मध्यप्रदेश में मोहन भागवत ने दोहराया ‘अखंड भारत’ का संकल्प — कहा, “हमारे घर का एक कमरा किसी ने हथिया लिया है, अब फिर वहां डेरा डालना है”
सतना/नई दिल्ली।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने रविवार को मध्यप्रदेश के सतना में आयोजित एक विशाल जनसभा में ‘अखंड भारत’ के संकल्प को एक बार फिर दोहराया।
बीटीआई ग्राउंड में हुए इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि भारतवर्ष मूल रूप से एक परिवार है, लेकिन इतिहास की कुछ परिस्थितियों ने इस परिवार को विभाजित कर दिया।
भागवत ने कहा —
“हमारा घर एक ही है, बस उसका एक कमरा किसी ने हथिया लिया है। जिस कमरे में हमारा टेबल, कुर्सी और कपड़े हुआ करते थे, वह अब किसी और के कब्जे में है। एक दिन हमें उसे वापस लेकर फिर से वहां अपना डेरा डालना है।”
उन्होंने कहा कि यह विचार कोई राजनीतिक कल्पना नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता और सांस्कृतिक चेतना का शाश्वत सत्य है।
भागवत के अनुसार, हमारे ऋषि-मुनियों ने हजारों वर्ष पहले जिस “भारत” का निर्माण किया था, वह केवल एक भूभाग नहीं बल्कि “संस्कार और सत्य” का जीवंत राष्ट्र था।
“इतिहास ने जब आँखें खोलीं, तो हमने उस भारत को उसके उन्नत स्वरूप में ही देखा,” उन्होंने कहा।
“अविभाजित भारत की भावना नई पीढ़ी तक पहुँचे”
सभा में उपस्थित सिंधी समाज के लोगों का उल्लेख करते हुए भागवत ने कहा कि अविभाजित भारत की भावना को नई पीढ़ी तक पहुँचाना आवश्यक है।
“हमारे बहुत से सिंधी भाई यहां हैं। वे पाकिस्तान नहीं गए थे, बल्कि अविभाजित भारत में ही थे। इसलिए यह समझ नई पीढ़ी तक जानी चाहिए कि हमारा घर एक ही है। परिस्थिति ने हमें कुछ समय के लिए अलग कर दिया, लेकिन घर और घर के कमरे अलग नहीं होते। पूरा भारतवर्ष एक घर है,” उन्होंने कहा।
भागवत ने कहा कि भारत की आत्मा ‘अविभाजित’ है और इस भाव को हमेशा जीवित रखना होगा।
“हमें याद रखना है कि यह अविभाजित भारत है। यह भाव हमारे मन, व्यवहार और संकल्प में दिखना चाहिए।”
“भाषा-भूषा-भोजन हमारी परंपरा के अनुरूप होना चाहिए”
संघ प्रमुख ने भारतीय जीवनशैली और परंपराओं के संरक्षण की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि देश की पहचान उसकी संस्कृति और परंपराओं से होती है।
“हमें तय कर लेना चाहिए कि हमारी भाषा, भूषा, भजन, भवन, भ्रमण और भोजन — ये सब कुछ हमारी परंपरा के अनुसार होना चाहिए। यही हमारी पहचान है,” भागवत ने कहा।
उन्होंने कहा कि विदेशों में रहने वाले भारतीयों के लिए भी ‘हिंदू’ शब्द ही पहचान बन जाता है।
“कई बार जो खुद को हिंदू नहीं मानते, विदेश जाकर जब अपने देश का परिचय देते हैं तो उन्हें ‘हिंदू’ या ‘हिंदवी’ कहा जाता है। वे लाख मना करें, पर दुनिया हमें उसी नाम से जानती है — इसलिए इस सत्य को स्वीकार करना चाहिए।”
“हर नागरिक को तीन भाषाओं का ज्ञान होना चाहिए”
भाषा विवाद पर बोलते हुए मोहन भागवत ने कहा कि भारत की भाषाएँ भले ही अनेक हों, लेकिन सभी में भाव एक ही है।
“सभी भारतीय भाषाएँ राष्ट्र की भाषाएँ हैं। किसी एक को दूसरी पर प्राथमिकता नहीं दी जानी चाहिए। हर नागरिक को कम से कम तीन भाषाएँ आनी चाहिए — घर की, राज्य की और राष्ट्र की भाषा। जब भाव एक है, तो भाषा में भेदभाव का कोई स्थान नहीं,” उन्होंने कहा।
मेहर शाह दरबार की नई इमारत का उद्घाटन
सतना प्रवास के दूसरे दिन भागवत ने बाबा मेहर शाह दरबार की नवनिर्मित बिल्डिंग का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने स्थानीय संतों, समाजसेवियों और संघ स्वयंसेवकों से भेंट की और एकात्मता, सेवा तथा संस्कार के संदेश को आगे बढ़ाने का आह्वान किया।
