा कि सच्चे देव वह हैं जो स्वयं संसार के बंधनों से मुक्त होने के मार्ग पर पूर्णता प्राप्त कर चुके हैं और जीवों को भी उसी मोक्षमार्ग की दिशा दिखाते हैं।

सच्चे आगम की पहचान करना भी जरूरी

आचार्यश्री ने कहा कि सच्चे देव की पहचान जितनी जरूरी है, उतनी ही आवश्यकता सच्चे आगम और शास्त्र को पहचानने की भी है। संसार में अनेक ग्रंथ लिखे गए हैं और विभिन्न प्रकार के उपदेश दिए जाते हैं, लेकिन प्रत्येक पुस्तक को शास्त्र नहीं कहा जा सकता।

उन्होंने बताया कि सच्चा शास्त्र वही है, जो सच्चे आप्त द्वारा प्रतिपादित हो, तर्क और प्रमाण की कसौटी पर खरा उतरे तथा प्रत्यक्ष, अनुमान आदि प्रमाणों के विरोध में न हो।

आगम का उद्देश्य मनुष्य को भ्रमित करना नहीं, बल्कि उसके भीतर सत्य का प्रकाश करना है। सच्चा शास्त्र जीव को उसके वास्तविक स्वरूप की पहचान कराने का माध्यम बनता है।

आगम जीव और अजीव के वास्तविक स्वरूप को समझाता है

आचार्यश्री ने कहा कि सच्चा आगम जीव और अजीव सहित समस्त तत्त्वों के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान कराता है। इसके माध्यम से व्यक्ति अपने अस्तित्व और आत्मस्वरूप को समझने का प्रयास करता है।

शास्त्र यह भी बताता है कि जीव किस प्रकार संसार के बंधन में पड़ता है और कर्मों का आस्रव तथा बंधन किन कारणों से होता है। इसके साथ ही वह इन बंधनों से निवृत्ति और मोक्ष की दिशा में आगे बढ़ने का मार्ग भी बताता है।

उन्होंने कहा कि सच्चा शास्त्र मिथ्यामार्ग का खंडन करता है और व्यक्ति को सम्यक् मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करता है।

पूजा के साथ श्रद्धा, ज्ञान और आचरण जरूरी

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आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने कहा कि केवल सच्चे देव की पूजा कर लेने या शास्त्रों का पाठ कर लेने मात्र से आत्मकल्याण संभव नहीं है। इसके लिए श्रद्धा, ज्ञान और आचरण—तीनों का समन्वय आवश्यक है।

यदि श्रद्धा सच्चे देव में है, ज्ञान सच्चे आगम से प्राप्त होता है और व्यक्ति उस ज्ञान को अपने आचरण में उतारने का प्रयास करता है, तभी जीवन में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र की दिशा मजबूत होती है।

उन्होंने धर्मावलंबियों से आह्वान किया कि आत्मकल्याण की इच्छा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सच्चे देव और सच्चे शास्त्र की पहचान कर उनके बताए मार्ग पर चलने का पुरुषार्थ करना चाहिए।

सच्चे शास्त्र का उद्देश्य आत्मा को जगाना है: मुनिश्री उपशांत सागर

धर्मसभा में मुनिश्री 108 उपशांत सागर महाराज ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा कि शास्त्र केवल पढ़ने के लिए नहीं होते, बल्कि उनके संदेश को अपने जीवन में उतारना ही उनका वास्तविक उद्देश्य है।

मुनिश्री ने कहा कि शास्त्र हमें केवल बाहरी संसार और वस्तुओं का ज्ञान नहीं कराते, बल्कि स्वयं के स्वरूप को पहचानने का अवसर देते हैं। जिस ज्ञान के माध्यम से व्यक्ति अपनी आत्मा को पहचान सके और उसके जीवन की दिशा सकारात्मक रूप से बदल सके, वही ज्ञान वास्तव में सार्थक है।

शास्त्र पढ़ने के बाद जीवन में बदलाव जरूरी

मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने कहा कि हम अक्सर शास्त्रों का पाठ करते हैं, लेकिन यदि हमारे भीतर राग-द्वेष, क्रोध, मान, माया और अहंकार कम नहीं हो रहे हैं, तो हमें आत्मचिंतन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि केवल शास्त्र पढ़ लेना पर्याप्त नहीं है। यह देखना भी जरूरी है कि शास्त्र के अध्ययन का हमारे विचारों और व्यवहार पर क्या प्रभाव पड़ा है।

सच्चे आगम का प्रभाव तब दिखाई देता है, जब उसके अध्ययन से विचारों में निर्मलता, व्यवहार में विनम्रता और जीवन में संयम बढ़ने लगे।

सच्चे देव, आगम और आचरण से आत्मकल्याण की यात्रा

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मुनिश्री ने कहा कि सच्चे देव के प्रति श्रद्धा, सच्चे आगम का ज्ञान और उसके अनुसार जीवन जीने का पुरुषार्थ ही आत्मकल्याण की वास्तविक यात्रा है।

उन्होंने कहा कि शास्त्र मनुष्य को केवल बाहर देखने की दृष्टि नहीं देते, बल्कि अपने भीतर झांकने की कला भी सिखाते हैं। इसलिए आगम को केवल पुस्तक या पाठ तक सीमित नहीं रखना चाहिए। उसे जीवन का मार्गदर्शक बनाकर उसके सिद्धांतों को व्यवहार में उतारने का प्रयास करना चाहिए।

सांध्यकालीन धर्मसभा में हुआ प्रश्न मंच

कार्यक्रम के दौरान सांध्यकालीन धर्मसभा में विशेष प्रश्न मंच का आयोजन किया गया। जैन विद्वान नवनीत जैन शास्त्री ने धर्मसभा का संचालन करते हुए आचार्यश्री और मुनिश्री के प्रवचनों के प्रमुख बिंदुओं को सरलता से श्रद्धालुओं के सामने रखा।

उन्होंने कहा कि धर्म को गहराई से समझने के लिए जिज्ञासा बेहद जरूरी है। जब व्यक्ति प्रश्न करता है और उसके उत्तर को समझने का प्रयास करता है, तो ज्ञान को अधिक सरल और रुचिकर तरीके से आत्मसात किया जा सकता है।

बच्चों और युवाओं ने बढ़-चढ़कर लिया हिस्सा

प्रश्न मंच के दौरान बच्चों और युवाओं से जैन धर्म, भगवान और आगम से संबंधित विभिन्न प्रश्न पूछे गए। प्रतिभागियों ने उत्साहपूर्वक प्रश्नों के उत्तर दिए और धार्मिक विषयों को समझने का प्रयास किया।

सही और सर्वोत्तम उत्तर देने वाले बच्चों तथा बड़ों को आकर्षक पुरस्कार देकर उनका उत्साहवर्धन किया गया। इस आयोजन का उद्देश्य नई पीढ़ी को जैन धर्म और आगम के सिद्धांतों से जोड़ना तथा उनमें धर्म के प्रति जिज्ञासा और रुचि पैदा करना रहा।

गुरुभक्ति और महाआरती का हुआ आयोजन

सांध्यकालीन धर्मसभा के दौरान गुरुभक्ति और महाआरती का भी आयोजन किया गया। श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव के साथ कार्यक्रम में सहभागिता की और धार्मिक वातावरण में गुरुजनों का आशीर्वाद प्राप्त किया।

धर्मसभा में सैकड़ों की संख्या में साधर्मी बंधु, माता-बहनें और युवा साथी उपस्थित रहे। सभी ने आचार्यश्री और मुनिश्री के प्रवचनों का श्रवण किया तथा गुरुभक्ति एवं महाआरती में शामिल होकर धर्मलाभ प्राप्त किया।

धर्मसभा का संदेश

मुरैना के श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन पंचायती बड़ा मंदिर में आयोजित धर्मसभा में दिए गए प्रवचनों का मूल संदेश यही रहा कि सच्चे देव की पहचान के साथ सच्चे आगम को समझना और उसके अनुसार जीवन जीना आवश्यक है।

आचार्यश्री उदारसागर महाराज ने जहां सच्चे देव और आगम की पहचान का महत्व समझाया, वहीं मुनिश्री उपशांत सागर महाराज ने शास्त्रों के ज्ञान को व्यवहार में उतारने पर जोर दिया। दोनों संतों ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन, संयम, श्रद्धा और सही आचरण की दिशा में आगे बढ़ने का संदेश दिया।

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