अक्षय तृतीया पर Thandla में धर्ममय आयोजन: दीक्षित चारित्र आत्माओं के प्रसंग के साथ ‘सामायिक दिवस’ मनाया गया
Thandla : अक्षय तृतीया के पावन पर्व पर थांदला नगर में जैन समाज द्वारा भव्य और भावनात्मक धार्मिक आयोजन संपन्न हुए। इस विशेष दिन को दीक्षित चारित्र आत्माओं के स्मरण और उनकी तप-त्यागमयी साधना के सम्मान में ‘सामायिक दिवस’ के रूप में मनाया गया। पूरे नगर में आध्यात्मिक वातावरण बना रहा, जहां श्रद्धा, संयम और तप की भावना हर ओर देखने को मिली।
धर्म के मूल तत्वों का स्मरण: अहिंसा, संयम और तप
जैन दर्शन में अक्षय तृतीया का दिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। यह केवल एक पर्व नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण और धर्म की ओर अग्रसर होने का प्रेरणादायक अवसर है। इस दिन को अहिंसा, संयम और तप के त्रिविध मार्ग को अपनाने का प्रतीक माना जाता है।
ऐसा माना जाता है कि इसी पावन दिन अनेक महान आत्माओं ने सांसारिक मोह-माया, हिंसा और भौतिक सुखों का त्याग कर संयम मार्ग को अपनाया। उन्होंने जीवन के वास्तविक उद्देश्य—मोक्ष प्राप्ति—की दिशा में कदम बढ़ाया और अपने आचरण से समाज को मार्गदर्शन प्रदान किया।
महान संतों का स्मरण
इस अवसर पर जैन परंपरा के महान संतों और आचार्यों का भावपूर्वक स्मरण किया गया। विशेष रूप से माधवमुनि जी, नन्दलालजी मुनि और ताराचंदजी मुनि जैसे पूज्य संतों का उल्लेख किया गया, जिन्होंने अपने जीवन को धर्म साधना में समर्पित कर दिया।
इन संतों ने अपने तप, त्याग और संयम से समाज को यह संदेश दिया कि सच्चा सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, बल्कि आत्मिक शांति और साधना में निहित है।
महासती निखिलशीलाजी का प्रेरक जीवन
थांदला में विराजित निखिलशीलाजी म.सा. का सानिध्य इस पूरे आयोजन का केंद्र बिंदु रहा। उन्होंने अपने संयम जीवन के 32 वर्ष पूर्ण कर लिए हैं, जो अपने आप में एक प्रेरणादायक उपलब्धि है।
उनका जीवन सेवा, समर्पण और साधना का अद्भुत उदाहरण है। उन्होंने न केवल स्वयं संयम का पालन किया, बल्कि समाज को भी धर्म के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया। उनके मार्गदर्शन में थांदला संघ ने ज्ञान, दर्शन, चारित्र और तप के क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं।
उनके मुखाग्र से 11 अंग सूत्रों का वाचन पूर्ण हो चुका है, जबकि 12 उपांग में ‘राजप्रश्नीय सुत्त’ का वाचन वर्तमान में चल रहा है। उनके सानिध्य में अनेक लोगों को जिनवाणी सुनने का दुर्लभ अवसर प्राप्त हुआ है।

दीक्षा प्रसंग: त्याग और समर्पण की मिसाल
इस पावन अवसर पर दीक्षा से जुड़े प्रेरणादायक प्रसंगों का भी स्मरण किया गया। एक वर्ष पूर्व इसी दिन ललितमुनिजी ने सांसारिक जीवन का त्याग कर संयम मार्ग को अपनाया था।
उन्होंने धन, वैभव और पारिवारिक सुखों को छोड़कर आत्मिक उन्नति का मार्ग चुना, जो आज के भौतिकवादी युग में एक बड़ी प्रेरणा है। उनके इस निर्णय ने समाज को यह संदेश दिया कि सच्चा सुख आत्मा की शुद्धि और साधना में है।
इसी तरह नगर की युवा नव्या शाह ने भी कम उम्र में ही आधुनिक जीवनशैली और भौतिक सुख-सुविधाओं का त्याग कर महासती बनने का संकल्प लिया। यह कदम न केवल साहसिक है, बल्कि नई पीढ़ी के लिए एक प्रेरक उदाहरण भी है।
‘सामायिक दिवस’ का आयोजन
अक्षय तृतीया के इस पावन दिन को थांदला में ‘सामायिक दिवस’ के रूप में मनाया गया। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सामायिक कर आत्मिक शांति और ध्यान का अनुभव किया।
सामायिक जैन धर्म में एक महत्वपूर्ण साधना है, जिसमें व्यक्ति कुछ समय के लिए अपने मन, वचन और कर्म को संयमित करता है और आत्मा की शुद्धि के लिए प्रयास करता है।
इस अवसर पर 7 सामायिक करने वाले आराधकों को गुप्त लाभार्थी द्वारा प्रभावना प्रदान की गई, जो समाज में सेवा और दान की भावना को दर्शाता है।
धर्मसभा और प्रेरणादायक संदेश
इस आयोजन के दौरान एक भव्य धर्मसभा का आयोजन भी किया गया, जिसमें संतों और विद्वानों ने धर्म के महत्व पर प्रकाश डाला।
संघ अध्यक्ष प्रदीप गादिया ने सभी संतों के प्रति आभार व्यक्त करते हुए उनके दीर्घकालीन धर्म प्रभावना की कामना की। उन्होंने कहा कि संतों का सानिध्य समाज के लिए अमूल्य है और उनके मार्गदर्शन से ही हम सही दिशा में आगे बढ़ सकते हैं।
वर्षितप आराधकों के लिए विशेष कार्यक्रम
अक्षय तृतीया के दिन वर्षितप करने वाले साधकों के लिए विशेष महत्व होता है। इस अवसर पर देशभर से आए लगभग 250 आराधकों ने वर्षितप की साधना में भाग लिया।
जिनेन्द्रमुनिजी के सानिध्य में इन साधकों के लिए आलोचना विधि आयोजित की गई। महासतीजी ने सभी आराधकों को उचित प्रायश्चित प्रदान किया और उन्हें आगे की साधना के लिए प्रेरित किया।
इसके साथ ही सामायिक और नवकार मंत्र के जाप के माध्यम से वातावरण को और अधिक आध्यात्मिक बनाया गया।
श्रेयांस कुमार के दान प्रसंग का महत्व
अक्षय तृतीया के दिन श्रेयांस कुमार द्वारा प्रथम तीर्थंकर को इक्षुरस का आहार देने की घटना का भी स्मरण किया गया।
यह प्रसंग जैन धर्म में ‘सुपात्र दान’ का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है। इससे यह संदेश मिलता है कि दान केवल वस्तु देने का कार्य नहीं है, बल्कि यह आत्मिक उन्नति का माध्यम भी है।
सेवा और समर्पण का उदाहरण
इस अवसर पर धर्मलता महिला मंडल की अध्यक्षा किरण श्रीमाल ने अपनी वैवाहिक वर्षगांठ को विशेष बनाते हुए वर्षितप कर रहे आराधकों के पारणें का आयोजन किया।
यह कदम समाज में सेवा, दान और तप की भावना को दर्शाता है। जैन समाज में यह परंपरा है कि जो साधक कठोर तपस्या करते हैं, उनके प्रति अन्य लोग सेवा और सहयोग के माध्यम से अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हैं।
आयोजन का संचालन और सहभागिता
इस पूरे आयोजन का संचालन सचिव हितेश शाहजी ने किया, जबकि जानकारी पवन नाहर द्वारा दी गई। कार्यक्रम के अंत में ललित जैन नवयुवक मंडल के अध्यक्ष प्रांजल लोढ़ा और सचिव प्रांजल भंसाली ने आभार व्यक्त किया।
इस आयोजन में बड़ी संख्या में समाज के लोगों ने भाग लिया और धर्म के प्रति अपनी आस्था और श्रद्धा व्यक्त की।
निष्कर्ष
अक्षय तृतीया के इस पावन अवसर पर थांदला में आयोजित कार्यक्रमों ने यह सिद्ध कर दिया कि धर्म केवल परंपरा नहीं, बल्कि जीवन जीने का एक मार्ग है।
अहिंसा, संयम और तप के सिद्धांत आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं जितने प्राचीन काल में थे। ऐसे आयोजनों से समाज में नैतिक मूल्यों और आध्यात्मिक चेतना को बढ़ावा मिलता है।
यह आयोजन न केवल वर्तमान पीढ़ी को प्रेरित करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी एक मार्गदर्शक बनता है, जिससे वे अपने जीवन में धर्म और संस्कारों को अपनाकर एक संतुलित और सार्थक जीवन जी सकें।
