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जरूरतमंद की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा, किसी का सहारा बनना ही इंसानियत: ओके जैन मस्ताना

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Published On: 22 August 2026

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जरूरतमंद की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा, किसी का सहारा बनना ही इंसानियत: ओके जैन मस्ताना

निस्वार्थ मानव सेवा से मिलता है सच्चा सुख, जरूरत पड़े तो दूसरों से सहयोग लेकर भी जरूरतमंदों तक पहुंचाएं वस्त्र, अन्न और शिक्षण सामग्री

रिपोर्टर – वैभव जैन मस्ताना

सिलवानी। समाज में जरूरतमंद, गरीब और असहाय व्यक्ति की मदद करना केवल सामाजिक जिम्मेदारी नहीं, बल्कि सच्ची मानवता और ईश्वर की सेवा के समान है। हमारे आसपास यदि कोई व्यक्ति या परिवार परेशानी में है और हम अपनी क्षमता के अनुसार उसका सहारा बनते हैं, तो इससे बड़ा पुण्य का कार्य कोई नहीं हो सकता। जरूरत पड़ने पर स्वयं के संसाधन कम हों तो दूसरों से सहयोग लेकर भी जरूरतमंद तक सहायता पहुंचाने का प्रयास करना चाहिए। यह विचार क्षेत्रीय विकास परिषद के प्रवक्ता एवं वैश्य महासम्मेलन के जिला कार्यालय मंत्री ओके जैन मस्ताना ने मानव सेवा के महत्व पर चर्चा करते हुए व्यक्त किए।

उन्होंने कहा कि समाज में सेवा की भावना केवल आर्थिक रूप से सक्षम लोगों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के मन में दूसरों की सहायता करने की सच्ची भावना है तो वह छोटे से छोटे प्रयास के माध्यम से भी किसी जरूरतमंद के जीवन में खुशी ला सकता है।

जरूरतमंद का सहारा बनना ही सच्ची इंसानियत

ओके जैन मस्ताना ने कहा कि हमारे आसपास कई ऐसे परिवार रहते हैं, जिन्हें रोजमर्रा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है। ऐसे परिवारों में बच्चों की शिक्षा, कपड़े, भोजन और अन्य आवश्यकताओं को पूरा करना कई बार कठिन हो जाता है।

समाज के प्रत्येक सक्षम व्यक्ति को अपने आसपास नजर रखनी चाहिए कि कहीं कोई परिचित या अपरिचित व्यक्ति मदद की आवश्यकता में तो नहीं है। यदि किसी परिवार को अन्न की आवश्यकता है, किसी बच्चे को पढ़ाई के लिए किताब, कॉपी या अन्य शिक्षण सामग्री चाहिए अथवा किसी जरूरतमंद को वस्त्रों की आवश्यकता है तो उसकी मदद करने के लिए आगे आना चाहिए।

उन्होंने कहा कि सेवा करते समय यह नहीं देखना चाहिए कि सहायता पाने वाला व्यक्ति अपना है या पराया। मानवता का रिश्ता सबसे बड़ा रिश्ता है और इसी भावना के साथ किया गया कार्य वास्तविक समाज सेवा कहलाता है।

सेवा भाव दूसरों से सीखकर जीवन में उतारें

मस्ताना ने बताया कि उन्होंने भी सिलवानी क्षेत्र में लंबे समय से सेवा कार्य करने वाले लोगों के संपर्क में रहकर मानव सेवा की भावना को समझा और सीखा है। समाज में कई लोग बिना किसी प्रचार या व्यक्तिगत स्वार्थ के लगातार जरूरतमंदों की मदद करते रहते हैं। ऐसे लोगों से प्रेरणा लेकर प्रत्येक व्यक्ति अपने स्तर पर सेवा की शुरुआत कर सकता है।

उन्होंने कहा कि सेवा के लिए हमेशा बड़ी धनराशि या बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती। कभी-कभी किसी जरूरतमंद व्यक्ति की बात सुनना, उसे सही जगह तक पहुंचाना, किसी बच्चे की पढ़ाई में मदद करना या किसी परिवार को आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराना भी महत्वपूर्ण सेवा हो सकती है।

खुद सक्षम न हों तो दूसरों का सहयोग लेकर करें मदद

ओके जैन मस्ताना ने कहा कि कई बार हमारे सामने कोई जरूरतमंद व्यक्ति आता है, लेकिन हमारी व्यक्तिगत आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं होती कि हम उसकी पूरी सहायता कर सकें। ऐसी परिस्थिति में पीछे हटने के बजाय समाज के अन्य लोगों से सहयोग लिया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि यदि किसी जरूरतमंद बच्चे को किताबें चाहिए और हमारे पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं तो मित्रों, परिचितों, सामाजिक संगठनों या अन्य सहयोगियों से मदद लेकर उसकी आवश्यकता पूरी की जा सकती है। सेवा में महत्वपूर्ण यह नहीं है कि सहायता की राशि या सामग्री किसने दी, बल्कि यह है कि जरूरतमंद व्यक्ति तक सही समय पर मदद पहुंची या नहीं।

उनका कहना है कि समाज के कई लोगों का छोटा-छोटा सहयोग एकत्र होकर किसी जरूरतमंद परिवार के लिए बड़ी सहायता बन सकता है।

ग्रामीण और मजदूर बस्तियों तक पहुंचनी चाहिए सहायता

उन्होंने कहा कि सिलवानी सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों और मजदूर वर्ग की बस्तियों में कई परिवार ऐसे हैं, जिन्हें समय-समय पर सहायता की आवश्यकता पड़ती है। सामाजिक कार्यकर्ताओं और सक्षम नागरिकों को ऐसे क्षेत्रों में पहुंचकर वास्तविक जरूरतमंदों की पहचान करनी चाहिए।

जरूरत के अनुसार उन्हें वस्त्र, अन्न, दैनिक उपयोग की सामग्री और बच्चों को शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जा सकती है। विशेष रूप से गरीब परिवारों के बच्चों की शिक्षा में सहयोग करना भविष्य निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

मस्ताना ने कहा कि जरूरतमंद बच्चों तक किताबें, कॉपियां, पेन, स्कूल बैग या अन्य उपयोगी सामग्री पहुंचाने के बाद उनके चेहरे पर जो खुशी दिखाई देती है, वही सेवा करने वाले व्यक्ति के लिए सबसे बड़ा पुरस्कार है।

निस्वार्थ सेवा से मिलता है मन को सुकून

ओके जैन मस्ताना के अनुसार किसी की सहायता करते समय बदले में कुछ पाने की अपेक्षा नहीं होनी चाहिए। सेवा का वास्तविक अर्थ तभी है जब वह बिना किसी स्वार्थ और दिखावे के की जाए। जरूरतमंद की मदद करने के बाद उसके चेहरे पर आने वाली मुस्कान और मन से मिलने वाली दुआ व्यक्ति को ऐसा आत्मिक संतोष देती है, जिसे धन से नहीं खरीदा जा सकता।

उन्होंने कहा कि समाज में यदि प्रत्येक व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार किसी एक जरूरतमंद का भी सहारा बनने का संकल्प ले तो अनेक परिवारों की परेशानियां कम की जा सकती हैं।

मानव सेवा को बनाएं सामाजिक संस्कार

मस्ताना ने कहा कि बच्चों और युवाओं में भी सेवा एवं सहयोग की भावना विकसित करने की जरूरत है। नई पीढ़ी को यह समझाना चाहिए कि समाज में आगे बढ़ने के साथ दूसरों का हाथ पकड़कर उन्हें भी आगे बढ़ाना हमारी जिम्मेदारी है।

परिवारों को बच्चों में जरूरतमंदों के प्रति संवेदनशीलता, सहयोग और करुणा के संस्कार विकसित करने चाहिए। इससे भविष्य में एक ऐसा समाज तैयार होगा, जहां किसी जरूरतमंद को अकेला महसूस नहीं करना पड़ेगा।

उन्होंने समाज के सक्षम लोगों, सामाजिक संगठनों और युवाओं से अपील की कि वे अपने आसपास जरूरतमंद लोगों की पहचान कर उनकी यथासंभव सहायता करें। उन्होंने कहा कि किसी भूखे को भोजन, जरूरतमंद को वस्त्र और आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे को शिक्षा में सहयोग देना मानवता का वास्तविक स्वरूप है।

 

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