आचार्य श्री सुबल सागर महाराज का ससंघ प्रवचन: दृष्टि और ज्ञान से मोक्ष की ओर मार्गदर्शन
ग्वालियर, 7 अक्टूबर 2025:
थाटीपुर स्थित दिगंबर गुलाबचंद की बगीची जैन मंदिर में आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ससंघ के सानिध्य में धर्मसभा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर आचार्य श्री ने जीवन में दृष्टि और ज्ञान के महत्व पर अपने प्रखर विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि यदि दृष्टि शुद्ध और अंतर्दृष्टि वाली हो तो हर व्यक्ति अपने जीवन में भगवान और अच्छाई को देख सकता है।
“सही दृष्टि से हर जगह दिखे भगवान”
आचार्य श्री सुबल सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा, “हर घट घट में राम है, हर घर घर में भगवान। ऐसा कोई घर नहीं जिसमें भगवान न हो। बस देखने वाले व्यक्ति की दृष्टि सही हो तो उसे भगवान दिखने लगेंगे।” उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि व्यक्ति की अंतर्दृष्टि शुद्ध है, तो वह जीवन में अच्छाई और पुण्य को पहचान सकता है। वहीं, यदि दृष्टि विकृत है, तो अच्छा भी बुरा प्रतीत होता है।
उन्होंने यह भी बताया कि दृष्टि ही वह शक्ति है जो सभी अनर्थों का जन्म देती है। इसी दृष्टि के माध्यम से व्यक्ति अपने जीवन में सुख और दुख, पुण्य और पाप का अनुभव करता है। इसलिए हमारी दृष्टि अंतर्दृष्टि और आत्मा के उत्थान की ओर होनी चाहिए।
संसारिक दृष्टि और जीवन में बदलाव
आचार्य श्री ने आगे कहा कि सांसारिक दृष्टि में स्वार्थ और लोभ शामिल होते हैं, जिसके कारण सभी बुराइयाँ उत्पन्न होती हैं। “हर बात में झूठ, मायाचारी और लोभ का ही आश्रय होता है। अतः भले ही आप सांसारिक कार्य करते हो, लेकिन दृष्टि यदि निर्मल और अंतर्दृष्टि वाली हो तो हर कार्य में सरलता, शुद्धता और शुभता दिखाई देगी।”
उन्होंने बताया कि शुद्ध दृष्टि से किए गए कार्य न केवल जीवन में सुख और सुविधा लाते हैं बल्कि गुणों में वृद्धि कर मोक्ष मार्ग को प्रशस्त करते हैं। आचार्य श्री ने स्पष्ट किया कि परिवार और समाज में अच्छे वातावरण की प्राप्ति, सुख और समृद्धि पूर्व जन्मों के पुण्य का फल है। यदि वर्तमान में इस पुण्य को बढ़ाया जाए तो भविष्य में भी जीवन में अनुकूलताएँ बनी रहेंगी।
धर्मसभा का शुभारंभ और कल्याण मंदिर विधान
प्रवचन से पहले धर्मसभा का शुभारंभ दीप प्रज्वलन कर रविन्द्र और सारिका सिंघई परिवार ने किया। इसके साथ ही पद प्रक्षालन का विधान आशा और जयकुमार सिंघई परिवार ने संपन्न किया। आचार्य श्री सुबल सागर महाराज के चरणों में श्रीफल अर्पित कर मंदिर अध्यक्ष जयकुमार जैन, नरेंद्र जैन, उर्मिला जैन, अनिल जैन, सुभाष जैन, वीरेंद्र बाबा, प्रमोद जैन और विकास जैन ने आशीर्वाद प्राप्त किया। संचालन उर्मिला जैन ने किया, जबकि प्रवक्ता सचिन जैन ने सभा का संचालन और जानकारी दी।
साथ ही जानकारी दी गई कि 8 अक्टूबर को सुबह 6 बजे ठाटीपुर दिगंबर जैन मंदिर में सरोज-संजय जैन परिवार की ओर से कल्याण मंदिर विधान किया जाएगा। आचार्य श्री का प्रवचन इसी दिन सुबह 8:30 बजे से जारी रहेगा।
ज्ञान का महत्व और आचरण में उतारना
आचार्य श्री ने कहा कि “ज्ञान प्राप्त करना सरल है, लेकिन उसे आचरण में लाना कठिन कार्य है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि केवल ज्ञान अर्जित करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उसे जीवन में उतारना आवश्यक है। यदि ज्ञान आचरण में झलकता है, तभी उसका मूल्य होता है।
उन्होंने बताया कि ज्ञान हमें सही दिशा दिखाता है और आचरण हमें उस दिशा में ले जाता है। ज्ञान और आचरण का संगम ही श्रेष्ठ जीवन का निर्माण करता है। “जिस ज्ञान से चित्त की शुद्धि होती है, वही यथार्थ ज्ञान है।”
ज्ञान, चारित्र और तप से आत्मा का शुद्धिकरण
आचार्य श्री ने धर्मसभा में विस्तार से बताया कि ज्ञान से मनुष्य पदार्थों को जानता है, दर्शन से उन पर श्रद्धा करता है, चारित्र से कर्मों के आगमन को रोका जाता है और तप से आत्मा शुद्ध होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि “ज्ञान और क्रिया के संयोग से ही फल की प्राप्ति होती है।”
साधुओं के संग और गुरुओं की सान्निध्य से जीवन के लक्ष्य को आगे बढ़ाया जा सकता है। यदि हम अपने जीवन में पूर्व पुण्य का सही उपयोग करें, दृष्टि को शुद्ध करें और आचरण को ज्ञान के अनुरूप बनाएं, तो जीवन में सुख, समृद्धि और मोक्ष के मार्ग प्रशस्त होंगे।
समापन
आचार्य श्री सुबल सागर महाराज का यह प्रवचन न केवल जैन समाज के लिए बल्कि समस्त मानवता के लिए जीवन में दृष्टि, ज्ञान और आचरण के महत्व को स्पष्ट करता है। उनका संदेश है कि यदि दृष्टि सही हो और ज्ञान को आचरण में उतारा जाए, तो व्यक्ति जीवन में हर परिस्थिति में भगवान और अच्छाई को पहचान सकता है।
संक्षेप में: जीवन में सच्ची दृष्टि, शुद्ध ज्ञान और श्रेष्ठ आचरण ही मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करते हैं।


