डॉ. सुरेन्द्र मीणा की नज़्मों का संपूर्ण संकलन
1. दरकार बाकी है
एक मुकम्मल तलाश की आस
ज़िंदगी में आज भी कहीं बाकी है,
पगडंडियों पर चलने वाले
थके कदमों को
अब भी किसी ताज़ी आहट की दरकार बाकी है।
कई बार थककर, हारकर
बस बैठ ही गए थे हम,
मगर थमे कदमों को
फिर से जोश दिलाने की दरकार बाकी है।
ठहरा पानी कब तक
प्यास बुझाए जमाने की—
बहते जल को भी
अपने वजूद की खातिर
सतर्क और सचेत रहने की
दरकार बाकी है।
वक़्त के आईने में
खुद को खड़ा देखा तो समझ आया—
ज़िंदगी में हाँफने, ठहरने,
भागने और रुककर फिर
नई दौड़ लगाने की
दरकार बाकी है।
— डॉ. सुरेन्द्र मीणा
2. सुनो — किताबों की खुशबू, किस्से और ज़िंदगी
सुनो,
किताब के बीच दबा
वो मोरपंख याद है तुम्हें?
और हाँ,
वो विद्या का जालीदार हरा पत्ता भी।
सुनो,
याद है तुम्हें
किताब के पन्नों से आती
स्याही की वो भीनी-भीनी खुशबू?
किताब की किताबी बातें ही
अक्सर ज़िंदगी का फलसफा
आधा-पक्का, आधा-कच्चा
सीखा जाती थीं।
किताब के अंतिम पन्नों तक पहुँचकर
ऐसा लगता था—
बस यहीं विराम है,
इसके आगे शायद कुछ भी नहीं।
और सुनो,
याद है तुम्हें
पहले पन्ने के कोने पर
अपना नाम सुंदर-सा टांकना
और फिर देर तक
उसे निहारते रहना—
मानो वहीं से संसार शुरू हो रहा हो।
तुम्हारी किताब, मेरी किताब—
दोनों एक जैसी,
फिर भी अलग,
और हमसे भी कहीं जुदा।
किताबों के किस्से
मुझे भी याद हैं
ठीक तुम्हारी तरह।
और हाँ—
आज पूरी किताब
उतनी ही याद है,
जितनी तुम।
बदलते वक़्त के संग
किताबें हाथ में नहीं रहीं,
मगर ज़िंदगी—
उसे मैं अब भी पढ़ता हूँ
हर रोज़ एक पन्ना,
हर दिन एक नया अध्याय,
उपसंहार तक।
— डॉ. सुरेन्द्र मीणा
3. हे पथिक — अनंत यात्रा का गीत
हे पथिक,
चल— अविरल, अनंत, गतिमय।
हे पथिक,
बन प्रवाह,
जो बहता है कल-कल नभ-तल।
हे पथिक,
बन सखा—
वसुधा और सृष्टि के स्वरूप में
सबको दृष्टिगत कर।
हे पथिक,
नित कर शत-सृजन,
भर मन में नवचेतना
और आगे बढ़।
चल… चल… चल…
बस चल,
बन जा पथ की पगडंडी।
हे पथिक,
अपने जीवन का उत्थान कर,
मन का मंथन कर
और फिर गतिमय हो जा।
हे पथिक,
भर ले नयन में स्वप्न,
और दे जीवन को एक
अलौकिक उत्थान।
पथरीले रास्तों पर भी
निष्ठा और श्रम से
उपहार अवतरित ही होते हैं।
— डॉ. सुरेन्द्र मीणा
