जो पत्थर हथौड़ी की मार सहन करता है, वही परमात्मा बनता है: साध्वी श्री निरागरसा श्रीजी महाराज साहब
समता और सहनशीलता ही जीवन की सबसे बड़ी कला है: धर्मसभा में साध्वीश्री का प्रेरक संदेश
महिदपुर रोड। श्री राजेंद्र सूरी ज्ञान मंदिर में विराजित परम पूज्य साध्वी डॉ. अमृतरसा श्रीजी महाराज साहब एवं साध्वी श्री निरागरसा श्रीजी महाराज साहब ने गुरुवार को आयोजित धर्मसभा में श्रद्धालुओं को जिनवाणी का रसपान कराते हुए जीवन में समता, सहनशीलता और आत्मसंयम का महत्व बताया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए साध्वी श्री निरागरसा श्रीजी महाराज साहब ने कहा कि जीवन में समता बनाए रखना ही लाइफ का वास्तविक आर्ट है। मनुष्य को हर परिस्थिति में समान भाव रखना चाहिए, क्योंकि जीवन में आने वाले सुख-दुःख हमारे कर्मों के परिणाम होते हैं।
उन्होंने भगवान महावीर के जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि परमात्मा में असीम शक्ति होने के बावजूद उन्हें अनेक उपसर्गों और कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने हर परिस्थिति को समभाव से स्वीकार किया। भगवान महावीर जानते थे कि यह सभी घटनाएं उनके पूर्व जन्मों के कर्मों के उदय का परिणाम हैं, इसलिए उन्होंने बिना किसी द्वेष या प्रतिक्रिया के उन्हें सहन किया।
शत्रु और मित्र को समान समझना ही सच्चा समभाव
साध्वीश्री ने धर्मसभा में जीवन के महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि मनुष्य के जीवन में वास्तविक शांति तभी आती है, जब वह हर परिस्थिति को समान भाव से स्वीकार करना सीखता है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति शत्रु और मित्र दोनों को समान दृष्टि से देखने की क्षमता विकसित कर लेता है, वही सच्चे अर्थों में आत्मिक उन्नति के मार्ग पर आगे बढ़ता है।
उन्होंने बताया कि जीवन में परिस्थितियां हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। कभी सुख आता है तो कभी दुख, लेकिन समभाव रखने वाला व्यक्ति इन दोनों स्थितियों में अपना धैर्य और संतुलन बनाए रखता है। वह बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित होने के बजाय अपने भीतर की शांति को महत्व देता है।
साध्वीश्री ने कहा कि “अति सर्वत्र वर्जते”, अर्थात जीवन में किसी भी वस्तु या व्यवहार की अति नहीं करनी चाहिए। संतुलित सोच, संयमित व्यवहार और मर्यादित इच्छाएं ही व्यक्ति को सफल और शांतिपूर्ण जीवन की ओर ले जाती हैं।
उन्होंने कहा कि अत्यधिक इच्छाएं, क्रोध, मोह और अहंकार मनुष्य की सोच को कमजोर कर देते हैं तथा उसे आत्मिक विकास के मार्ग से दूर कर देते हैं। इसके विपरीत, क्षमा, विनम्रता, संतोष और संयम जैसे गुण व्यक्ति को महान बनाते हैं।
साध्वीश्री ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे जीवन में समता, सहनशीलता और सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं, जिससे आत्मिक शांति के साथ-साथ समाज में भी प्रेम और सद्भाव का वातावरण स्थापित हो सके।
सहनशीलता से ही बनता है व्यक्तित्व महान
प्रवचन के दौरान साध्वीश्री ने प्रेरक उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार पत्थर जब चीनी हथौड़ी की चोट को सहन करता है, तभी वह सुंदर प्रतिमा का रूप लेता है और पूजनीय बनता है, उसी प्रकार जीवन की कठिनाइयों को धैर्य और सहनशीलता के साथ स्वीकार करने वाला व्यक्ति ही महान बनता है।
उन्होंने कहा कि जैसे अग्नि की तपन को सहन करने के बाद ही सोना निखरकर कुंदन बनता है, वैसे ही संघर्षों और परीक्षाओं को सहन करने से व्यक्ति का व्यक्तित्व निखरता है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि जीवन में धैर्य, क्षमा, विनम्रता और समता जैसे गुणों को अपनाकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ना चाहिए।
धार्मिक भक्ति एवं प्रभावना का लाभ बोथरा परिवार ने लिया
जैन समाज मीडिया प्रभारी सचिन भंडारी ने जानकारी देते हुए बताया कि गुरुवार के संपूर्ण दिवस की धार्मिक भक्ति एवं प्रभावना का लाभ रमेश चंद्र एवं मनोज कुमार बोथरा परिवार द्वारा लिया गया।
इस मंगलकारी अवसर पर बड़ी संख्या में सकल जैन श्री संघ के श्रद्धालु उपस्थित रहे और धर्मसभा का लाभ प्राप्त किया। मंदिर परिसर पूरे दिन भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक वातावरण से गूंजायमान रहा।
श्रद्धालुओं ने साध्वीश्री के प्रेरणादायी प्रवचनों को जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाला बताते हुए धर्म मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।
