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RSS political view “संघ राजनीति पर मोहन भागवत बयान: आरएसएस राजनीति समर्थन नहीं, नीतियों का समर्थन करता है — राम जन्मभूमि आंदोलन से स्पष्ट

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Published On: 9 November 2025
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“हम नीतियों का समर्थन करते हैं, राजनीति का नहीं” — मोहन भागवत ने स्पष्ट की राजनीति में संघ की भूमिका

नई दिल्ली / बेंगलुरु।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) प्रमुख मोहन भागवत ने बेंगलुरु में आयोजित एक कार्यक्रम में अपने भाषण के माध्यम से संघ की राजनीतिक भूमिका पर बड़ा बयान दिया। उन्होंने कहा कि संघ राजनीति करने वाला संगठन नहीं है, बल्कि नीति-समर्थन करने वाला सामाजिक संगठन है।
भागवत के इस बयान ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया कि आरएसएस का फोकस किसी पार्टी या व्यक्ति पर नहीं, बल्कि राष्ट्रहित और नीति-आधारित कार्यों पर है।

संघ की नीति-आधारित सोच

मोहन भागवत ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हमेशा राष्ट्रनीति का समर्थन करता है, न कि राजनीति का।
उन्होंने कहा —

“हम किसी दल या व्यक्ति का समर्थन नहीं करते। हम नीतियों का समर्थन करते हैं जो राष्ट्रहित में हों। राजनीति समाज को बांटती है, जबकि संघ समाज को जोड़ने का कार्य करता है।”

यह बयान संघ के उस सिद्धांत को दोहराता है, जिसके तहत संगठन का मुख्य उद्देश्य समाज को संगठित और सशक्त बनाना है, न कि सत्ता हासिल करना।

भागवत ने उदाहरण दिया कि जब राम जन्मभूमि आंदोलन हुआ, तब संघ ने उस “कारण” का समर्थन किया, न कि किसी राजनीतिक दल का।
उन्होंने स्पष्ट कहा कि यदि कांग्रेस उस समय राम मंदिर निर्माण का नेतृत्व करती, तो संघ उसे भी समर्थन देता क्योंकि संघ व्यक्ति या पार्टी नहीं, बल्कि उद्देश्य को देखता है।

राजनीति नहीं, समाज-संगठन संघ का लक्ष्य

संघ प्रमुख ने कहा कि आरएसएस का काम सत्ता में भाग लेना या चुनावों में सक्रिय होना नहीं है।
उन्होंने कहा —

“हम सत्ता प्राप्त करने के लिए नहीं, समाज को संगठित करने के लिए हैं। हमारा उद्देश्य है एक सशक्त, जागरूक और गुणवान हिन्दू समाज का निर्माण।”

भागवत के अनुसार, संघ का कार्यक्षेत्र राजनीति से परे है। वह समाज के हर वर्ग को जोड़ने, उनमें आत्मबल जगाने और संस्कारों के माध्यम से राष्ट्रनिर्माण का कार्य कर रहा है।
उन्होंने कहा कि जब समाज संगठित होगा, तब राष्ट्र अपने आप मजबूत बनेगा।

“अगर कांग्रेस राम मंदिर आंदोलन करती, तो हम उसका भी समर्थन करते”

इस बयान ने राजनीतिक हलकों में नई चर्चा छेड़ दी।
भागवत ने स्पष्ट किया कि संघ कभी भी पार्टी-विशेष का समर्थक नहीं रहा। उन्होंने कहा कि “हम व्यक्ति या दल नहीं, उद्देश्य को देखते हैं।”

उन्होंने समझाया कि राम जन्मभूमि आंदोलन का समर्थन किसी पार्टी के कारण नहीं था, बल्कि उस विचार के कारण था जो राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़ा था।
यदि वही काम किसी और दल ने किया होता, तो संघ उसका भी समर्थन करता।
इससे संघ की नीति-समर्थन की स्पष्ट परिभाषा सामने आती है — “हम राष्ट्रनीति के साथ हैं, न कि राजनीति के।”

दल-विशेष नहीं, राष्ट्र-विशेष दृष्टिकोण

मोहन भागवत ने कहा कि संघ किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है।
उन्होंने कहा —

“हमारा कोई दल नहीं है, सारे भारतीय दल हमारे हैं। जब कोई दल राष्ट्रहित में नीति अपनाता है, तो हम उसका समर्थन करते हैं।”

इस कथन से यह स्पष्ट होता है कि संघ खुद को राष्ट्रीय हितों के अनुरूप एक मार्गदर्शक संगठन के रूप में देखता है।
संघ किसी राजनीतिक दल का प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि समाज के हर क्षेत्र में नीतिगत जागरूकता लाने वाला संगठन बनना चाहता है।

राजनीति को संघ क्यों नहीं करता स्वीकार

भागवत ने कहा कि राजनीति अक्सर समाज को विभाजित करती है — वह जाति, धर्म, क्षेत्र या वर्ग के आधार पर लोगों में भेद पैदा करती है।
इसके विपरीत संघ का ध्येय समाज को एकजुट करना है।
उन्होंने कहा —

“राजनीति समाज को बांटती है, संघ समाज को जोड़ता है। इसलिए हम राजनीति नहीं करते, हम नीति और राष्ट्र के मार्ग पर चलते हैं।”

उनके अनुसार, सत्ता परिवर्तन से ज्यादा जरूरी है “चरित्र निर्माण और सामाजिक संगठन।”
इसी उद्देश्य से संघ ने पिछले 100 वर्षों में शिक्षा, सेवा, संस्कार और संगठन के क्षेत्र में कार्य किया है।

हिन्दू समाज का संगठन ही संघ की शक्ति

मोहन भागवत ने अपने भाषण में संघ की दृष्टि को स्पष्ट करते हुए कहा कि संघ का लक्ष्य केवल हिन्दू समाज को संगठित करना नहीं है, बल्कि उसे गुणवान और आत्मनिर्भर बनाना है।
उन्होंने कहा —

“हम संपूर्ण हिन्दू समाज को संगठित करना चाहते हैं ताकि वह एक समृद्ध, शक्तिशाली और धर्मप्रद राष्ट्र का निर्माण कर सके।”

उन्होंने यह भी कहा कि हिन्दू समाज केवल धर्म नहीं, बल्कि संस्कृति, परंपरा और जीवन-दर्शन का नाम है।
संघ का उद्देश्य इस व्यापक हिन्दू दृष्टि को राष्ट्र के केंद्र में स्थापित करना है, ताकि भारत पूरी दुनिया के लिए एक “धर्म-प्रेरित नेतृत्व” का उदाहरण बने।

संघ की संगठनात्मक और वैचारिक स्वतंत्रता

भागवत ने बताया कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी राजनीतिक दल की तरह पंजीकृत संस्था नहीं है, बल्कि यह एक “व्यक्तियों का संगठन (Body of Individuals)” है।
उन्होंने कहा कि संघ को कई बार प्रतिबंधित किया गया, परंतु हर बार संघ पहले से अधिक मजबूत होकर उभरा।
उनके अनुसार, यही बात यह सिद्ध करती है कि संघ सत्ता या पद से नहीं, बल्कि समाज की स्वीकृति और नैतिक शक्ति से चलता है।

संघ के प्रति आलोचनाएँ और जवाब

भागवत ने यह भी माना कि संघ को लेकर समाज में कई गलतफहमियाँ फैली हुई हैं।
उन्होंने कहा कि संघ को अक्सर “राजनीतिक एजेंडा चलाने वाला संगठन” कहकर गलत प्रस्तुत किया जाता है।
उन्होंने अपील की —

“संघ को अफवाहों से नहीं, तथ्यों से समझिए। हम न तो सत्ता के लिए हैं, न राजनीति के लिए; हम राष्ट्र के लिए हैं।”

भागवत ने कहा कि संघ आलोचना से नहीं घबराता, क्योंकि संघ के कार्य और उद्देश्य पारदर्शी हैं।
उन्होंने यह भी जोड़ा कि संघ समाज के हर वर्ग के लिए खुला है — चाहे उसका धर्म, जाति या भाषा कुछ भी हो।

संघ और राजनीति का अप्रत्यक्ष संबंध

यद्यपि संघ सीधे राजनीति में नहीं उतरता, परंतु उसके स्वयंसेवक समाज के विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हैं, जिनमें राजनीति भी शामिल है।
भागवत ने कहा कि जब संघ के स्वयंसेवक राजनीति में जाते हैं, तो वे संघ की नीतियों के नहीं, बल्कि अपने विवेक और राष्ट्रहित के अनुसार काम करते हैं।
इससे संघ का प्रभाव समाज के विभिन्न स्तरों तक पहुँचता है, लेकिन संगठन के रूप में वह राजनीति से अलग बना रहता है।

संघ का विजन: “एकजुट, सशक्त भारत”

मोहन भागवत ने अंत में कहा कि संघ का एकमात्र लक्ष्य है —

“एक संगठित, मजबूत और आत्मविश्वासी हिन्दू समाज, जो विश्व को धर्म, शांति और सुख का संदेश दे सके।”

उन्होंने कहा कि जब समाज में एकता और आत्मबल आएगा, तो भारत स्वतः विश्वगुरु बनेगा।
संघ इसी दिशा में कार्य कर रहा है — शिक्षा, सेवा, समाज-संगठन और सांस्कृतिक पुनर्जागरण के माध्यम से।

निष्कर्ष

मोहन भागवत का यह बयान संघ की विचारधारा और उसकी भूमिका को बेहद स्पष्ट रूप से सामने लाता है।
मुख्य बिंदु यह हैं:

  1. संघ राजनीति नहीं करता, बल्कि राष्ट्रहित की नीतियों का समर्थन करता है।

  2. संघ का लक्ष्य सत्ता नहीं, समाज-संगठन है।

  3. संघ दल-विशेष का नहीं, राष्ट्र-विशेष का समर्थक है।

  4. संघ का उद्देश्य हिन्दू समाज को संगठित, गुणवान और आत्मनिर्भर बनाना है।

  5. संघ को राजनीति का विकल्प नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक मार्गदर्शक माना जाना चाहिए।

संघ प्रमुख मोहन भागवत के इस स्पष्ट वक्तव्य ने यह संदेश दिया कि आने वाले समय में भी आरएसएस अपनी परंपरागत नीति — “राजनीति से दूर, राष्ट्रनीति के पास” — के साथ काम करता रहेगा।

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