प्रभु की वास्तविक पूज्यता उनके वीतराग भाव में निहित है, न कि किसी बाहरी वैभव में:
विदिशा। श्री शीतल नाथ दिगंबर Jain बड़ा मंदिर किलेअंदर में आयोजित सात दिवसीय जिनदेशना बाल युवा संस्कार शिविर में तृतीय दिवस कई आयोजन व कक्षाओं का संचालन किया गया। प्रवक्ता शोभित जैन ने बताया कि 3 मई से 9 मई तक चल रहे इस शिविर में धर्म से युवा वर्ग को जोड़ने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है।
यह शिविर विशेष रूप से बच्चों और युवाओं में जैन धर्म के मूल सिद्धांतों, नैतिक मूल्यों और जीवन संस्कारों के विकास को ध्यान में रखकर आयोजित किया गया है, जिसमें प्रतिदिन विविध धार्मिक, शैक्षणिक और सांस्कृतिक गतिविधियां कराई जा रही हैं। आयोजन में बड़ी संख्या में बच्चे एवं उनके परिजन भाग ले रहे हैं।
धार्मिक अनुष्ठान और शिक्षण गतिविधियाँ
शिविर के तृतीय दिवस प्रातः काल श्रीजी का प्रक्षाल, अभिषेक एवं पूजन उपरांत बच्चों को जैन धर्म के मूल सिद्धांतों पर व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया गया। विशेष रूप से “पानी छान कर क्यों पीना चाहिए और कैसे छानना चाहिए” विषय पर बच्चों को प्रैक्टिकल के माध्यम से सिखाया गया।
इस दौरान यह समझाया गया कि पानी छानने के लिए प्रयुक्त छन्ने की मोटाई ऐसी होनी चाहिए जिससे रोशनी आर-पार न हो सके और सूक्ष्म जीवों को किसी प्रकार की हानि न पहुंचे। बच्चों ने इस प्रक्रिया को स्वयं करके समझा और धर्म के वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्ष को जाना।
शाम के सत्र में “धर्म के धुरंधर” जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन किया गया, जिसमें बच्चों और प्रतिभागियों ने अपने ज्ञान का प्रदर्शन किया तथा विभिन्न खेलों के माध्यम से आनंद भी लिया। यह कार्यक्रम प्रोजेक्टर और संगीत के माध्यम से अत्यंत रोचक और शिक्षाप्रद रूप में संपन्न हुआ।
आज रात्रि में “सम्यक कला का निरूपण” कार्यक्रम आयोजित किया जाएगा, जिसमें प्रतिभागी 1 मिनट में जैन तत्व अध्ययन से संबंधित अपनी कला प्रस्तुति देंगे। शिविर संचालकों ने सभी अभिभावकों से अपील की है कि वे अपने बच्चों को सहपरिवार शिविर में भेजें ताकि वे धार्मिक एवं नैतिक शिक्षा से लाभान्वित हो सकें।
अनुभव शास्त्री के प्रवचन
शिविर में करेली से आए अनुभव शास्त्री ने देवागम स्त्रोत के माध्यम से वीतरागता और सर्वज्ञता के गहन सिद्धांतों को समझाया। उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रभु की वास्तविक पूज्यता उनके वीतराग भाव में निहित है, न कि किसी बाहरी वैभव या भव्य समवशरण, छत्र या चमर जैसी विभूतियों में।
उन्होंने बताया कि कोई भी अशुद्धता शाश्वत नहीं होती, क्योंकि उसे दूर करने का उपाय हमेशा मौजूद रहता है, ठीक उसी प्रकार जैसे किसी कपड़े की अशुद्धि को धोकर दूर किया जा सकता है।

कर्म सिद्धांत पर विस्तृत चर्चा
प्रवचन में कर्मों के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा की गई। विशेषकर घाती कर्मों के प्रभाव पर प्रकाश डाला गया, जो जीव के ज्ञान, दर्शन और वीर्य को ढक देते हैं और अनंत संसार का कारण बनते हैं। इनमें मोहनीय कर्म को सबसे प्रमुख बताया गया, जो जीव को संसार में बार-बार भटकने का कारण बनता है।
इसके साथ ही अघाती कर्मों का भी वर्णन किया गया, जो शरीर और भौतिक संयोगों को प्रभावित करते हैं, जबकि घाती कर्म सीधे जीव के आंतरिक गुणों पर प्रभाव डालते हैं।
सर्वज्ञता और वीतरागता का महत्व
प्रवचन में यह भी बताया गया कि वीतरागता प्राप्त होने के बाद भी सर्वज्ञता आवश्यक है, क्योंकि संसार में सूक्ष्म, अंतरित और दूरवर्ती पदार्थों को जानने के लिए पूर्ण ज्ञान की आवश्यकता होती है।
सर्वज्ञ का अर्थ ऐसे ज्ञान से है जिसमें सूक्ष्म, अंतरित और दूरवर्ती सभी पदार्थ प्रत्यक्ष रूप से ज्ञात हों। यह भी बताया गया कि जो कुछ अनुमान का विषय होता है, वह किसी न किसी के लिए प्रत्यक्ष भी होता है।
पदार्थों का वर्गीकरण
प्रवचन में पदार्थों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया—
- सूक्ष्म पदार्थ: जो सामान्य दृष्टि से दिखाई नहीं देते
- अंतरित पदार्थ: जैसे महावीर स्वामी, पाँच पांडव आदि जो वर्तमान में प्रत्यक्ष नहीं हैं
- दूरवर्ती पदार्थ: जैसे अत्यंत दूर स्थित स्थान और लोक

अनुमान ज्ञान और प्रत्यक्ष ज्ञान
अनुमान ज्ञान का सिद्धांत भी समझाया गया, जैसे धुएं को देखकर अग्नि का अनुमान लगाना। यह भी बताया गया कि अनुमान और प्रत्यक्ष ज्ञान में गहरा संबंध होता है।
सर्वज्ञ वह है, जिसके लिए सभी प्रकार के सूक्ष्म, अंतरित और दूरवर्ती पदार्थ प्रत्यक्ष रूप से ज्ञात हों। ऐसे ज्ञानी राग-द्वेष से पूर्णतः रहित होते हैं और निर्विकल्प अवस्था में स्थित रहते हैं।
आप्त पुरुष की परिभाषा
प्रवचन में निर्दोष आप्त की परिभाषा भी दी गई, जिसमें बताया गया कि जो व्यक्ति राग-द्वेष और सभी दोषों से रहित होकर सच्चे ज्ञान का प्रतिपादन करता है, वही आप्त कहलाता है।
कार्यक्रम में सहभागिता
शिविर में बच्चों, युवाओं और अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी देखने को मिली। आयोजन का मुख्य उद्देश्य जैन धर्म के सिद्धांतों को सरल, व्यावहारिक और आधुनिक तकनीक के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचाना है।

निष्कर्ष
यह सात दिवसीय जिनदेशना बाल युवा संस्कार शिविर न केवल धार्मिक ज्ञान का माध्यम बन रहा है, बल्कि यह बच्चों और युवाओं में नैतिकता, अनुशासन और संस्कारों के विकास का एक सशक्त मंच भी सिद्ध हो रहा है। आयोजकों ने सभी से अधिकाधिक सहभागिता की अपील की है ताकि धर्म और संस्कृति की यह परंपरा और मजबूत हो सके।
