मध्यप्रदेश के सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लगे सोलर प्लांट, कम दर पर मिलेगी बिजली
RESCO मॉडल के तहत 377 किलोवाट क्षमता के संयंत्र लगाने की तैयारी; पुराने बिजली बिलों का भुगतान करना होगा अनिवार्य
भोपाल। मध्यप्रदेश के शासकीय महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को बिजली पर होने वाले खर्च से राहत दिलाने के लिए उनके भवनों पर सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए जाएंगे। प्रधानमंत्री सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के अंतर्गत नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग ने उच्च शिक्षा विभाग को आवश्यक दिशा-निर्देश जारी किए हैं। योजना के लागू होने से संबंधित शैक्षणिक संस्थानों को प्रचलित बिजली दरों की तुलना में कम कीमत पर बिजली उपलब्ध होने की उम्मीद है।
सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सोलर प्लांट स्थापित करने का काम RESCO मॉडल के तहत किया जाएगा। इस व्यवस्था की विशेष बात यह है कि संबंधित संस्थान को सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए शुरुआत में कोई बड़ा निवेश नहीं करना होगा। चयनित कंपनी अपने खर्च पर संयंत्र स्थापित करेगी और उससे उत्पन्न बिजली संबंधित संस्थान को निर्धारित दर पर उपलब्ध कराएगी।
हालांकि योजना का लाभ लेने के लिए महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों को पहले अपने पुराने बकाया बिजली बिलों का पूर्ण भुगतान करना होगा। बकाया राशि का निराकरण होने के बाद ही सोलर प्लांट लगाने की आगे की प्रक्रिया शुरू की जाएगी।
377 किलोवाट क्षमता के सोलर प्लांट लगाने की योजना
प्राप्त जानकारी के अनुसार, प्रारंभिक चरण में चयनित उच्च शिक्षण संस्थानों में कुल 377 किलोवाट क्षमता के सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किए जाने की योजना है। इन संयंत्रों को संबंधित भवनों की छत पर उपलब्ध स्थान और बिजली की आवश्यकता के आधार पर लगाया जाएगा।
सोलर प्लांट स्थापित करने से पहले तकनीकी दल द्वारा भवन का निरीक्षण किया जाएगा। इसमें छत की मजबूती, उपलब्ध क्षेत्रफल, सूर्य की रोशनी, बिजली की वर्तमान खपत, कनेक्शन की स्थिति तथा सुरक्षा संबंधी मानकों का परीक्षण किया जाएगा।
तकनीकी सर्वे के बाद यह तय होगा कि किस कॉलेज अथवा विश्वविद्यालय में कितनी क्षमता का संयंत्र लगाया जा सकता है। संस्थानों को भवन और बिजली कनेक्शन से संबंधित आवश्यक दस्तावेज भी उपलब्ध कराने होंगे।
RESCO मॉडल में संस्थानों को नहीं करना होगा प्रारंभिक निवेश
RESCO का अर्थ Renewable Energy Service Company है। इस मॉडल में सौर ऊर्जा कंपनी संयंत्र लगाने, उसके संचालन और रखरखाव की जिम्मेदारी संभालती है। इसके बदले संबंधित संस्था प्लांट से उत्पादित बिजली का भुगतान पहले से निर्धारित दर के अनुसार करती है।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों को सोलर पैनल खरीदने, लगाने तथा उनके रखरखाव के लिए एकमुश्त राशि खर्च नहीं करनी पड़ती। प्लांट स्थापित करने वाली एजेंसी ही परियोजना पर निवेश करती है।
संस्थान को जितनी सौर बिजली उपलब्ध होती है, उसका भुगतान अनुबंध में तय दर पर किया जाता है। यदि सौर ऊर्जा की दर बिजली वितरण कंपनी की प्रचलित दर से कम रहती है तो संबंधित शैक्षणिक संस्थान को प्रतिमाह बिजली बिल में आर्थिक बचत होगी।
बकाया बिजली बिल चुकाना होगा जरूरी
योजना के दिशा-निर्देशों में यह स्पष्ट किया गया है कि जिन कॉलेजों अथवा विश्वविद्यालयों पर पुराने बिजली बिल बकाया हैं, उन्हें पहले पूरी राशि का भुगतान करना होगा। बकाया राशि होने की स्थिति में संबंधित परिसर में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने की कार्रवाई आगे नहीं बढ़ेगी।
इस शर्त के कारण उच्च शिक्षा विभाग को सभी पात्र संस्थानों से उनके बिजली कनेक्शन और भुगतान की स्थिति की जानकारी जुटानी होगी। कॉलेजों से वर्तमान बिल, पुराने बकाया और बिजली की औसत खपत से संबंधित विवरण मांगा जा सकता है।
जिन संस्थानों के बिल नियमित रूप से जमा हैं, वहां तकनीकी सर्वे और संयंत्र स्थापना की प्रक्रिया अपेक्षाकृत जल्दी प्रारंभ हो सकेगी। बकायादार संस्थानों को योजना में शामिल होने के लिए पहले बिजली वितरण कंपनी के साथ अपना हिसाब पूरा करना होगा।
बिजली बिल में हो सकती है बड़ी बचत
शासकीय महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों में कक्षाओं, प्रयोगशालाओं, पुस्तकालयों, कार्यालयों, छात्रावासों, कंप्यूटर लैब, पंखों, लाइट और अन्य उपकरणों के संचालन में बड़ी मात्रा में बिजली का उपयोग होता है। इसके कारण कई संस्थानों का मासिक बिजली बिल काफी अधिक आता है।
रूफटॉप सोलर प्लांट स्थापित होने के बाद दिन के समय संस्थान की बिजली आवश्यकता का एक हिस्सा सौर ऊर्जा से पूरा किया जा सकेगा। कॉलेजों में अधिकांश शैक्षणिक और प्रशासनिक गतिविधियां दिन के समय संचालित होती हैं, इसलिए सौर ऊर्जा का उपयोग उनके लिए विशेष रूप से लाभकारी हो सकता है।
सोलर प्लांट से उत्पन्न बिजली का स्थानीय स्तर पर उपयोग होने के कारण पारंपरिक स्रोत से ली जाने वाली बिजली की मात्रा कम होगी। इससे संस्थानों का नियमित बिजली खर्च घटेगा और बची हुई राशि का उपयोग शैक्षणिक सुविधाओं को बेहतर बनाने में किया जा सकेगा।
पर्यावरण संरक्षण में भी मिलेगी मदद
सौर ऊर्जा को स्वच्छ और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोत माना जाता है। इसके उपयोग से कोयला आधारित बिजली पर निर्भरता कम करने और कार्बन उत्सर्जन घटाने में सहायता मिलती है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सोलर प्लांट स्थापित होने से विद्यार्थियों के बीच पर्यावरण संरक्षण और हरित ऊर्जा के प्रति जागरूकता भी बढ़ेगी।
शैक्षणिक संस्थान इन संयंत्रों का उपयोग विद्यार्थियों को सौर ऊर्जा उत्पादन की व्यावहारिक जानकारी देने के लिए भी कर सकते हैं। विज्ञान, इंजीनियरिंग और पर्यावरण अध्ययन से जुड़े विद्यार्थियों के लिए परिसर में स्थापित सोलर प्लांट अध्ययन का उपयोगी माध्यम बन सकता है।
केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने प्रधानमंत्री सूर्य घर योजना के तहत सरकारी भवनों पर रूफटॉप सोलर स्थापित करने के लिए परिचालन दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनमें RESCO और अन्य कार्यान्वयन मॉडलों के माध्यम से सरकारी भवनों के सौरकरण का प्रावधान किया गया है।
संस्थानों को उपलब्ध करानी होगी जरूरी जानकारी
योजना को लागू करने के लिए उच्च शिक्षा विभाग संबंधित कॉलेजों और विश्वविद्यालयों से बिजली खपत, कनेक्शन संख्या, स्वीकृत विद्युत भार, भवन की छत के क्षेत्रफल और बकाया बिलों का विवरण प्राप्त कर सकता है।
इसके बाद पात्र संस्थानों की सूची तैयार कर नवीन एवं नवकरणीय ऊर्जा विभाग अथवा संबंधित कार्यान्वयन एजेंसी को भेजी जाएगी। तकनीकी रूप से उपयुक्त पाए जाने वाले परिसरों में सोलर प्लांट स्थापित करने की प्रक्रिया शुरू होगी।
संयंत्र लगने के बाद उसके उत्पादन की निगरानी भी की जाएगी। प्लांट से प्रतिदिन और प्रतिमाह कितनी बिजली उत्पन्न हुई तथा संस्थान को कितनी बचत मिली, इसका रिकॉर्ड रखा जा सकेगा।
सरकारी भवनों को ऊर्जा आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में कदम
मध्यप्रदेश के सरकारी कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सौर ऊर्जा संयंत्र लगाने की योजना को ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे एक ओर संस्थानों को कम दर पर बिजली मिलने की संभावना है, वहीं दूसरी ओर स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग को भी बढ़ावा मिलेगा।
योजना की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि संस्थान अपने पुराने बिजली बिलों का समय पर भुगतान करें और आवश्यक तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराएं। बकाया बिलों का निराकरण तथा सर्वे पूरा होने के बाद ही चयनित परिसरों में सोलर प्लांट लगाने का वास्तविक काम शुरू हो सकेगा।
