सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति विषय पर विप्र फाउंडेशन द्वारा आयोजित गोष्ठी में डॉ. भरत शर्मा, राधेश्याम शर्मा गुरुजी, अनिल जोशी, अरविंद पुरोहित सहित कई प्रतिनिधियों ने भारतीय संस्कृति और सनातन मूल्यों पर अपने विचार रखे।
सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति पर गोष्ठी
सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति केवल भारत की पहचान नहीं बल्कि विश्व को दिशा देने वाली जीवन पद्धति है। इसी उद्देश्य को लेकर विप्र फाउंडेशन के राष्ट्रीय संरक्षक राधेश्याम शर्मा “गुरुजी” के आमंत्रण पर ब्राह्मण समाज के मध्यप्रदेश और राजस्थान के प्रतिनिधियों द्वारा भारतीय सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति पर एक विशेष गोष्ठी आयोजित की गई।
इस महत्वपूर्ण गोष्ठी में संस्कृति मंत्रालय सदस्य, भारत सरकार डॉ. भरत शर्मा, राष्ट्रीय सेवक संघ सदस्य अनिल जोशी, सुनील पटेल तथा जयपुर से आए उद्योगपति अरविंद पुरोहित विशेष रूप से उपस्थित रहे।
गोष्ठी में आधुनिक युग में सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता पर गहन चिंतन किया गया और युवा पीढ़ी तक भारतीय संस्कृति एवं सनातन मूल्यों को पहुँचाने की जिम्मेदारी तय की गई।
विप्र फाउंडेशन द्वारा आयोजित विशेष गोष्ठी
विप्र फाउंडेशन के राष्ट्रीय संरक्षक राधेश्याम शर्मा “गुरुजी” के नेतृत्व में आयोजित इस कार्यक्रम में समाज के अनेक बुद्धिजीवी, सांस्कृतिक प्रतिनिधि और धर्मप्रेमी शामिल हुए।गोष्ठी का मुख्य उद्देश्य युवाओं को भारतीय संस्कृति की जड़ों से जोड़ना और समाज में संस्कारों की महत्ता को पुनः स्थापित करना था।कार्यक्रम के दौरान भारतीय परंपराओं, संस्कृति, अध्यात्म और सामाजिक मूल्यों पर विस्तार से चर्चा की गई।
डॉ. भरत शर्मा ने दिया प्रेरणादायक संदेश
संस्कृति मंत्रालय सदस्य, भारत सरकार डॉ. भरत शर्मा ने अपने संबोधन में कहा कि —“सनातन धर्म केवल अतीत की विरासत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य का मार्गदर्शक है।”उन्होंने कहा कि “वसुधैव कुटुंबकम” और “सर्व धर्म समभाव” जैसे भारतीय सिद्धांत विश्व स्तर पर भारत को उच्च वैचारिक मूल्यों वाले राष्ट्र के रूप में पहचान दिलाते हैं।डॉ. भरत शर्मा ने कहा कि भारतीय संस्कृति अध्यात्म, अनुशासन, कृतज्ञता, संस्कार और जीवन चरित्र जैसे संवेदनशील मूल्यों पर आधारित है।उन्होंने कहा कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है कि आने वाली पीढ़ी को सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के प्रति जागरूक किया जाए।
राधेश्याम शर्मा गुरुजी ने संस्कारों पर रखे विचार
उक्त अवसर पर राधेश्याम Sharma “गुरुजी” ने कहा कि —“संस्कार चर्चा का नहीं बल्कि अनुभूति और आचरण का विषय है।”उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में हमारी संस्कृति और संस्कार पाश्चात्य सभ्यता से प्रभावित हो रहे हैं। परिवारों में धर्म और संस्कृति के प्रति जागरूकता का अभाव दिखाई दे रहा है।उन्होंने समाज से अपील करते हुए कहा कि सभी लोगों को समर्पित भाव से सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति के उन्नयन का प्रयास करना चाहिए।
युवा पीढ़ी तक संस्कृति पहुंचाने पर जोर
गोष्ठी में विशेष रूप से इस बात पर चर्चा हुई कि आज की युवा पीढ़ी तेजी से भौतिकवाद की ओर बढ़ रही है।ऐसे समय में भारतीय संस्कृति, पारिवारिक मूल्यों और सनातन विचारधारा को नई पीढ़ी तक पहुंचाना बेहद आवश्यक हो गया है।प्रतिनिधियों ने कहा कि शिक्षा, सामाजिक गतिविधियों और सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से युवाओं को जोड़ा जाना चाहिए।
अरविंद पुरोहित ने संगठन की ताकत बताई
जयपुर से पधारे उद्योगपति अरविंद पुरोहित ने कहा कि यदि समाज संगठित होकर कार्य करे तो वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति को नई पहचान मिल सकती है।उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति केवल भारत तक सीमित नहीं बल्कि पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत है।
राष्ट्रीय सेवक संघ ने जताई प्रतिबद्धता
राष्ट्रीय सेवक संघ सदस्य श्री अनिल जोशी ने कहा कि संघ और संगठन निरंतर भारतीय संस्कृति और सनातन धर्म के उन्नयन के लिए कार्य करते आए हैं।उन्होंने कहा कि धर्म विशेषज्ञों, सामाजिक प्रतिनिधियों और सांस्कृतिक संगठनों के सामूहिक प्रयास से इस दिशा में और मजबूती आएगी।
सुनील पटेल ने युवाओं को दी सीख
सुनील पटेल ने अपने विचार रखते हुए कहा कि युवा पीढ़ी को पाश्चात्य विचारों और भौतिकवाद के असांस्कृतिक प्रभावों से दूर रहने की आवश्यकता है।उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति व्यक्ति को नैतिकता, अनुशासन और जीवन मूल्यों की शिक्षा देती है।
सम्मान समारोह भी हुआ आयोजित
कार्यक्रम के अंत में राधेश्याम शर्मा “गुरुजी” द्वारा सभी प्रतिनिधियों का सम्मान किया गया।इस अवसर पर डॉ. भरत शर्मा को पुस्तकों का स्मृतिचिह्न भेंट कर सम्मानित किया गया।समारोह का वातावरण आध्यात्मिक, सांस्कृतिक और प्रेरणादायक रहा।
सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति क्यों है प्रासंगिक
आज के आधुनिक दौर में जहां दुनिया तनाव, असंतुलन और सांस्कृतिक संकट से गुजर रही है, वहीं सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति मानवता को संतुलन और शांति का मार्ग दिखाते हैं।भारतीय संस्कृति में परिवार, समाज, प्रकृति और मानवता के प्रति सम्मान की भावना निहित है।यही कारण है कि दुनिया भर में योग, ध्यान और भारतीय जीवनशैली की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है।
भारतीय संस्कृति का वैश्विक प्रभाव
भारत की सांस्कृतिक परंपराएं आज पूरी दुनिया में सम्मान प्राप्त कर रही हैं।योग दिवस, आयुर्वेद, ध्यान, वेद और भारतीय दर्शन वैश्विक स्तर पर लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।विशेषज्ञों का मानना है कि यदि युवा पीढ़ी अपनी संस्कृति से जुड़ी रहेगी तो भारत भविष्य में और अधिक मजबूत राष्ट्र बनकर उभरेगा।

