Supreme Court के स्टे के बाद थम जाएगा विवाद? अरावली पहाड़ियों को लेकर नीलम अहलूवालिया का इंटरव्यू
Supreme Court ने अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा पर रोक लगा दी है। अब 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा। यह निर्णय पर्यावरणविद् और एक्टिविस्टों के बीच चर्चा का विषय बन गया है। वे इस फैसले का स्वागत तो कर रहे हैं, लेकिन साथ ही उनका कहना है कि अरावली के पूर्ण संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि इसे खनन और रियल एस्टेट गतिविधियों से गंभीर नुकसान हुआ है।
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के लिए चल रहे आंदोलनों में यह नया निर्णय एक महत्वपूर्ण मोड़ लाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस परिभाषा को मंजूरी दी थी, जिसमें केवल 100 मीटर या उससे ऊंची पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा माना गया था, जबकि कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां इससे बाहर हो जातीं। अब एक्सपर्ट कमिटी इस बात का निर्धारण करेगी कि अरावली के दायरे में क्या आता है और क्या नहीं।
नीलम अहलूवालिया का इस फैसले पर क्या कहना है?
पीपल फॉर अरावली की फाउंडर सदस्य और अरावली विरासत जन अभियान की सदस्य, नीलम अहलूवालिया ने इस मुद्दे पर अपनी राय दी। उन्होंने कहा, “हम Supreme Court के इस फैसले का स्वागत करते हैं, लेकिन इस बात को लेकर चिंता जताई जा रही है कि एक्सपर्ट कमिटी तय करेगी कि अरावली का हिस्सा क्या है और क्या नहीं। हमें लगता है कि अरावली को परिभाषित करने की आवश्यकता नहीं है, बल्कि इसके पूर्ण संरक्षण की आवश्यकता है, क्योंकि यह पहले ही खनन और रियल एस्टेट के कारण बुरी तरह प्रभावित हो चुका है।”
क्या स्टे के बाद विवाद थम जाएगा?
नीलम अहलूवालिया ने कहा, “जब तक अरावली को पूरी तरह से संरक्षण नहीं मिलता, तब तक यह विवाद जारी रहेगा। अरावली को लेकर लंबे समय से प्रदर्शन हो रहे हैं। अवैध खनन और अन्य मुद्दों के खिलाफ लोगों ने आवाज उठाई है, और यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक अरावली को सही तरीके से संरक्षित नहीं किया जाता।”

नई परिभाषा पर विवाद
20 नवंबर को Supreme Court ने दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात में अरावली पर्वतमाला की नई परिभाषा को मंजूरी दी थी। इसके तहत 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियों को अरावली का हिस्सा नहीं माना जाएगा। यह फैसला उन क्षेत्रों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां अरावली की कम ऊंचाई वाली पहाड़ियां फैली हुई हैं।
नई परिभाषा के तहत, 100 मीटर से कम ऊंची पहाड़ियां कानूनी संरक्षण के दायरे से बाहर हो जाएंगी, जिससे इन क्षेत्रों में खनन और रियल एस्टेट गतिविधियां और आसान हो जाएंगी।
इसका क्या असर पड़ेगा?
नई परिभाषा का सबसे ज्यादा असर हरियाणा, राजस्थान और गुजरात पर पड़ेगा। हरियाणा में अरावली के कम ऊंचाई वाले क्षेत्र बड़े पैमाने पर हैं, और यहां के जंगल भी इन्हीं पहाड़ियों के आसपास स्थित हैं। हरियाणा का फॉरेस्ट कवर देश में सबसे कम है, जो केवल 3.6% है। नई परिभाषा से इस राज्य में स्थित अरावली के जंगलों पर और खतरा बढ़ सकता है, क्योंकि इन इलाकों में खनन और रियल एस्टेट कंपनियों का कब्जा बढ़ सकता है।
राजस्थान और गुजरात में भी अरावली के कई इलाके अब खनन और अन्य विकास गतिविधियों के लिए खोल दिए जाएंगे, जो पहले संरक्षित क्षेत्र माने जाते थे। इससे इन राज्यों में अरावली की प्राकृतिक धारा और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान हो सकता है।
नतीजा
अरावली पर्वतमाला के संरक्षण को लेकर यह विवाद सुप्रीम कोर्ट के स्टे के बाद भी जारी रहेगा। पर्यावरणविदों का मानना है कि यह इलाका पूरी तरह से संरक्षित रहना चाहिए, ताकि इसकी पारिस्थितिकी तंत्र और प्राकृतिक धारा बनी रहे। साथ ही, खनन और रियल एस्टेट के कारण हो रहे नुकसान को रोकने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की आवश्यकता है।
Supreme Court के इस फैसले से जहां एक ओर कानून के दायरे में कुछ बदलाव आया है, वहीं अरावली के वास्तविक संरक्षण के लिए संघर्ष और भी तेज़ हो सकता है।
