सारी उम्र भागम-भाग में माँ ने अपने सपनों, सुख और शरीर को त्याग दिया। पढ़िए माँ की कुर्बानी पर आधारित हृदयस्पर्शी लेख।
सारी उम्र भागम-भाग
सारी उम्र भागम-भाग — यह सिर्फ शब्द नहीं, बल्कि उस माँ की पूरी जिंदगी है, जिसने कभी अपने लिए जीना सीखा ही नहीं। माँ का जीवन एक ऐसे घर से शुरू होता है, जो कच्चा है, लेकिन उसमें बसने वाला प्रेम पक्का है।
माँ का घर और मायका
माँ का घर ही मेरा मायका था।
कच्ची दीवारें, मिट्टी का चूल्हा और अधूरी छत — मगर आत्मसम्मान से भरा हुआ घर।
मिट्टी को हाथों से गूंथकर माँ ने दीवारें सजाईं, पर सारी उम्र भागम-भाग में खुद को सजाने का वक्त नहीं मिला।
चूल्हा, चौकड़ी और माँ की साँसें
चौकड़ी पर बैठकर माँ अपनी फूंक से चूल्हा सुलगाती थी।
लकड़ियाँ डाल-डालकर हाथ जला लिए,
लेकिन सारी उम्र भागम-भाग में शिकायत कभी नहीं की।
रसोई से रिश्तों तक
थाली में आटा, हांडी में सब्जी,
स्वाद में माँ का प्रेम घुला रहता था।
खुद अंत में खाती थी, पहले सबको खिलाती थी —
यही थी सारी उम्र भागम-भाग की असली परिभाषा।
सपनों का गला घोंटती जिम्मेदारियाँ
माँ ने अपने सपनों को दबाया,
बच्चों के सपनों को उड़ान देने के लिए।
उसका शरीर बेडौल होता गया,
लेकिन जिम्मेदारी कभी कम नहीं हुई।
बर्तन, लकीरें और थकान
घिस-घिसकर काले बर्तनों को चमकाया,
और अनजाने में अपने हाथों की लकीरें मिटा दीं।
सारी उम्र भागम-भाग में
माँ ने खुद का मर्ज भी भुला दिया।
हमारी पढ़ाई, माँ की रातें
रातों को जागकर,
दिन में काम कर,
माँ ने हमें पढ़ाया।
हमारा भविष्य बनाया —
और अपना जीवन होम दिया।
जब अच्छा समय आया
जब सुख के दिन आए,
शरीर ने साथ छोड़ दिया।
और एक दिन —
माँ भी चली गई।
सारी उम्र भागम-भाग में
आत्मा ने भी अंत में साथ छोड़ दिया।
खंडहर बनता घर
आज भी वही चूल्हा, वही चौकड़ी,
वही दरवाज़े माँ का इंतज़ार करते हैं।
घर अब खंडहर है,
लेकिन यादें जिंदा हैं।
आज का सवाल
क्या हमने कभी माँ से पूछा —
“आप कैसी हैं?”
निष्कर्ष
नया मकान बन सकता है,
लेकिन माँ की कुर्बानी
कभी दोबारा नहीं मिल सकती।
सारी उम्र भागम-भाग में
माँ ने जो बनाया,
हम सिर्फ उसमें रहते हैं।
लेखक एवं संवाददाता विवरण
लेखिका: काजल मनीष जैन
स्थान: राजस्थान
संवाददाता: जीवनलाल जैन, नागदा
मोबाइल: 9179662633
