संथारा व्रत किशोर भाई चोवटिया ने भगवान महावीर जन्म दिवस पर लिया। हार्दिक हुंडिया, जिग्नेश हिराणी सहित समाज ने दी भूरी अनुमोदना।
संथारा व्रत किशोर भाई चोवटिया
संथारा व्रत किशोर भाई चोवटिया ने एक बार फिर जैन धर्म की महान परंपरा को जीवंत कर दिया है। मृत्यु को महोत्सव के रूप में स्वीकार करने की यह साधना आत्मा की शुद्धि और मोक्ष की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जाती है। भगवान महावीर के जन्म दिवस जैसे पावन अवसर पर इस व्रत को ग्रहण करना अपने आप में अत्यंत प्रेरणादायक और आध्यात्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।
संथारा व्रत का महत्व
यह व्रत मृत्यु को भय नहीं बल्कि एक उत्सव के रूप में देखने की शिक्षा देता है।
किशोर भाई चोवटिया का निर्णय
संथारा व्रत किशोर भाई चोवटिया ने भगवान महावीर के जन्म दिवस पर लिया। उन्होंने अन्न-जल का त्याग करते हुए प्रभु से प्रार्थना की:
“हे प्रभु, मैं आपका सन हूँ, आप जब चाहें मुझे बुला लें।”
उनका यह संकल्प जैन समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। आज संथारा का छठा दिन है और वे पूर्ण शांति एवं धैर्य के साथ साधना में लीन हैं।
परिवार और समाज की भूमिका
इस पावन अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंच रहे हैं।
- जिग्नेश हिराणी और उनका परिवार
- जयकांत भाई हिरानी से जुड़ा परिवार
- ख्याति भाभी
सभी मिलकर आने वाले अतिथियों का प्रेम और सम्मान से स्वागत कर रहे हैं।हर भक्त को नवकार मंत्र की माला और प्रभुजी की सुंदर मूर्ति भेंट की जा रही है।
आध्यात्मिक वातावरण और दर्शन
संथारा व्रत के दौरान वातावरण अत्यंत शांत, पवित्र और आध्यात्मिक बना हुआ है।
भक्तगण:
- नवकार मंत्र का जाप कर रहे हैं
- प्रभु की आराधना में लीन हैं
- आत्मचिंतन और संयम का अभ्यास कर रहे हैं
यह दृश्य दर्शाता है कि कैसे मृत्यु को भी एक उत्सव में बदला जा सकता है।
हार्दिक हुंडिया और अन्य गणमान्य व्यक्तित्व
इस आध्यात्मिक आयोजन में कई गणमान्य व्यक्तित्व उपस्थित हैं:
- हार्दिक हुंडिया (जैन श्रेष्ठी)
- जिग्नेश हिराणी (समाजसेवी)
- अन्य श्रद्धालु और समाज के लोग
इन सभी ने किशोर भाई की साधना की भूरी अनुमोदना की और इसे समाज के लिए प्रेरणास्रोत बताया।
संथारा और जैन दर्शन
संथारा केवल एक व्रत नहीं बल्कि जीवन दर्शन है।यह सिखाता है:
- मोह और माया का त्याग
- आत्मा की शुद्धि
- कर्मों का क्षय
- मृत्यु को सहज स्वीकार करना
जैन धर्म में इसे मोक्ष प्राप्ति का मार्ग माना जाता है।
निष्कर्ष
संथारा व्रत किशोर भाई चोवटिया ने यह सिद्ध कर दिया कि जीवन और मृत्यु दोनों ही आत्मा की यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव हैं।उनका यह निर्णय न केवल जैन समाज बल्कि पूरे मानव समाज के लिए एक प्रेरणा है।यह घटना हमें सिखाती है कि संयम, श्रद्धा और आत्मबल से मृत्यु को भी एक महोत्सव में बदला जा सकता है।
