श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर ने परम पूज्य निर्यापक मुनि श्री सुधासागर महाराज के आशीर्वाद एवं डॉ. शीतलचंद्र जैन के निर्देशन में हजारों विद्वानों, साधकों और संस्कारवान युवाओं का निर्माण किया। जानिए संस्थान की 30 वर्षों की प्रेरक यात्रा, उपलब्धियां और योगदान।
श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर: एक संकल्प जिसने हजारों विद्वानों से रचा स्वर्णिम इतिहास, सुधासागर महाराज के आशीर्वाद से निरंतर उन्नति की ओर अग्रसर
मुरैना/द्रोणगिरी | मनोज जैन नायक
कुछ संस्थाएँ केवल भवनों से नहीं बनतीं, बल्कि विचारों, संस्कारों और समर्पण से इतिहास रचती हैं। श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर आज ऐसा ही एक प्रतिष्ठित नाम है, जिसने जैन श्रमण संस्कृति के संरक्षण, संवर्धन और प्रचार-प्रसार में अद्वितीय योगदान दिया है। यह संस्थान केवल शिक्षा का केंद्र नहीं बल्कि संस्कार, संयम और साधना का जीवंत विश्वविद्यालय बन चुका है।
श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर की स्थापना
श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर की स्थापना 1 सितंबर 1996 को परम पूज्य निर्यापक मुनि श्री सुधासागर जी महाराज के पावन आशीर्वाद तथा डॉ. शीतलचंद्र जैन के दूरदर्शी निर्देशन में की गई। एक छोटे से संकल्प के रूप में प्रारंभ हुई यह संस्था आज विशाल वटवृक्ष का स्वरूप धारण कर चुकी है, जिसकी ख्याति भारत ही नहीं बल्कि विश्वभर में फैल चुकी है।आज शायद ही कोई जैन परिवार ऐसा हो जिसने इस संस्थान का नाम न सुना हो।
हजारों विद्वानों का निर्माण बना सबसे बड़ी उपलब्धि
श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर की सबसे बड़ी पहचान इसके भव्य भवन नहीं बल्कि यहां से तैयार हुए हजारों विद्वान हैं।संस्थान में वर्तमान में लगभग 200 विद्यार्थी निवास कर शास्त्री की तैयारी कर रहे हैं, जबकि अब तक 1000 से अधिक विद्यार्थी शास्त्री बन चुके हैं।इनमें से 600 से अधिक विद्वान विभिन्न सरकारी सेवाओं में कार्यरत होकर समाज और राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं।
देशभर में आयोजित धर्मसभाओं, पाठशालाओं और प्रवचनों में संस्थान के विद्वान आज जैन दर्शन का प्रकाश फैला रहे हैं।
शिक्षा के साथ संयम और साधना की प्रेरणा
श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर केवल शिक्षा तक सीमित नहीं है बल्कि विद्यार्थियों के जीवन में संयम, संस्कार और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।संस्थान से शिक्षित अनेक विद्यार्थी आज साधु जीवन अपना चुके हैं।वर्तमान में संस्थान से जुड़े—
- 3 से अधिक दिगंबर मुनिराज
- 7 से अधिक ऐलक
- 10 से अधिक ब्रह्मचारी
धर्म साधना में निरंतर रत हैं। आने वाले समय में अनेक साधक दीक्षा लेकर श्रमण परंपरा को और अधिक समृद्ध करेंगे।
30,000 से अधिक विद्यार्थी घर बैठे कर रहे अध्ययन
समय के साथ तकनीक बदली लेकिन श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर का उद्देश्य नहीं बदला।आज संस्थान की द्वादशवर्षीय अध्ययन योजना के माध्यम से 30,000 से अधिक विद्यार्थी देश-विदेश में घर बैठे अध्ययन कर रहे हैं।यह संस्थान की आधुनिक सोच और व्यापक पहुंच का प्रमाण है।
हजारों मंदिरों और पाठशालाओं में सेवा
संस्थान का कार्य केवल परिसर तक सीमित नहीं है।मुख्य उपलब्धियां—
- हजारों जैन पाठशालाओं का संचालन
- 2000 से अधिक मंदिरों में धार्मिक शिविर
- 1200 से अधिक मंदिरों में दशलक्षण महापर्व के दौरान विद्वानों की व्यवस्था
इन प्रयासों ने जैन संस्कृति को नई ऊर्जा प्रदान की है।
संत सुधासागर बालिका छात्रावास बना संस्कारों की पाठशाला
श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर की एक विशेष उपलब्धि संत सुधासागर बालिका छात्रावास है।यह केवल छात्रावास नहीं बल्कि संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण का केंद्र है।यहां वर्तमान में लगभग 200 बालिकाएं अध्ययनरत हैं, जो शिक्षा के साथ धार्मिक एवं सांस्कृतिक संस्कार भी प्राप्त कर रही हैं।यहीं से निकली अनेक बालिकाएं आज विदुषी, प्रभावशाली वक्ता और समाज की प्रेरणा बन चुकी हैं।
विरोध के बीच भी बढ़ता गया संस्थान
हर महान कार्य की तरह श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर को भी प्रारंभिक दौर में विरोध का सामना करना पड़ा।लेकिन समर्पण, सत्य और तप की शक्ति के आगे सभी बाधाएं छोटी साबित हुईं।आज यही संस्था भारत सहित विश्वभर में जैन संस्कृति के प्रचार-प्रसार का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुकी है।
विश्वास, समर्पण और अनुशासन का जीवंत प्रतीक
आज श्रमण संस्कृति संस्थान सांगानेर केवल एक संस्था नहीं बल्कि विश्वास, अनुशासन, संस्कार और धर्मसेवा का पर्याय बन चुका है।इसने सिद्ध किया है कि यदि उद्देश्य समाजहित का हो, गुरु का आशीर्वाद मिले और नेतृत्व दूरदर्शी हो, तो एक छोटा सा बीज भी समय के साथ विशाल वटवृक्ष बन जाता है।
लेखक
भाव लेखक : अंशुल जैन शास्त्री, द्रोणागिरी
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