**आत्मनिर्भरता हमारी भारतीयता का सांस्कृतिक मूल्य है: डॉ. भरत शर्मा
“आत्मनिर्भर उत्सव मेला” का भव्य समापन—स्वदेशी, स्वावलंबन और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को दिया गया मजबूत संदेश**
इंदौर।
स्वदेशी और आत्मनिर्भर भारत की दिशा में जनजागरण को समर्पित “आत्मनिर्भर उत्सव मेला” का समापन रविवार को सांस्कृतिक गरिमा और राष्ट्रीय भावना से परिपूर्ण वातावरण में हुआ। यह आयोजन पंडित दीनदयाल अन्त्योदय योजना से प्रेरित होकर सामाजिक संस्था अर्हम सेवा संकल्प, संस्था प्रयास, मणिराम ज्वैलर्स, समाजसेवी अलका सैनी तथा इंदौर नगर निगम के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न किया गया। समापन अवसर पर संस्कृति मंत्रालय—भारत सरकार के सदस्य डॉ. भरत शर्मा का विशेष सम्मान किया गया।
संस्थान की निदेशिका मोनिका कर्णावत ने डॉ. शर्मा को स्मृति चिह्न भेंटकर उनका अभिनंदन किया। समारोह में बड़ी संख्या में शहर के बुद्धिजीवी, शिक्षाविद, सामाजिक कार्यकर्ता और स्वदेशी उत्पादों को प्रोत्साहित करने वाले नागरिक उपस्थित रहे।
भारतीय संस्कृति में आत्मनिर्भरता—सदियों पुराना मूल्य: डॉ. भरत शर्मा
समारोह को संबोधित करते हुए डॉ. भरत शर्मा ने कहा कि “आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नीति नहीं, बल्कि भारतीय जीवन शैली और भारतीयता का सांस्कृतिक मूल्य है।” उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की सभ्यता हमेशा से स्वावलंबन, कौशल, नैतिक जिम्मेदारी और स्वधर्म पालन पर आधारित रही है।
उन्होंने कहा—
“भगवद्गीता में बताया गया ‘स्वधर्मे निष्ठा’ हमारी आत्मनिर्भरता का मूल तत्व है। अपने धर्म, कर्म, तप और क्षमता से प्राप्त होने वाला स्वावलंबन ही हमें विकास के पथ पर अग्रसर करता है।”
डॉ. शर्मा के अनुसार, भारत की पारंपरिक जीवनशैली में अपने कार्य के प्रति नैतिक जिम्मेदारी, श्रम का सम्मान, स्थानीय संसाधनों का उपयोग और समाज के प्रति योगदान हमेशा से प्रमुख रहे हैं। यही कारण है कि स्वदेशी भावना भारत की सांस्कृतिक पहचान का केंद्र बिंदु रही है।
स्वदेशी: भारत के विकास का आधार
उन्होंने आगे कहा कि आज विश्व भारतीय मूल्य-व्यवस्था को नई दृष्टि से देख रहा है।
भारत अपने कौशल, योग्यता, आध्यात्मिक दृष्टि, समरस समाज मॉडल और स्वावलंबन के सिद्धांतों से दुनिया को दिशा देने की क्षमता रखता है।
डॉ. शर्मा ने कहा—
“स्वदेशी के प्रति हमारी आसक्ति ही भारत की आर्थिक मजबूती की जड़ है। जब हम अपने स्थानीय उत्पादों, कला, कौशल और कारीगरों को समर्थन देते हैं, तभी वास्तविक आत्मनिर्भर भारत का निर्माण होता है।”
उन्होंने ‘वोकल फॉर लोकल’ को केवल नारा नहीं, बल्कि आवश्यक राष्ट्रीय नीति बताते हुए कहा कि हर भारतीय को स्थानीय उद्यम और हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के लिए आगे आना होगा।
आत्मनिर्भर उत्सव मेला: स्वदेशी उद्यमों के लिए प्रेरणादायी मंच
आयोजन समिति ने बताया कि तीन दिन तक चले मेले में सैकड़ों युवा उद्यमियों, महिला स्व-सहायता समूहों, हस्तशिल्पकारों, ग्रामीण कारीगरों, स्टार्टअप्स और स्वदेशी उद्योगों ने अपनी प्रतिभा और उत्पाद प्रदर्शित किए।
मेले का उद्देश्य—
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स्थानीय उद्यम को प्रोत्साहन देना
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महिला स्वावलंबन और उद्यमिता को बढ़ावा
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स्वदेशी उत्पादों के प्रति जनजागरण
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भारतीय कौशल, कला और संस्कृति का प्रचार-प्रसार
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आत्मनिर्भर भारत अभियान को जन-जन तक पहुँचाना
आयोजकों ने बताया कि मेले में आए लोगों ने बड़ी मात्रा में स्वदेशी उत्पाद खरीदे, जिससे कई नए उद्यमियों को आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा मिली।
भारतीय संस्कृति में स्वावलंबन का महत्व
अपने संबोधन में डॉ. शर्मा ने भारतीय इतिहास और परंपराओं का उल्लेख करते हुए कहा कि—
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भारत के आश्रम, गुरुकुल और कृषक समाज स्वावलंबन आधारित थे।
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घर-परिवार और समाज में “अपना कार्य स्वयं करना” एक संस्कार के रूप में सिखाया जाता था।
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भारतीय दर्शन में आर्थिक स्वतंत्रता को आध्यात्मिक स्वतंत्रता का आधार माना गया है।
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“अन्त्योदय”—सामाजिक जीवन के अंतिम व्यक्ति तक सुविधाओं की पहुँच—भारत की सांस्कृतिक और राजनीतिक सोच का मूल है।
उन्होंने कहा कि आज का आत्मनिर्भर भारत अभियान इन्हीं मूल्यों की पुनर्स्थापना है।
गौरवशाली उपस्थिति
समापन समारोह में शहर के अनेक गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे, जिनमें मुख्य रूप से—
राकेश खंडेलवाल, सुनील पटेल, गौरव पटेल, मुकेश श्रीवास्तव, वीरेंद्र पौराणिक, तथा शिक्षाविद राजीव झालानी शामिल थे।
सभी अतिथियों ने आयोजकों के प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि ऐसे मेले समाज में स्वदेशी चेतना, रोजगार सृजन, स्थानीय उत्पादों को बढ़ावा, और आर्थिक स्वावलंबन के मजबूत आधार तैयार करते हैं।
