शांति और इंसानियत की तलाश: 7 मार्मिक सवाल, जो हर इंसान को सोचने पर मजबूर करेंगे
शांति और इंसानियत की तलाश शायद आज के समय की सबसे बड़ी जरूरत है। दुनिया विकास, तकनीक और आधुनिकता की ओर तेजी से बढ़ रही है, लेकिन इसके साथ मनुष्य के भीतर शांति, संवेदना और इंसानियत की तलाश भी उतनी ही जरूरी होती जा रही है। प्रस्तुत कविता इसी तलाश को बेहद सरल और मार्मिक शब्दों में सामने रखती है।
कविता में छिपा एक बड़ा सवाल
मनुष्य आखिर शांति को कहां खोजे? घर में, गलियों में, प्रकृति में, आसमान में या फिर अपने भीतर? यही सवाल इस कविता के माध्यम से पाठक के सामने आता है। कविता युद्ध, हथियार और विनाश के बीच इंसानियत की खोज करती है।
तलाश
जिसकी मुझे तलाश है,
कहाँ मिलेगी—नहीं पता।
कैसे पाना है उसको,
हे मन! अब तू ही बता।
क्या खोजूँ उसको घर में,
या इन सूनी गलियों में?
या फिर उसको खोजूँ मैं
इन पौधों की कलियों में?
क्या खोजूँ मैं सागर में,
या इन बहती नदियों में?
क्या आने वाले कल में खोजूँ,
या उन बीती सदियों में?
क्या इस नीले नभ में खोजूँ,
या चमकते तारों में?
क्या इस काली राख में खोजूँ,
या जलते अंगारों में?
क्या गोले-बारूद में खोजूँ,
या खोजूँ बंदूकों में?
क्या खोजूँ किसी ताले में,
या बंद पड़े संदूकों में?
कहीं दिखाई नहीं देती,
फिर भी तलाश जारी है।
न जाने किस ओर है वो,
न जाने किसकी बारी है।
जिसे मैं खोज रहा हूँ,
वह कोई वस्तु नहीं—
वह कोई सपना नहीं—
वह है शांति और इंसानियत।
अजय सिंह शेखावत (अनमोल)
इंदौर
कविता का संदेश
यह कविता हमें याद दिलाती है कि शांति और इंसानियत किसी बाजार, संदूक, हथियार या बाहरी दुनिया में मिलने वाली वस्तु नहीं है। यह मनुष्य के विचारों, व्यवहार और संवेदनाओं में मौजूद होती है। जब इंसान दूसरे इंसान के दर्द को समझता है, तभी सच्ची इंसानियत जन्म लेती है।
आज के दौर में युद्ध, हिंसा और आपसी संघर्ष के बीच यह कविता एक सकारात्मक संदेश देती है कि हमें शांति की तलाश बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर करनी चाहिए।
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लेखक: अजय सिंह शेखावत (अनमोल), इंदौर
