बुजुर्ग दंपत्ति को 3 महीने से नहीं मिली सामाजिक सुरक्षा पेंशन, साईं खेड़ा में व्यवस्था पर सवाल
Silwani (रायसेन), संवाददाता वैभव जैन मस्ताना।
रायसेन जिले की सिलवानी तहसील के ग्राम साईं खेड़ा में सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना को लेकर गंभीर स्थिति सामने आई है। पिछले तीन महीनों से बुजुर्ग दंपत्ति को पेंशन नहीं मिलने के कारण उनका जीवन बेहद कठिन हो गया है। यह समस्या केवल एक गांव तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र में कई बुजुर्ग और जरूरतमंद लोग इसी तरह की परेशानी का सामना कर रहे हैं।
पेंशन नहीं मिलने से बढ़ी मुश्किलें
गांव के बुजुर्ग कन्हैया लाल और उनकी पत्नी पिछले कई महीनों से अपनी पेंशन के इंतजार में हैं। यह पेंशन ही उनके जीवन का एकमात्र सहारा है, क्योंकि उनके पास कोई स्थायी आय का साधन नहीं है। कन्हैया लाल बताते हैं कि वे कई बार पंचायत कार्यालय और संबंधित विभागों के चक्कर लगा चुके हैं, लेकिन हर बार उन्हें सिर्फ आश्वासन ही मिला है।
तीन महीने से पेंशन न मिलने के कारण उनके घर की आर्थिक स्थिति और भी खराब हो गई है। दवाइयों, भोजन और दैनिक जरूरतों के लिए भी उन्हें कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
गांव-गांव में फैली समस्या
सिर्फ साईं खेड़ा ही नहीं, बल्कि सिलवानी तहसील के कई गांवों में सामाजिक सुरक्षा पेंशन समय पर नहीं पहुंच रही है। ग्रामीणों का कहना है कि यह एक सामान्य समस्या बन चुकी है, जिससे बुजुर्ग, विधवा महिलाएं और दिव्यांग सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
ग्रामीणों के अनुसार कई बार तो पेंशन दो-दो या तीन-तीन महीने लेट आती है, जिससे उनकी पूरी आर्थिक व्यवस्था बिगड़ जाती है।
डिजिटल व्यवस्था पर सवाल
सरकार द्वारा लागू की गई डिजिटल पेंशन व्यवस्था पर भी ग्रामीणों ने सवाल उठाए हैं। कन्हैया लाल का कहना है कि पहले की पंचायती व्यवस्था में पेंशन समय पर घर तक पहुंच जाती थी और लोगों को इतनी परेशानी नहीं होती थी।
अब बायोमेट्रिक सिस्टम और डिजिटल प्रक्रिया के कारण बुजुर्गों को बार-बार पंचायत या बैंक के चक्कर लगाने पड़ते हैं। कई बार अंगूठा मशीन में मैच नहीं होता, जिससे उनका भुगतान अटक जाता है।
तकनीकी समस्याओं से बढ़ रही परेशानी
ग्रामीणों का कहना है कि बायोमेट्रिक सत्यापन प्रणाली कई बार काम नहीं करती, खासकर बुजुर्गों के लिए यह बड़ी समस्या बन चुकी है। उम्र बढ़ने के कारण अंगूठे के निशान स्पष्ट नहीं रहते, जिससे मशीन उन्हें पहचान नहीं पाती।
इसके अलावा नेटवर्क समस्या और सर्वर डाउन होने जैसी दिक्कतें भी समय-समय पर सामने आती हैं, जिससे भुगतान प्रक्रिया और भी धीमी हो जाती है।

आर्थिक संकट में बुजुर्ग परिवार
कन्हैया लाल और उनकी पत्नी जैसे कई बुजुर्ग परिवार पूरी तरह पेंशन पर निर्भर हैं। उनके पास न तो खेती का कोई बड़ा साधन है और न ही कोई अन्य आय का स्रोत। उम्र अधिक होने के कारण वे मजदूरी या अन्य काम भी नहीं कर सकते।
पेंशन न मिलने से उन्हें भोजन, दवाइयों और अन्य जरूरी खर्चों के लिए भी संघर्ष करना पड़ रहा है। कई बार उन्हें दूसरों से मदद मांगनी पड़ती है।
ग्रामीणों में बढ़ रही नाराजगी
गांव के अन्य लोगों ने भी इस व्यवस्था पर नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि सरकार डिजिटल इंडिया और पारदर्शिता का दावा करती है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके बिल्कुल उलट है।
ग्रामीणों का आरोप है कि योजनाओं का लाभ समय पर नहीं मिल पाता, जिससे गरीब और कमजोर वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होता है।
पहले की व्यवस्था को याद कर रहे लोग
ग्रामीणों का कहना है कि पहले की व्यवस्था भले ही तकनीकी रूप से कमजोर थी, लेकिन उसमें समय पर काम होता था। लोग बिना ज्यादा परेशानी के पेंशन प्राप्त कर लेते थे।
अब डिजिटल प्रक्रिया ने व्यवस्था को जटिल बना दिया है, जिससे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोग सबसे ज्यादा परेशान हो रहे हैं।
प्रशासन से सुधार की मांग
ग्रामीणों और बुजुर्गों ने शासन और प्रशासन से मांग की है कि पेंशन वितरण व्यवस्था को सरल और प्रभावी बनाया जाए। साथ ही बायोमेट्रिक और डिजिटल समस्याओं का स्थायी समाधान किया जाए।
लोगों ने यह भी सुझाव दिया है कि बुजुर्गों के लिए विशेष व्यवस्था बनाई जाए, जिसमें उन्हें बार-बार कार्यालयों के चक्कर न लगाने पड़ें।
सामाजिक सुरक्षा योजना का महत्व
सामाजिक सुरक्षा पेंशन योजना देश के लाखों बुजुर्गों, विधवाओं और दिव्यांगों के लिए जीवन का सहारा है। यह योजना उन्हें आर्थिक सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।
लेकिन जमीनी स्तर पर आने वाली समस्याएं इस योजना की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती हैं।
विशेषज्ञों की राय
सामाजिक विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सिस्टम को पूरी तरह हटाने की नहीं, बल्कि उसे और अधिक सरल बनाने की आवश्यकता है। तकनीक तभी सफल होती है जब वह लोगों के लिए आसान हो, न कि जटिल।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों में तकनीकी जागरूकता और आधारभूत ढांचे को मजबूत करना जरूरी है।
समाधान की आवश्यकता
इस समस्या का समाधान तभी संभव है जब सरकार, प्रशासन और तकनीकी एजेंसियां मिलकर काम करें। पेंशन वितरण प्रणाली को अधिक पारदर्शी और सरल बनाने के साथ-साथ वैकल्पिक व्यवस्था भी विकसित करनी होगी।
बुजुर्गों के लिए विशेष हेल्पलाइन और फील्ड सहायता केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं, जिससे उन्हें बार-बार चक्कर न लगाने पड़ें।
निष्कर्ष
साईं खेड़ा गांव की यह स्थिति ग्रामीण भारत की एक बड़ी सच्चाई को उजागर करती है। जहां एक ओर सरकार विकास और डिजिटल व्यवस्था की बात कर रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं।
बुजुर्ग कन्हैया लाल जैसे लोग केवल इतना चाहते हैं कि उन्हें समय पर उनकी पेंशन मिल जाए, ताकि वे सम्मान और शांति के साथ अपना जीवन व्यतीत कर सकें।
यह मामला स्पष्ट करता है कि योजनाओं की सफलता केवल कागजों पर नहीं, बल्कि उनके वास्तविक क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।
