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Supreme Court ने वकील को जमकर फटकारा: प्याज-लहसुन पर याचिका में जैन समुदाय को ठेस पहुँचाने की कोशिश

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Published On: 9 March 2026
Supreme Court

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9 मार्च 2026 को भारत के Supreme Court ने एक वकील को कड़ी फटकार लगाई, जिन्होंने जनहित याचिका (PIL) दाखिल कर यह मांग की कि सुप्रीम कोर्ट एक समिति बनाए जो यह जांचे कि प्याज और लहसुन वास्तव में तामसिक भोजन हैं या नहीं। यह याचिका जैन समुदाय की भावनाओं से जुड़ी थी, जो पारंपरिक रूप से प्याज, लहसुन और जड़ वाली सब्जियों का सेवन नहीं करते।

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची की बेंच ने इस याचिका को सुनते हुए वकील सचिन गुप्ता से सवाल किया कि वह जैन समुदाय की भावनाओं को ठेस क्यों पहुँचाना चाहते हैं। वकील ने बताया कि यह एक आम समस्या है और गुजरात में प्याज के सेवन को लेकर एक कपल का तलाक हुआ था। हालांकि, कोर्ट ने इसे पर्याप्त तर्क नहीं माना और कहा कि ऐसी याचिकाएं अदालतों पर अनावश्यक बोझ डालती हैं।

याचिका का विवरण

यह याचिका भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 के तहत दाखिल की गई थी, जो नागरिकों को अपने मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए सीधे सुप्रीम कोर्ट में जाने की अनुमति देता है। याचिका में कहा गया था कि एक समिति बनाकर प्याज और लहसुन में मौजूद संभावित नकारात्मक तत्वों की जांच की जाए और उन्हें तामसिक भोजन के रूप में वर्गीकृत किया जाए।

जैन समुदाय के अनुसार, प्याज, लहसुन और अन्य जड़ वाली सब्जियां तामसिक होती हैं और इनसे शरीर में नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न हो सकते हैं। वकील का तर्क था कि इससे समाज में जागरूकता बढ़ सकती है, लेकिन कोर्ट ने इसे सही आधार नहीं माना।

Supreme Court की प्रतिक्रिया

CJI सूर्यकांत ने कहा कि इस तरह की याचिकाएं समुदाय की भावनाओं को आहत कर सकती हैं और सामाजिक विवाद को बढ़ावा दे सकती हैं। बेंच ने वकील को चेतावनी दी कि यदि भविष्य में इस तरह की याचिका दाखिल की गई, तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। कोर्ट ने यह भी कहा कि यदि याचिकाकर्ता वकील नहीं होते तो उनके खिलाफ उदाहरणात्मक जुर्माना लगाया जा सकता था।

वकील द्वारा दाखिल अन्य याचिकाएं

सचिन गुप्ता ने इसके अलावा तीन अन्य जनहित याचिकाएं भी दाखिल की थीं, जिन्हें कोर्ट ने खारिज कर दिया:

  1. शराब और तंबाकू में हानिकारक तत्वों को नियंत्रित करने की याचिका।
  2. संपत्ति के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य करने की याचिका।
  3. शास्त्रीय भाषाओं को आधिकारिक मान्यता देने संबंधी याचिका।

सुप्रीम कोर्ट ने सभी याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा कि इस तरह की याचिकाएं अदालतों पर बोझ डालती हैं और जनता के वास्तविक हित के लिए नहीं होतीं।

कानूनी और सामाजिक महत्व

यह मामला दर्शाता है कि न्यायपालिका को सामाजिक संवेदनाओं और कानून की मर्यादाओं के बीच संतुलन बनाए रखना होता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि PIL का उद्देश्य केवल सामाजिक हित और मौलिक अधिकारों की रक्षा होना चाहिए, न कि व्यक्तिगत, तुच्छ या विवादास्पद मामलों को बढ़ावा देना।

साथ ही, जैन समुदाय की पारंपरिक आहार संबंधी आदतों का सम्मान करना जरूरी है। किसी भी समुदाय की धार्मिक या सांस्कृतिक प्रथाओं को बिना ठोस कानूनी आधार के चुनौती देना अदालत में स्वीकार्य नहीं है।

frivolous PILs पर न्यायपालिका का रुख

सुप्रीम कोर्ट कई बार जोर देकर कह चुकी है कि PIL का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि PIL केवल वास्तविक सार्वजनिक हित के मामलों में दाखिल किया जाना चाहिए और इसे व्यक्तिगत या सनसनीखेज दावों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

यदि कोई वकील या नागरिक इस प्रावधान का दुरुपयोग करता है, तो अदालत उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई और जुर्माना लगा सकती है। यह नीति न्यायपालिका द्वारा frivolous और असंगत याचिकाओं को रोकने का एक प्रयास है।

मुख्य निष्कर्ष

  • सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी: वकीलों को PIL दाखिल करने में सतर्क रहने की आवश्यकता है।
  • अनुच्छेद 32 का उपयोग: PIL एक शक्तिशाली साधन है, लेकिन इसे केवल मौलिक अधिकारों की रक्षा और सामाजिक हित के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
  • सांस्कृतिक आदतों का सम्मान: जैन समुदाय की आहार संबंधी प्रथाओं को मान्यता प्राप्त है और इसे चुनौती देना उचित नहीं।
  • न्यायिक विवेक: अदालत ऐसे मामलों को खारिज करती है जो न्यायिक समय और संसाधनों का दुरुपयोग करती हैं।
  • वकीलों की जवाबदेही: PIL का दुरुपयोग करने वाले वकीलों को सख्त चेतावनी या जुर्माना लगाया जा सकता है।

निष्कर्ष

Supreme Court की कार्रवाई स्पष्ट करती है कि जनहित याचिकाओं का दुरुपयोग स्वीकार्य नहीं है। न्यायपालिका ने वकीलों और नागरिकों को चेतावनी दी कि PIL का उद्देश्य केवल समाज और कानून के हित में होना चाहिए।

यह मामला यह भी रेखांकित करता है कि सामाजिक और धार्मिक भावनाओं का सम्मान करना जरूरी है और वकीलों को ऐसे विवादास्पद मामलों में अदालत का समय व्यर्थ नहीं करना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का कड़ा रुख दर्शाता है कि frivolous PILs अदालतों के संसाधनों पर बोझ डालती हैं और इन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए।

 

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

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