साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म जैन शासन के लिए अपूरणीय क्षति है। 68 वर्षों के दीक्षा पर्याय में उन्होंने अंतरिक्षजी तीर्थ की रक्षा और शासन सेवा में अद्वितीय योगदान दिया।
भूमिका: साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म
साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म जैन समाज के लिए केवल एक साध्वी के देहावसान की सूचना नहीं है, बल्कि यह उस तपस्विनी चेतना का विराम है जिसने अपना संपूर्ण जीवन शासन, संयम और सेवा को समर्पित कर दिया। अंतरिक्षजी तीर्थ रक्षिका साध्वी सुमति श्रीजी के कालधर्म से जैन शासन ने एक ऐसी मार्गदर्शक शक्ति को खो दिया, जिनका जीवन स्वयं में प्रेरणापुंज था।
दीक्षा जीवन: तप, त्याग और अनुशासन की मिसाल
86 वर्ष की आयु में साध्वी सुमति श्रीजी ने देह त्याग किया। उनका 68 वर्षों का दीक्षा पर्याय संयम, साधना और निरंतर तप का प्रतीक रहा। वे पंजाब केसरी परम पूज्य विजय वल्लभ सूरीश्वरजी म.सा. समुदाय की परंपरा में दीक्षित, गच्छाधिपति आचार्य विजय श्री धर्मधुरंधर सूरीश्वरजी म.सा. की आज्ञानुवर्तिनि थीं।
उनका जीवन कठोर व्रतों, मौन साधना और आत्मशुद्धि का जीवंत उदाहरण रहा।
अंतरिक्षजी तीर्थ रक्षिका के रूप में ऐतिहासिक भूमिका
साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म विशेष रूप से इसलिए भी पीड़ादायक है क्योंकि वे केवल साध्वी नहीं, बल्कि अंतरिक्षजी तीर्थ की सजग रक्षिका थीं। जब-जब तीर्थ पर संकट आया, साध्वीजी ने तप, संघर्ष और संगठन के माध्यम से उसकी रक्षा की।
अंतरिक्षजी जैसे प्राचीन जैन तीर्थ को सुरक्षित रखने में उनका योगदान इतिहास में स्वर्णाक्षरों में दर्ज रहेगा।
शासन सेवा में साध्वी सुमति श्रीजी का अवदान
अपने दीक्षा काल में साध्वीजी ने—
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तीर्थ संरक्षण
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संघ संगठन
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साधु-साध्वी मर्यादा रक्षा
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समाज में धार्मिक चेतना का विस्तार
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युवाओं में संयम के प्रति जागरूकता
जैसे अनेक कार्यों को दिशा दी। साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म शासन के लिए इसलिए भी अपूरणीय क्षति है क्योंकि उनका अनुभव और मार्गदर्शन अद्वितीय था।
पालखी यात्रा और अंतिम संस्कार
साध्वी सुमति श्रीजी की पालखी यात्रा श्री सुमति माणिभद्र पुरम जैन तीर्थ, भणियारा (बड़ोदरा) से निकाली गई। हजारों श्रद्धालुओं की उपस्थिति में भावपूर्ण वातावरण में अंतिम संस्कार संपन्न हुआ।
“जय-जय अंतरिक्षजी” और “साध्वीजी अमर रहें” के उद्घोषों के बीच संपूर्ण क्षेत्र श्रद्धा और शोक में डूबा रहा।
गच्छाधिपति का भावुक संदेश
गच्छाधिपति आचार्य विजय श्री धर्मधुरंधर सूरीश्वरजी म.सा. ने साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म को जैन शासन के लिए अपूरणीय क्षति बताया।
उन्होंने कहा—
“साध्वी सुमति श्रीजी का जीवन शासन के प्रति पूर्ण समर्पण का आदर्श था। उनका तप, त्याग और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों को मार्ग दिखाता रहेगा।”
जैन समाज की प्रतिक्रिया
शांति वल्लभ टाइम्स, श्री गुरु आत्म वल्लभ परिवार सहित देश-विदेश के जैन संघों ने भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित की। अनेक साधु-साध्वियों ने इसे शासन के लिए एक युग का अंत बताया।
श्रद्धांजलि और स्मृतियाँ
साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म शरीर का अवसान है, विचारों का नहीं। उनका तप आज भी साधकों को प्रेरित करेगा। उनका जीवन सिखाता है कि—
“संयम ही शक्ति है और सेवा ही साधना।”
निष्कर्ष: एक युग का अवसान
साध्वी सुमति श्रीजी का कालधर्म जैन समाज के लिए गहरी पीड़ा है, लेकिन साथ ही यह जीवन-भर किए गए उनके महान कार्यों की स्मृति भी है। वे भले देह रूप में हमारे बीच न हों, पर शासन में उनका योगदान अमर रहेगा।
