जब डॉ. हेडगेवार को बताए बिना उन्हें बना दिया गया RSS का ‘सरसंघचालक’
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की स्थापना 1925 में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार ने की थी। वे नागपुर के एक युवा, ऊर्जावान और राष्ट्रवादी विचारों से प्रेरित डॉक्टर थे, जिन्होंने यह महसूस किया कि केवल राजनीतिक आंदोलन चलाकर भारत को मज़बूत नहीं बनाया जा सकता, बल्कि समाज को अंदर से संगठित करना और उसमें अनुशासन भरना बेहद ज़रूरी है।
प्रारंभिक दौर
संघ की स्थापना विजयादशमी के दिन 1925 में नागपुर में हुई। डॉ. हेडगेवार ने स्वयंसेवकों को लेकर शाखा की शुरुआत की। संघ का उद्देश्य था – समाज को जात-पांत से ऊपर उठाकर संगठित करना और राष्ट्रभक्ति का संस्कार करना।
सरसंघचालक बनाए जाने की घटना
संघ की स्थापना के शुरुआती दिनों में डॉ. हेडगेवार स्वयं को संघ का ‘मुखिया’ घोषित नहीं करना चाहते थे। वे चाहते थे कि संगठन व्यक्ति-पूजा पर आधारित न होकर, सामूहिक भावना से चले।
इसी बीच संघ के कार्यकर्ताओं और जिम्मेदार स्वयंसेवकों ने एक बैठक बुलाई और इस बात पर विचार किया कि संघ को एक प्रमुख संचालक (आज जिसे सरसंघचालक कहते हैं) की आवश्यकता है।
बैठक में सर्वसम्मति से तय किया गया कि यह दायित्व डॉ. हेडगेवार को ही मिलना चाहिए, क्योंकि संघ की स्थापना उन्होंने की थी और संगठन की दिशा व दृष्टि भी वही स्पष्ट कर सकते थे।
दिलचस्प बात यह थी कि यह निर्णय उन्हें बताए बिना ही लिया गया।
जब निर्णय के बाद उन्हें सूचना दी गई तो शुरुआत में वे हिचकिचाए। उन्होंने कहा कि संघ व्यक्ति-विशेष का संगठन नहीं है। लेकिन कार्यकर्ताओं के आग्रह और इस तर्क पर कि संगठन को दिशा देने के लिए एक केंद्रीय नेतृत्व अनिवार्य है, उन्होंने जिम्मेदारी स्वीकार कर ली।
इस तरह वे औपचारिक रूप से RSS के पहले सरसंघचालक बने।
उनकी भूमिका और योगदान
- डॉ. हेडगेवार ने संघ की शाखाओं का विस्तार नागपुर से पूरे मध्य भारत और फिर अन्य राज्यों तक किया।
- उन्होंने शाखाओं में शारीरिक प्रशिक्षण, देशभक्ति गीत, और अनुशासन पर जोर दिया।
- स्वतंत्रता आंदोलन में भी वे सक्रिय रहे, और कांग्रेस के साथ भी विभिन्न आंदोलनों में शामिल हुए।
- उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ का उद्देश्य राजनीतिक दल बनना नहीं, बल्कि समाज को अंदर से संगठित करना है।
आगे का सफर
1940 में डॉ. हेडगेवार का निधन हो गया। उनके बाद द्वितीय सरसंघचालक के रूप में श्री गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर को यह जिम्मेदारी सौंपी गई।
📌 निष्कर्ष:
डॉ. हेडगेवार को संघ का सरसंघचालक बनाया जाना उनकी जानकारी या इच्छा से नहीं, बल्कि संघ के स्वयंसेवकों की पहल और सर्वसम्मति से हुआ था। यही कारण है कि उन्हें औपचारिक रूप से यह पद स्वीकार करना पड़ा, हालांकि वे चाहते थे कि संगठन किसी एक व्यक्ति पर आधारित न होकर सामूहिक भावना से आगे बढ़े।
