—Advertisement—

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान से मिला जिन शासन एकता संघ का प्रतिनिधिमंडल , 70 साल पुराने Jain शोध केंद्र को बचाने के लिए ज्ञापन सौंपा गया

Author Picture
Published On: 28 April 2026
jain

—Advertisement—

Jain संस्थान के हस्तांतरण पर विवाद, केंद्र से हस्तक्षेप की मांग तेज

भोपाल/इंदौर।
वैशाली स्थित ऐतिहासिक प्राकृत Jain शास्त्र एवं अहिंसा शोध संस्थान के भविष्य को लेकर चल रहे विवाद ने अब राष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और सामाजिक हलचल पैदा कर दी है। संस्थान के अस्तित्व पर मंडरा रहे संकट को देखते हुए जिन शासन एकता संघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय कृषि मंत्री एवं पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से मुलाकात की और इस पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप की मांग की।

प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व संघ नायक राकेश जैन ने किया। इस दौरान धर्म समाज प्रचारक राजेश जैन दद्दू सहित कई सामाजिक और शैक्षणिक प्रतिनिधि उपस्थित रहे। प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री को विस्तृत ज्ञापन सौंपते हुए बिहार सरकार के उस निर्णय पर गंभीर आपत्ति जताई, जिसके तहत इस संस्थान को उच्च शिक्षा विभाग से हटाकर कला एवं संस्कृति विभाग को हस्तांतरित करने की तैयारी की जा रही है।

संस्थान के अस्तित्व पर संकट की चिंता

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि यह निर्णय केवल एक प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि यह संस्थान की 70 वर्षों से चली आ रही अकादमिक परंपरा और शोध संस्कृति के लिए गंभीर खतरा है। उनका आरोप है कि यदि यह हस्तांतरण किया गया तो यह संस्थान अपने मूल स्वरूप को खो देगा और केवल एक सामान्य पुस्तकालय या सांस्कृतिक इकाई बनकर रह जाएगा।

संस्थान को लेकर ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया कि यह केवल एक सरकारी कार्यालय नहीं है, बल्कि स्वतंत्र भारत का पहला ऐसा शोध केंद्र है, जो जैन संस्कृति, प्राकृत भाषा और अहिंसा दर्शन के अध्ययन को समर्पित है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि का उल्लेख

प्रतिनिधिमंडल ने केंद्रीय मंत्री को बताया कि इस संस्थान की नींव 23 अप्रैल 1956 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद द्वारा रखी गई थी। यह संस्थान वैशाली में स्थापित किया गया था, जो भगवान महावीर स्वामी की जन्मस्थली के रूप में भी जाना जाता है।

यह संस्थान जैन दर्शन, प्राकृत भाषा और अहिंसा पर आधारित शोध कार्यों के लिए देश-विदेश में अपनी विशिष्ट पहचान रखता है। यहां वर्षों से जैन साहित्य, प्राचीन ग्रंथों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जुड़े विषयों पर अध्ययन और शोध कार्य होते रहे हैं।

बिहार सरकार के निर्णय पर आपत्ति

प्रतिनिधिमंडल ने ज्ञापन में बिहार सरकार के इस निर्णय को “तुगलकी” बताते हुए कहा कि इसे डिजिटलाइजेशन और प्रशासनिक पुनर्गठन के नाम पर उचित ठहराया जा रहा है, लेकिन वास्तविकता इससे अलग है।

उनका कहना है कि सरकार का यह तर्क कि संस्थान में महत्वपूर्ण पांडुलिपियों का डिजिटल संरक्षण किया जाएगा, तथ्यात्मक रूप से सही नहीं है। प्रतिनिधिमंडल के अनुसार, वर्तमान में संस्थान में ऐसी कोई बड़ी पांडुलिपि उपलब्ध नहीं है जो इस तर्क को मजबूत करती हो।

अकादमिक क्षति की आशंका

प्रतिनिधिमंडल ने सबसे बड़ी चिंता यह जताई कि यदि संस्थान को उच्च शिक्षा विभाग से हटाकर किसी अन्य विभाग के अधीन किया गया, तो इसकी अकादमिक पहचान समाप्त हो जाएगी।

उनका कहना है कि यह संस्थान केवल पुस्तकों के संग्रह का स्थान नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत शोध केंद्र है, जहां विद्वान और शोधार्थी लगातार अध्ययन कार्य करते हैं। यदि इसे सांस्कृतिक विभाग के अधीन किया गया, तो शोध गतिविधियां प्रभावित होंगी और अकादमिक कार्य धीरे-धीरे समाप्त हो सकते हैं।

भेदभाव के आरोप

ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया कि सरकार का यह निर्णय पक्षपातपूर्ण है। प्रतिनिधिमंडल ने सवाल उठाया कि जब दरभंगा का संस्कृत संस्थान और नालंदा का पाली संस्थान उच्च शिक्षा विभाग के अंतर्गत सुचारू रूप से संचालित हो रहे हैं, तो केवल जैन शोध संस्थान के साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है।

इस पर प्रतिनिधिमंडल ने इसे “संस्कृति और परंपरा के साथ अन्याय” बताया और कहा कि यह निर्णय न केवल जैन समुदाय बल्कि संपूर्ण भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

प्रतिनिधिमंडल के प्रमुख सदस्य

इस अवसर पर कई प्रमुख सामाजिक और शैक्षणिक प्रतिनिधि उपस्थित रहे। इनमें संघ नायक राकेश जैन गोहिल, वीरेंद्र अजमेरा, डॉ. मनोज जैन, रवि जैन (पत्रकार), एडवोकेट योगेश जैन, पंडित जयदीप शास्त्री और अनिल जैन (सीए) सहित समाज के कई गणमान्य लोग शामिल थे।

सभी ने एक स्वर में मांग की कि इस निर्णय को तत्काल प्रभाव से वापस लिया जाए और संस्थान को उसके मूल स्वरूप में बनाए रखा जाए।

मुख्य मांगें रखी गईं

राष्ट्रीय जिन शासन एकता संघ ने अपनी प्रमुख मांगों को स्पष्ट रूप से प्रस्तुत किया:

  • संस्थान के हस्तांतरण के निर्णय को तुरंत रद्द किया जाए।
  • संस्थान को पुनः उच्च शिक्षा विभाग के अधीन लाया जाए।
  • पिछले 20 वर्षों से लंबित शैक्षणिक और प्रशासनिक नियुक्तियों को तुरंत पूरा किया जाए।
  • संस्थान को अंतरराष्ट्रीय स्तर के उत्कृष्ट शोध केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।

प्रतिनिधिमंडल ने कहा कि यदि इन मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो संस्थान की कार्यक्षमता और शोध क्षमता गंभीर रूप से प्रभावित होगी।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान की प्रतिक्रिया

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रतिनिधिमंडल की बातों को गंभीरता से सुना। उन्होंने कहा कि यह मामला केवल एक संस्थान का नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक और ज्ञान परंपरा से जुड़ा हुआ संवेदनशील विषय है।

उन्होंने आश्वासन दिया कि वे इस मुद्दे पर बिहार के मुख्यमंत्री से बातचीत करेंगे और उचित समाधान निकालने का प्रयास करेंगे। उन्होंने प्रतिनिधिमंडल को भरोसा दिलाया कि इस मामले को गंभीरता से आगे बढ़ाया जाएगा।

आंदोलन की चेतावनी

इस बीच जिन शासन एकता संघ के मंयक जैन ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया तो पूरे देश में विरोध प्रदर्शन शुरू किया जाएगा।

उन्होंने कहा कि यह केवल एक संस्थान की लड़ाई नहीं है, बल्कि भारतीय संस्कृति, जैन दर्शन और ज्ञान परंपरा को बचाने का आंदोलन है। उन्होंने यह भी कहा कि यदि आवश्यकता पड़ी तो देशभर में चरणबद्ध आंदोलन किया जाएगा।

सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व

वैशाली स्थित यह शोध संस्थान केवल एक अकादमिक केंद्र नहीं है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति और जैन दर्शन का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है। यहां प्राकृत भाषा और जैन साहित्य पर किए गए शोध कार्यों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान बनाई है।

विद्वानों का मानना है कि यदि इस संस्थान की स्वतंत्रता और अकादमिक स्वरूप को कमजोर किया गया तो यह भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए एक बड़ी क्षति होगी।

निष्कर्ष

इस पूरे मामले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सांस्कृतिक और शैक्षणिक संस्थानों के प्रशासनिक निर्णय केवल कागजी प्रक्रिया नहीं होते, बल्कि उनका सीधा प्रभाव समाज, परंपरा और ज्ञान व्यवस्था पर पड़ता है।

केंद्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान से हुई यह मुलाकात इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है। अब सभी की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इस विवाद को कैसे सुलझाती है और क्या वैशाली स्थित यह ऐतिहासिक शोध संस्थान अपने मूल स्वरूप में बना रहेगा या नहीं।

कुमकुम सोनी स्वराज वाणी न्यूज मे कंटेंट राइटर के पद पर कार्यरत है। इन्होंने स्नातक पत्रकारिता एवं जनसंचार से की है। यह विशेषतः राजनीति एवं भू-राजनीति से जुड़े मुद्दों का गहन विशलेषण कर सरल भाषा में आम जनता के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करती है।… Read More

Related News
Breaking News हमेशा आपके पास

SwarajVani App Install करें

Latest India News & Breaking Updates — सीधे Home Screen पर

Offline पढ़ें Breaking Alerts बिल्कुल Free
SwarajVani को iPhone पर install करें:
📤 Share बटन दबाएं → "Add to Home Screen" select करें
Home
Web Stories
Instagram
WhatsApp